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अमेरिका में हिंसा और दोहरे मापदंडों की मार

बलबीर पुंज Published by: बलबीर पुंज Updated Sun, 10 Jan 2021 03:38 AM IST
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us capitol violence - फोटो : PTI

अमेरिका में छह जनवरी को जो कुछ हुआ, उससे शेष विश्व स्वाभाविक रूप से भौचक है। परंतु क्या यह सत्य नहीं है कि अमेरिकी सार्वजनिक जीवन में हिंसा का अतिक्रमण पहले ही हो चुका था? 25 मई, 2020 को एक श्वेत पुलिसकर्मी द्वारा अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड की गर्दन दबाकर निर्मम हत्या के बाद भड़की हिंसा ने अमेरिका के 2,000 कस्बों-शहरों को अपने कब्जे में ले लिया था। भीषण लूटपाट के साथ करोड़ों-अरबों की निजी-सार्वजनिक संपत्ति को फूंक दिया गया था। हिंसा में 19 लोग मारे गए थे, जबकि 14 हजार लोगों की गिरफ्तारियां हुई थी। इस हिंसा का नेतृत्व वामपंथी अश्वेत संगठन- एंटिफा कर रहा था। तब कई वाम-वैचारिक अमेरिकी राजनेताओं और पत्रकारों ने इस अराजकता को न केवल उचित ठहराया, अपितु इसे प्रोत्साहन भी दिया।



एंटिफा प्रायोजित अराजकता पर सीएनएन के प्रख्यात टीवी एंकर क्रिस कूमो ने कहा था, 'किसने कहा है कि प्रदर्शनकारियों को शांतिपूर्ण रहना चाहिए?' वहीं भारतीय मूल की अमेरिकी सांसद और कश्मीर मामले में पाकिस्तान हितैषी प्रमिला जयपाल ने एक ट्वीट में अश्वेतों के हिंसक प्रदर्शन को देशभक्ति की संज्ञा दी। सबसे बढ़कर अमेरिका की भावी उप-राष्ट्रपति और भारतीय मूल की कमला हैरिस ने एंटिफा प्रोत्साहित हिंसा का समर्थन करते हुए कहा था, 'अब यह रुकने वाला नहीं है।'


सच तो यह है कि पराजित ट्रंप के समर्थकों द्वारा कैपिटल हिल पर हमला अमेरिकी इतिहास में पहली बार नहीं हुआ है। 24 अगस्त, 1814 को अमेरिका-इंग्लैंड युद्ध और 16 अगस्त, 1841 को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति  जॉन टायलर द्वारा अमेरिकी बैंक की पुनर्स्थापना संबंधी निर्णय के समय भी कैपिटल हिल पर बेकाबू भीड़ ने हमला किया था।


अमेरिकी संसद पर भीड़ द्वारा हालिया हमले की पृष्ठभूमि में यदि भारतीय संदर्भ देखें, तो यहां भी स्थिति लगभग एक जैसी ही है। भारत का एक वर्ग-मुखर होकर पराजित ट्रंप समर्थित भीड़ द्वारा अमेरिकी संसद पर हमले को लोकतांत्रिक पवित्रता पर आघात की संज्ञा तो दे रहा है, किंतु पिछले छह वर्षों से भारतीय लोकतंत्र के प्रतीक संसद द्वारा पारित कानूनों के संदर्भ में देश में हिंसा को भड़काने के लिए 'एंटिफा मॉडल' को दोहराना चाहता है। हिंसा, नाकेबंदी और दिल्ली की सीमा को जबरन बंद रखने को खुला प्रोत्साहन देकर करोड़ों लोगों के सांविधानिक अधिकारों को कुचलना- इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। क्या यह सत्य नहीं कि भाजपा को प्रचंड जनादेश उसके घोषणापत्र पर भी मिला है?


