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उत्तर कोरिया में अमेरिका विरोध

निकोलस क्रिस्टॉफ Updated Mon, 09 Oct 2017 05:12 PM IST
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उत्तर कोरिया
एक पुराने रूसी विमान में उत्तर कोरिया की उड़ान भरना एक वैकल्पिक ब्रह्मांड में कदम रखने जैसा है, जिसका सर्वोच्च नेता अमेरिकी साम्राज्यवादियों को शिकस्त देता है, जहां राज्य द्वारा माता-पिता से तीन में एक बच्चे को पालने और सेना में भर्ती करने के लिए ले लिया जाता है, जहां अस्तित्व के लिए परमाणु युद्ध की आशंका है और जहां आटो वार्मबीयर जैसे अमेरिकी बंदी के लिए कोई सहानुभूति नहीं है। वार्मबीयर वर्जीनिया विश्वविद्यालय का छात्र था, जिसे पोस्टर चुराने के लिए गिरफ्तार किया गया, फिर 15 वर्ष की सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई और अंत में कोमा की स्थिति में अमेरिका लौटा।


उत्तर कोरिया में अमेरिका के प्रति सख्त रुख मुझे हर जगह देखने को मिला। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी चोई कांग इल ने राष्ट्रपति ट्रंप को पागल, ठग और बड़े मुंह वाला दयनीय व्यक्ति बताया। मैं 1980 के दशक से उत्तर कोरियो को कवर कर रहा हूं और इस पांच दिवसीय यात्रा ने मुझे आपदापूर्ण टकराव के खतरे के प्रति पहले से कहीं ज्यादा चिंतित किया। न्यूयॉर्क टाइम्स के तीन अन्य पत्रकारों के साथ मुझे भी उत्तर कोरिया का वीजा दिया गया था। अमेरिकी विदेश विभाग ने उत्तर कोरिया की यात्रा पर लगे प्रतिबंध से हमें छूट दी और एकल यात्रा के लिए विशेष पासपोर्ट जारी किया। पहले भी मैंने उत्तर कोरिया की यात्रा की है। उत्तर कोरिया अमेरिका के साथ परमाणु युद्ध की आशंका में अपने लोगों को तैयार कर रहा है। हर दिन सैन्य वर्दी में हाई स्कूल के छात्र सड़कों पर मार्च करते हैं और अमेरिका की आलोचना करते हैं। सड़कों पर पोस्टरों में दिखाया गया है कि मिसाइल अमेरिकी संसद को ध्वस्त कर रहे हैं। असल में मिसाइल की तस्वीरें किंडरगार्टेन प्लेग्राउंड, डॉल्फिन शो, सरकारी टेलीविजन पर-हर जगह हैं। वहां यह धारणा सर्वव्यापक है कि उत्तर कोरिया न केवल परमाणु युद्ध में बचा रह सकता है, बल्कि उसे जीत भी सकता है।


वहां कुछ लोगों से मेरी बातचीत विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की मौजूदगी में हुई। लेकिन अगर वे हमारे साथ नहीं होते, तो शायद विदेशी पत्रकारों से आम लोगों की बातचीत संभवतः नहीं होती। संभवतः उत्तर कोरिया दुनिया में सबसे नियंत्रित देश है। पिछली बार जब 2005 में मैं उत्तर कोरिया गया था, तब हम पत्रकार राजधानी में एक होटल में ठहरे थे और स्वतंत्र होकर लोगों से बात करते थे। लेकिन इस बार वहां के विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने हमें अपने गेस्ट हाउस में ठहराया था। पहले मैंने सोचा कि यह हमें प्रतिबंधित करने के लिए है, पर शीघ्र ही मुझे कुछ खतरनाक संकेत मिले-विदेश मंत्रालय के अधिकारी हमें सैन्य एवं सुरक्षा सेवा के कट्टरपंथियों से बचा भी रहे थे। एक अधिकारी ने बताया कि यहां कुछ लोगों को पता चल गया है कि आप अमेरिका से हैं, इसलिए वे कुछ परेशानी खड़ी कर सकते हैं।


