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सवालों के सलीब पर अमेरिका

Thu, 01 Jan 2015 07:08 PM IST
कुमार प्रशांत
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कैसा अजीब है यह जानना कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा एक तरफ भारत आने की तैयारी में हैं, दूसरी तरफ अमेरिका उन्हें विदा करने की तैयारी में है! वैसे इन दिनों अमेरिक के पौ बारह हैं! उसकी लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था संभल गई है और सारा श्वेत अमेरिका इस आस में है कि उसे अश्वेत बराक ओबामा से छुट्टी मिल ही जाएगी। अमेरिकी लोकतांत्रिक परंपरा के मुताबिक, ओबामा तीसरी बार राष्ट्रपति बनने की सोच नहीं सकते और अमेरिका के राजनीतिक पटल पर अभी कोई दूसरा ओबामा उभरता दिखाई नहीं दे रहा। तो श्वेत अमेरिका मान रहा है कि उसके सामने अभी कोई सीधी चुनौती नहीं है।
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लेकिन कुछ है कि अमेरिका भीतर-ही-भीतर घुटा भी जा रहा है। वह क्या है, जो अमेरिकी प्रशासन के गले में अटकता है और अमेरिकी लोकतंत्र की चमक धूमिल करता है? वह है, अमेरिकी लोकतंत्र में कानून-व्यवस्था का संरक्षक गोरी चमड़ी वाला सामान्य सिपाही या कांस्टेबल! यह कौन है, कैसा है और क्या करता है, यह कहानी खुली तब, जब ओहायो के वालमार्ट के मॉल का वह कैमरा खुला, जो जॉन क्राफोर्ड को गोली मारे जाने की पूरी कहानी दर्ज किए बैठा था। कैमरे की कही कहानी कुछ ऐसी है-किशोरावस्था की दहलीज छू रहा अश्वेत क्राफोर्ड वालमार्ट के मॉल में पहुंचता है और बच्चों के खिलौनों में से एक एयर राइफल उठाता है। हवा में वह राइफल इधर-उधर घुमाता है और फिर उसकी नली जमीन की तरफ घुमाकर, फोन पर किसी से बातें करने लगता है। कैमरे की नजर से देखने से ऐसा लगता है, मानो वह उस खिलौने को खरीदने की तैयारी कर रहा है।

कहीं कुछ भी असामान्य या तनाव भरा नहीं है कि तभी धड़धड़ाते हुए कहीं से प्रकट होते हैं पुलिस के कमांडो सरीखे गोरे पुलिस वाले! वे न आव देखते हैं, न ताव, क्राफोर्ड को गोलियों से भून डालते हैं। बताया गया कि किसी ने पुलिस को फोन पर कहा था कि एक काला लड़का भरी राइफल लेकर लोगों को डरा-धमका रहा है। बात आई-गई हो गई, लेकिन बात बिगड़ी तब, जब विगत सितंबर में इस मुकदमे की सुनवाई करते हुए ग्रैंड जूरी ने गोरे सिपाहियों को निर्दोष घोषित कर दिया। इससे अमेरिका के कई प्रांतों में अशांति फैल गई।
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और तब से अमेरिकी लोकतंत्र का वह चेहरा उजागर होने लगा है, जिसे दिखाना और छिपाना भी लोकतंत्र के दायरे में नहीं आता। अब सवाल पूछा जाने लगा है कि क्या अमेरिका में सामाजिक लोकतंत्र है भी? क्राफोर्ड को गोली मारे जाने से पहले भी दो बड़ी घटनाएं हुई थीं। मिसौरी में अश्वेत माइकल ब्राउन को तब गोली मार दी गई, जब वह एक दुकान में दिन-दहाड़े लूटपाट कर रहा था। पर लूट-मार की सजा अमेरिका में भी अब तक गोली मार देने की नहीं है। फिर अधेड़ अश्वेत इरिक गारनर को एक गोरे पुलिसवाले ने इस तरह दबोच कर रखा कि उसने दम घुटने से दम तोड़ दिया। गारनर पर आरोप था कि वह सड़क पर खुलेआम खुदरा सिगरेट बेच रहा था।