अब तक उसने जितने भी निर्णय लिए हैं और नीतियां-कानून बनाए हैं, वह सब नए नहीं ,बल्कि उसके घोषित वादों के अनुरूप ही हैं। इसी बीच, किसान आंदोलन में शामिल प्रदर्शनकारियों के एक वर्ग का नेतृत्व कर रहे भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत ने धमकी दी है कि यदि सरकार ने उनकी बात नहीं मानी, तो 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के दिन राजपथ पर किसान-मजदूर कब्जा करेंगे। इस वृत्ति को स्पष्टतः मोदी विरोधी विपक्षी दलों और स्वघोषित सेकुलरिस्टों-उदारवादियों का भी प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थन प्राप्त है। क्या राजपथ को कब्जाने की घुड़की कुछ अलग कही जा सकती है?


विरोधाभास देखिए कि भारत में जिस राजनीतिक कुनबे के लिए अमेरिकी संसद पर हमला और बाइडन के निर्वाचन को अस्वीकार करना अलोकतांत्रिक है, उसके लिए 2014 से लगातार दो बार लोकतांत्रिक बहुमत पाकर निर्वाचित सरकार द्वारा संसद में पारित कानूनों को भीड़तंत्र से रोकना, आतंकवादियों-अलगाववादियों को घूमने की स्वतंत्रता देना, हत्या के पड़यंत्र रचना, कश्मीर से पांच लाख हिंदुओं का पलायन और भारतीय हितों का खुला विरोध- लोकतांत्रिक है।


कटु सत्य तो यह है कि अमेरिका में ट्रंप समर्थकों ने उसी रुग्ण युक्ति को अपनाया है, जिसका उपयोग एक खास गठबंधन वर्ष 2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विकृत तथ्यों और झूठे विमर्श के आधार पर सत्ता से हटाने हेतु करता रहा है, ताकि एक स्वस्थ लोकतांत्रिक जनादेश को हाईजैक किया जा सके। वास्तव में, इस कुनबे का विमर्श है कि यदि किसी ने उनके विचारों से असहमति रखने का दुस्साहस किया, तो वह स्वाभाविक रूप से उनका न केवल विरोधी होगा, अपितु शत्रु भी होगा। यह तो एक राजनीतिक एजेंडे की सुविधा से लोकतंत्र को परिभाषित करना है।
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कैपिटल हिल पर पराजित ट्रंप समर्थकों के हमले को लेकर अमेरिका के भावी राष्ट्रपति बाइडन ने एक महत्वपूर्ण वक्तव्य दिया है। उनके अनुसार, 'हमने जो कुछ देखा, वह असहमति या असंतोष नहीं था। यह कोई अव्यवस्था नहीं थी। वह विरोध भी नहीं था। यह अराजकता थी। वे प्रदर्शनकारी नहीं थे। उन्हें प्रदर्शनकारी कहने की हिम्मत मत करना। वह दंगाई भीड़ थी। विद्रोही और घरेलू आतंकवादी थे।' इस बयान की पृष्ठभूमि में भारत में होने वाले हिंसक प्रदर्शनों को अब किस श्रेणी में रखा जाएगा? सच तो यह है कि कश्मीर में सेना पर पथराव को सही ठहराने से लेकर हिंसक प्रदर्शनों और आंदोलन के नाम पर जीवन अवरुद्ध कर देने या गणतंत्र दिवस पर राजपथ को कब्जाने की धमकी को प्रोत्साहन देने जैसी बातों को सही ठहराना और कैपिटल हिल पर हमले की आलोचना का अधिकार जताना, एक ही सांस में दो विपरीत पैमानों का उपयोग करना है।


निःसंदेह, अमेरिकी संसद पर बौखलाई भीड़ का हमला निंदनीय और अस्वीकार्य है, क्योंकि सभ्य समाज में हिंसा और बलप्रयोग का कोई स्थान नहीं। यह लोकतंत्र पर भयंकर चोट है। क्या इस संदर्भ में हम दोहरे मापदंडों को स्वीकार करने का खतरा मोल सकते है?


( - पूर्व राज्यसभा सांसद और भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय-उपाध्यक्ष) 

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