लगता है कि इस बार कट्टरपंथियों को ज्यादा ताकत मिल गई है, खासकर ट्रंप द्वारा उत्तर कोरिया को पूरी तरह बर्बाद करने की धमकी देने के बाद से। हमें बताया गया कि सैन्य अधिकारी कभी-कभी अपने ही राजनयिकों को कायर और अमेरिकी दोस्त बताते हैं। हमारे गेस्ट हाउस से बाहर निकलते ही विदेश मंत्रालय के अधिकारी हमारे साथ होते थे, हमें कोई भी धोखा देने से रोकने और सुरक्षा एजेंसियों से हमें बचाने, दोनों के लिए। यह सब कुछ थोड़ा असुविधाजनक था।


नतीजा यह रहा कि पिछली यात्राओं की तुलना में इस बार की यात्रा में मुझे ज्यादा बाधा और तनाव महसूस हुआ। पहले मैं वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों से आसानी से मिल लेता था, पर इस बार सेना ने सीधे इंटरव्यू देने से इन्कार कर दिया। सुरक्षा बलों ने मुझे उन तीन अमेरिकियों से भी नहीं मिलने दिया, जिन्हें उन्होंने बंदी बनाकर रखा हुआ है।


एक बुनियादी बात है कि कट्टरपंथी वाशिंगटन और प्योंगयांग, दोनों जगह हैं। वाशिंगटन में विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने उत्तर कोरिया के साथ विवाद कूटनीतिक तरीके से सुलझाने की वकालत की, तो ट्रंप ने उनकी बात काटते हुए ट्वीट किया, टिलरसन अपना समय बर्बाद कर रहे हैं। उत्तर कोरिया के प्रति ट्रंप की नीति गलत धारणाओं पर आधारित है कि किम जोंग उन परमाणु हथियार बनाना छोड़ देंगे, कि चीन उसे मना सकता है और सैन्य विकल्प वास्तविक है। दूसरी तरफ प्योंगयांग के अधिकारी भी कठिन समझौते के लिए तैयार नहीं है, जो इस संकट के समाधान के लिए जरूरी है। उत्तर कोरियाई इस बात पर अड़े हैं कि अमेरिका पहले कदम उठाए और प्रतिबंध व शत्रुतापूर्ण रवैये को खत्म करे, जो होने वाला नहीं है। उसी तरह अमेरिका इस जिद पर अड़ा है कि उत्तर कोरिया अपने संपूर्ण परमाणु कार्यक्रम को छोड़ दे।


मेरा मानना है कि दोनों पक्ष कमजोर दिखने से डर रहे हैं और सैन्य धमकी के साथ किसी तीसरे को इसमें शामिल करने के इच्छुक हैं, लेकिन दोनों पक्ष इसके शांतिपूर्ण समाधान को पसंद करेंगे। आखिर इस संकट से हम कैसे उबर सकते हैं? सबसे पहले ट्रंप को इसे व्यक्तिगत रूप देने और विवाद को बढ़ाने से बचना चाहिए। यदि हमें बिना शर्त बात करने की जरूरत है, तो मेरा सुझाव है कि कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को गुप्त रूप से प्योंगयांग भेजना चाहिए और उत्तर कोरिया के राजदूत और संयुक्त राष्ट्र से चर्चा करनी चाहिए। मानवाधिकार को इस एजेंडे का हिस्सा होना चाहिए। हमें उन संगठनों का समर्थन करना चाहिए, जो उत्तर कोरिया में यूएसबी ड्राइव पर सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं। हमें साइबर हथियारों को बढ़ाना चाहिए, जिसका इस्तेमाल पहले से ही अमेरिका उत्तर कोरिया के खिलाफ कर रहा है। सख्त प्रतिबंध तभी लागू करें, जब संभावित परिणाम मिलने की आशा हो।
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उत्तर कोरिया से मैं उसी भावना के साथ लौटा, जिस भावना के साथ 2002 में अमेरिकी हमले से पहले सद्दाम के इराक से लौटा था। युद्ध को रोका जा सकता है, पर मुझे नहीं लगता कि इसे रोका जा सकेगा। 
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