इसके बाद कितने ही अध्ययनों से ये आंकड़े सामने आने लगे कि अमेरिका में पुलिस की गोली से हर दिन एक आदमी मारा जाता है, जो अश्वेत होता है और मारने वाली पुलिस श्वेत! आंकड़े बताते हैं कि पिछले वर्ष पुलिस की गोली से मारे गए लोगों में 29 फीसदी अश्वेत थे। एक अध्ययन बताता है कि अमेरिकी पुलिस पर 59 प्रतिशत श्वेतों और मात्र 37 फीसदी अश्वेतों को भरोसा है। समाज में कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का बुनियादी काम है और यह काम वह अपने नागरिकों को दुश्मन मानकर नहीं कर सकती।

लेकिन जब अमेरिकी पुलिस अपनी एक फीसदी वयस्क आबादी को काबू में रखने के लिए जेलों में रखती है, तब विश्वास और संवाद की कोई जगह बचती है क्या? दुनिया के तथाकथित विकसित देशों में कहीं भी इतनी बड़ी वयस्क आबादी जेलों में नहीं है। अभी-अभी सीआईए द्वारा कैदियों पर की जाने वाली ज्यादतियों का जो वीडियो सामने आया है, उससे अमेरिकी लोकतंत्र का एक वह चेहरा भी सामने आया है, जिसके बारे में सब जानते तो थे, लेकिन इसका प्रमाण नहीं मिलता था। अब प्रमाण सामने है। इससे यह बात साफ हुई कि लोकतंत्र के इस पर्दे के पीछे वह सब चलता था, जिसे लोकतंत्र में नहीं चलना चाहिए।

कई अमेरिकी राज्यों में पुलिस को यह अधिकार मिला हुआ है कि वह उन लोगों की संपत्ति की कुर्की-जब्ती कर सकती है, जिन पर हिंसा का आरोप भले नहीं है, लेकिन जो बार-बार अपराध करते हैं। वहां पुलिस इस अधिकार का धड़ल्ले से इस्तेमाल करती है। अमेरिका के कई राज्यों ने तो अपनी पुलिस को फौज जैसे अधिकार दे रखे हैं। उनके पास ग्रेनेड लांचर व आर्म्ड कारें हैं। अमेरिका में 1980 में पुलिसिया कार्रवाई में जहां 3,000 घटनाएं हुई थीं, वहीं आज यह संख्या 50,000 तक पहुंच रही है। पिछले साल पुलिस की गोली से 458 लोग मारे गए थे, जबकि इंग्लैंड व वेल्स में यह संख्या शून्य थी।

अमेरिकी समाज में हथियारों का जैसा जमावड़ा है, वह एक बड़ा कारण है कि वहां पुलिस हमलावर बनी रहती है। वहां पुलिस वालों में अपनी जान और नौकरी बचाने की फिक्र अधिक होती है। पिछले साल वहां लोगों की गोली से 46 पुलिस वालों की जान गई है, जबकि 42 प्रतिशत अपराधियों के रंग या नस्ल का पता नहीं है। हथियारबद्ध समाज और हथियार व दमन का कानूनसम्मत अधिकार रखने वाली पुलिस का यह मुकाबला सबसे पहले लोकतंत्र का खून करता है। अमेरिका को आज सबसे बड़ी चिंता इसी बात की है कि क्या उसके पास लोकतंत्र का ढांचा भर रह जाएगा और आत्मा निकल जाएगी? कुछ ऐसे ही सवाल के सामने हमारा लोकतंत्र भी खड़ा है। कानून में नहीं, कमी कानून के पालन में और पालन करने वालों में है। रंगभेद के संदर्भ में अमेरिका का इतिहास उसके वर्तमान पर हाथ डाल रहा है और दुनिया देख रही है कि दुनिया को राह दिखाने का दावा करने वाला अमेरिका कैसे और कौन-सी राह खोजता है।
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