उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव इस मामले में महत्वपूर्ण हैं कि इसके नतीजे राजनीतिक इतिहास का अगला अध्याय रचेंगे। अगर भाजपा जीतती है, तो माना जाएगा कि 2014 की लहर जारी है। इससे राज्यसभा में भाजपा को अपना संख्याबल बढ़ाने में मदद मिलेगी। नतीजे यह भी तय करेंगे कि देश का अगला राष्ट्रपति कौन होगा। लेकिन अगर भाजपा हार जाती है, तो इसे पार्टी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जाएगा। हार से पार्टी और संघ परिवार के समीकरणों पर भी असर पड़ेगा।
जहां तक विपक्ष की बात है, तो अखिलेश के मोर्चे की यदि जीत होती है, तो तीसरे मोर्चे का विचार फिर सामने आ सकता है और विपक्षी दलों को यह सूत्र मिलेगा कि वे विपक्षी एकता को मजबूत करें और 2019 के लोकसभा चुनाव का मिल-जुलकर सामना करें। इससे खारिज किए गए विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस के पुनरुद्धार की उम्मीद भी बलवती होगी।
उत्तर प्रदेश का चुनाव कई वजहों से महत्वपूर्ण है। देश की आबादी का छठवां हिस्सा अगर केंद्र की राजग सरकार के पक्ष में अपना जनादेश नहीं देता है, तो विकास की आकांक्षा को कायम नहीं रखा जा सकता। यह इसलिए भी अहम है कि भारत के विकास की कहानी में उत्तर प्रदेश महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश का चुनाव आशा और निराशा की कठिन परीक्षा है। यह भारत और इंडिया के बीच के अंतर को प्रतिबिंबित करेगा। भारत के सामने जो भी चुनौती है, वह उत्तर प्रदेश के आंकड़े में परिलक्षित होती है-गरीबी, कृषि मॉडल का पिछड़ापन, शिक्षा, सुरक्षा और शहरीकरण आदि की कुव्यवस्था। उत्तर प्रदेश सिर्फ एक राज्य नहीं है, यह भारत की वास्तविकता को दर्शाता है और बताता है कि क्यों जनसांख्यिकीय लाभांश एक दुःस्वप्न में बदल गया है। बीस करोड़ की आबादी वाला यह राज्य देशों के रैंक में पांचवें नंबर पर होगा। यह भारत की आबादी के 16 फीसदी लोगों और 22 फीसदी अत्यंत निर्धन लोगों का राज्य है। वर्ष 1960 में इसके 17 जिले देश के बदतरीन जिलों में शामिल थे। लेकिन 2016 में भी इनकी स्थति खराब ही रही। इसके 35 जिले पिछड़े जिले के रूप में चिह्नित हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि इसके 41 जिले शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं।
आय का स्तर यहां अभाव की कहानी बताते हैं। प्रति व्यक्ति 48,500 रुपये वार्षिक आय राष्ट्रीय औसत का आधा है, जो ओडिशा एवं मध्य प्रदेश से भी कम है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति आय इससे भी कम मात्र 25,000 रुपये है। गरीबी इसकी विफलता का कारण भी है और परिणाम भी। यह मानव विकास संकेतकों में परिलक्षित होता है-उच्च जन्म दर और उर्वरता अनुपात इसके उदाहरण हैं। 2011 की जनगणना हमें बताती है कि दस में से एक महिला को सात से अधिक बच्चे हैं। यहां की साक्षरता दर 67 फीसदी है, जो भारत की साक्षरता दर से नीचे है। श्रावस्ती जैसे जिले में हर दूसरा व्यक्ति निरक्षर है। कुपोषण के मामले में यह शीर्ष पर है। दस में से छह परिवार खुले में शौच करते हैं और आवास तथा स्वास्थ्य सेवा की खराब स्थिति के कारण यहां नवजात मृत्यु दर म्यामांर और जाम्बिया से ज्यादा है।
बीस करोड़ में से 15.5 करोड़ लोग ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर निर्भर हैं। दस में से तीन लोगों के पास अपनी जमीन नहीं है और जिनके पास अपनी जमीन है, उनमें से आधी जमीन के लिए ही सिंचाई सुविधा उपलब्ध है। सामाजिक-आर्थिक जनगणना बताती है कि सौ में से मात्र तीन लोग ही पेशेवर या आय कर चुकाते हैं। दस में सात परिवारों की आय पांच हजार रुपये के करीब है और प्रति व्यक्ति बिजली की खपत राष्ट्रीय औसत से ही नहीं, ओडिशा से भी कम है।
हां, सड़क संपर्क में जरूर सुधार हुआ है, खासकर पिछले कुछ वर्षों में बने नए एक्सप्रेसवे इसके चमकीले पक्ष हैं। विश्व बैंक का कहना है कि मानव विकास संकेतकों में भी सुधार हुआ है। मगर मूल बात यह नहीं है कि इसमें कितनी कम प्रगति हुई, बल्कि यह है कि कितनी देरी से प्रगति हुई है। औद्योगिक रूप से पिछड़े इस राज्य में 11.7 करोड़ लोग 15 से 65 वर्ष के हैं। 3.1 करोड़ बच्चे शून्य से छह वर्ष की उम्र के हैं। यानी शिक्षा और रोजगार सृजन प्रमुख चुनौती है। राज्य में शिक्षा और कानून-व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक है। शिक्षकों और पुलिसकर्मियों के पद भी सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में ही रिक्त हैं।
हालांकि राज्य के प्रतिनिधित्व की कमी नहीं है। संसद के दोनों सदनों में राज्य के 111 सदस्य हैं, जबकि विधानसभा के दोनों सदनों में 503 सदस्य हैं, जो सशक्त और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बाध्य हैं। जनप्रतिनिधियों की इतनी बड़ी संख्या और गुणवत्ता के दावों के बावजूद राज्य कई मामलों में विफल है। भाजपा कांग्रेस मुक्त भारत का प्रचार कर रही है। उत्तर प्रदेश 1989 में ही कांग्रेस मुक्त हो गया था और उसके बाद ज्यादातर सपा या बसपा का शासन रहा है। क्षेत्रीय पार्टियां स्थानीय हितों के बेहतर प्रतिनिधित्व का दावा करती हैं। लेकिन राज्य के हालात शायद ही इन दावों की पुष्टि करते हैं। संसाधनों की कमी, क्षमता की कमी और लालची राजनीति ने उत्तर प्रदेश को खराब शासन के अध्ययन का विषय बना दिया है। बिहार की तरह उत्तर प्रदेश भी पहचान की राजनीति से संबद्ध है। प्रशासन का मतलब यहां कानून के शासन से कम और शासक के कानून से ज्यादा है। यह चुनाव विकास के दो मॉडलों के बीच की प्रतियोगिता है-युवा अखिलेश और भाजपा के बीच। प्रचार में बढ़-चढ़कर बयानबाजी हो रही है। घोषणापत्र मुफ्त उपहार, किसानों की कर्ज माफी और खैरातों से भरे पड़े हैं। चुनाव प्रचार की बहस समाधानों के बारे में हो सकती थी-जैसे पंचायतों एवं नगरपालिका निकायों के उन्नयन के लिए शिक्षा एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण हेतु प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल, जल प्रबंधन, उद्योग जगत को लुभाने के लिए श्रम कानून में सुधार आदि। यह चुनाव शासन की एक नई रूपरेखा बना सकता था, लेकिन यह नए वोट बैंक बनाने तक सिमटकर रह गया है।