जैसा कि मैंने कई बार कहा है, और आज उसे फिर दोहरा रहा हूं कि शिकारी खुद शिकार हो गया। यह बात अन्ना हजारे पर काफी हद तक लागू होती है, जिनके सभी अच्छे काम और मुद्दे उस समय कमजोर हो गए, जब उनकी टीम के सदस्यों ने अभद्र भाषा व कटाक्ष का सहारा लिया। इन लोगों ने निर्वाचित लोकतंत्र की अवमानना की और अपनी नैतिक श्रेष्ठता से दूर होते चले गए।
दुर्भाग्यवश समर्थकों के छिटकने से अन्ना हजारे ने अपनी दिशा खो दी और कई सुरों में बात करने लगे। यही नहीं, उसके बाद उन्होंने कभी-कभार ही कार्यक्रम रखे और कई जगह उदास भी दिखे। आम आदमी ने टीम अन्ना की आक्रामक नीति को खारिज कर दिया। मुंबई और देश के अन्य शहरों में अन्ना हजारे और उनकी टीम को खाली मैदान में बैठकर अनशन और विरोध प्रदर्शन करते देख कई लोगों को धक्का लगा। वैसे इससे यह साफ हो गया कि किसी भी चीज की अति को कभी बर्दाश्त नहीं किया जाता। मीडिया के एक वर्ग और सोशल मीडिया नेटवर्क के उन्मादी अभियान का भी असर नहीं दिखा।
रही बात बाबा रामदेव की, तो वह एक अलग वर्ग से आते हैं। योगगुरु होने के नाते उनके भक्तों की तादाद काफी ज्यादा है। उनके पास एक बड़ा व्यावसायिक साम्राज्य है। उन्होंने भी देश का दौरा किया। पर मुझे लगता है कि रामदेव का यह अनुमान गलत साबित हो गया कि ये भक्त उनके राजनीतिक समर्थक हैं। अपने व्यावसायिक साम्राज्य को लेकर वह बेहद मुसीबत में हैं और कोई भी यह दावा करने की स्थिति में नहीं है कि उनके धन का रंग काला है, बैगनी है, लाल है या फिर सफेद है?
अन्ना हजारे की खाली की गई जमीन पर अरविंद केजरीवाल ने कब्जा जमा लिया है और उनकी टुकड़ी में भी कई तरह के आपसी विवाद हैं। यह शुरू से ही स्पष्ट है कि उनका उद्देश्य राजनीतिक सत्ता को कब्जे में लेना है और केंद्र सरकार और मुख्य विपक्ष की कमजोर प्रतिक्रिया के चलते उनके प्रयासों को प्रोत्साहन मिला है। वह अब एक राजनीतिक दल बनाने का दावा कर रहे हैं और उनके तौर-तरीकों का आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है। वह हिंसक गतिविधियों को उकसाएंगे और अगर जवाबी प्रतिक्रिया भी हिंसक हुई, तो उसका फायदा उठाएंगे। यह रणनीति टेलीविजन पर तो अच्छी दिख सकती है, लेकिन इसका अस्तित्व बरकरार रहना बेहद कठिन है।
उनके पिछले विरोध प्रदर्शन में तकरीबन 200 लोग थे, जिनमें आधे से ज्यादा मारुति से निकाले गए कर्मचारी शामिल थे। इसी बीच इंडिया अगेंस्ट करप्शन की पूर्व सदस्य एनी कोहली वहां आ धमकीं और उन्होंने अरविंद केजरीवाल की विश्वसनीयता को लेकर कई सवाल दागे। मुझे लगता है कि टीम अन्ना के ऐसे कई सदस्य, जिनकी जगहों को केजरीवाल ने हड़प लिया है, आने वाले वक्त में ऐसा करते रहेंगे।
बहरहाल, आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारी को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस और भाजपा, दोनों खुद को राजनीतिक मुद्दों पर केंद्रित करने की कोशिश करेंगी। दोनों को 150 सीटों के आंकड़े को छूने के लिए काफी मेहनत की जरूरत है। मैं यहां अपना शुरुआती आकलन बता रहा हूं। वैसे अभी एक साल का वक्त बाकी है और स्थितियों में काफी बदलाव हो सकता है। अगर कुछ बड़े राज्यों की बात करें, तो आंध्र प्रदेश में कांग्रेस को 42 में 15 सीटें मिल सकती हैं और भाजपा का यहां खाता खुलने की उम्मीद नहीं है। बिहार में 40 सीटें हैं, जिनमें भाजपा के खाते में 12 सीटें आ सकती हैं, जबकि कांग्रेस को दो सीटों से ही संतोष करना पड़ सकता है।
गुजरात की कुल 26 सीटों में भाजपा को 18 और कांग्रेस को आठ सीटें मिल सकती हैं। कर्नाटक की 28 सीटों में कांग्रेस 10 और भाजपा को आठ सीटें मिलने की संभावना है। मध्य प्रदेश की 29 सीटों में भाजपा को 21 और कांग्रेस को आठ सीटें मिल सकती हैं। महाराष्ट्र की 48 सीटों में कांग्रेस को 14 और भाजपा को 12 सीटें मिल सकती हैं। राजस्थान में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा रह सकता है, जहां की 25 सीटों में भाजपा को 18 और कांग्रेस को सात सीटें मिल सकती हैं। सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की 80 सीटें अहम हैं। यहां कांग्रेस को 15 और भाजपा को 14 सीटें मिल सकती हैं।
इस तरह अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 145 और भाजपा को 137 सीटें मिलने की संभावना है। मेरे इस अनुमान से कोई राजनीतिक दल सहमत होगा, मुझे ऐसी उम्मीद नहीं है। वैसे यदि आप हर दल के आंतरिक अनुमानों की बात करें, तो लोकसभा की कुल 542 सीटों की जगह 1,000 सीटों की जरूरत होगी। कई राज्यों में बदलाव की गुंजाइश है। जैसे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को भारी जीत हासिल हुई थी, जबकि बसपा बुरी तरह से हारी थी।
यहां कांग्रेस और भाजपा, दोनों का प्रदर्शन कमजोर रहा था। पर अब हालात बदल चुके हैं, क्योंकि सपा का राजनीतिक हनीमून खत्म हो चुका है और बसपा खोई हुई जमीन दोबारा हासिल करती हुई लग रही है। पिछले लोकसभा चुनाव में सपा/बसपा/रालोद ने मिलकर 48 सीटों पर कब्जा जमाया था और मेरा मानना है कि 2014 के चुनाव में यह संख्या 50 तक पहुंच सकती है। रही बात कांग्रेस और भाजपा की, तो दोनों दल उत्तर प्रदेश में उच्च जातियों के मतों के लिए आपसी जोर आजमाइश में जुटे हैं।