हिम्मत शाह जड़ता से परे थे। उनकी कलाकृतियों में भी कहीं कोई एकरसता नहीं थी। मूर्तिशिल्प, रेखांकन रचते हुए वह अपने आपको भी भूल जाते थे। ...और कुछ सृजित हो जाता, तो इतना उत्साहित हो उठते कि बच्चे की तरह उछल-कूद करने लगते थे। एक दफा रविवार को कुमार गंधर्व की सीडी लेकर घर आ गए। हमने साथ सुनी। सुनते-सुनते औचक हिम्मत जी नृत्य करने लगे थे। वह ऐसे ही थे, मन से निर्मल, निश्छल।
कोविड के समय जब पूरा विश्व थमा हुआ था, वह रेखांकन कर रहे थे। तब करीब तीन सौ कलाकृतियां उन्होंने सिरजीं। बाद में नई दिल्ली स्थित बीकानेर हाऊस और आर्ट मैग्नम में ‘अंडर द मास्क’ शृंखला से चयनित कुछ कलाकृतियां प्रदर्शित हुईं। रघु राय उनके करीबी रहे हैं। उन्होंने हिम्मत शाह की कला-साधना में रत विविध छवियों को ’थ्रू द लेंस ऑफ हिम्मत शाह’ में संजोया है।
हिम्मत शाह दस वर्ष की वय में सृजन से जुड़ गए थे। जेजे स्कूल ऑफ आर्ट, बॉम्बे और फिर एमएस यूनिवर्सिटी, बड़ौदा में उन्होंने अध्ययन किया। वर्ष 1967 में फ्रांसीसी सरकार की छात्रवृत्ति पर दो साल के लिए पेरिस गए। वहां एटलियर 17 में प्रिंटमेकर एसडब्ल्यू हेटर और कृष्णा रेड्डी के अधीन अध्ययन किया। हमारे यहां इन्स्टॉलेशन का दौर बहुत बाद में आया, पर हिम्मत शाह ने पचास के दशक में ही 'बर्न पेपर कोलाज’ जैसा महती इन्स्टॉलेशन किया था। राजस्थान के गांव-गांव घूमकर उन्होंने 'होमेज टू राजस्थान’ शृंखला सिरजी, जिसे बाद में इब्राहिम अल्का जी ने खरीद लिया था।
उन्होंने वास्तुशिल्प, भित्ति चित्र, टेराकोटा और कांस्य में अमूर्तन का इतिहास रचा। मिट्टी की मूर्तियों में उभार, बल और रस्सी जैसे रूपाकारों में उनका टैक्सचर विरल है। अपने सृजन के काम आने वाले, मूर्ति तराशने, आकार देने और ढालने के लिए कई तरह के हाथ के औजारों, ब्रश और उपकरणों को उन्होंने खुद ईजाद किया। सीमेंट और कंक्रीट में भित्ति चित्र भी उन्होंने निरंतर सिरजे।
वह ग्रुप 1890 के संस्थापक सदस्य थे। इस समूह की प्रदर्शनी पर मेक्सिको के तत्कालीन राजदूत और सुप्रसिद्ध कवि ऑक्टेवियो पाज ने 'सराउंडेड बाय इनफिनिटी’ शीर्षक से लिखा कि यह प्रदर्शनी नए समय का एक संकेत है। एक ऐसा समय, जो आलोचना के साथ-साथ सृजन का भी होगा। इन कलाकारों के साथ कुछ अनमोल पैदा हो रहा है।’ यह समूह तो बाद में बिखर गया, परंतु हिम्मत शाह ने रचना-कर्म उम्र पर्यंत जारी रखा। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, श्रीकांत वर्मा और उस समय के महती कवियों ने उनकी सिरजी कलाकृतियों पर अपने दौर में कविताएं लिखीं।
एक सप्ताह पहले जब उनका फोन आया, तो भविष्य की ढेर सारी योजनाओं के बारे में बताते हुए वह कहने लगे, 'स्टील आई एम यंग।’ बहुत उत्साह से उन्होंने नए शिल्प पर किए जा रहे अपने कार्य को दिखाया था। इसे उन्होंने शीर्षक दिया-'एंटायर द सिटी’। मिट्टी में सिरजे सूक्ष्म शिल्प। मुझे लगा, यह शहरों में बसते और दूसरे शहरों की गाथा है। वह किसी एक माध्यम से कभी बंधकर नहीं रहे। वह सदा कुछ नए की तलाश करते रहे। उनकी सामग्री, माध्यम और तकनीक निरंतर बदलती रही है। उनकी पेंटिंग, उनके मूर्तिशिल्प में बेहद सूक्ष्म अनुभव प्रतीतियां हैं। भले इन्हें कला की किसी खास परंपरा और शैली के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता, परंतु हिम्मत शाह ने जो किया, वह कला में सर्वथा अद्भुत, अपूर्व रहा है। खंड-खंड अखंड उन्होंने रचा।
कला के इस दौर में जब रचनात्मकता के स्तर पर नए कुछ की जगह सब जगह एक-सा मूर्त-अमूर्त काम दिखाई दे रहा है, हिम्मत शाह के आशयहीन रूपाकार कला में अभी बची अनंत रचनात्मकता के प्रति विश्वास दिलाते हैं। उनसे अंतिम बार जब मिला, तो अपनी स्मृतियों के संसार में ले जाते हुए वह बार-बार कह रहे थे, 'मैंने सबको छोड़ दिया। अपने को ढूंढने के लिए सबको छोड़ना पड़ेगा।’ हिम्मत जी ने हमें छोड़ दिया। अपने आपको तलाशने इतनी दूर चले गए कि हम उनसे बहुत पीछे छूट गए हैं। विदा, हिम्मत जी। नमन!