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अमर का केसरिया अमरत्व

Tue, 02 Dec 2014 08:48 PM IST
शरद उपाध्याय
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सच है, जब मुसीबत आती है, तो आदमी न जाने कहां-कहां हाथ-पांव मारता है। आजकल वह भी यही कर रहे हैं। उन्हें अचानक बोध हो गया है कि राजनीति में कोई ‘अमर’ नहीं होता। उनके अनुसार राजनीतिक आत्माएं न तो समाजवादी होती हैं और न ही कोई वाद उन्हें प्रभावित कर पाता है।  राजनीतिक ‘अमर’ आत्मा न पैदा होती है और न मरती है।
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राजनीतिक ‘अमर’ आत्मा विषाद को गैरजरूरी मानती है। वह कहती है कि दल से अनुराग रखना दर्शन के विरुद्ध है। तुम्हारा कौन-सा राजनीतिक स्वरूप चला गया, जो तुम रोते हो। तुम कौन-सा जन्मजात ‘समाजवाद’ लाए थे, जो तुमने खो दिया। तुमने कौन-से राजनीतिक मूल्य पैदा किए थे, जिसका नाश हो गया।

परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम पार्टी परिवर्तन समझते हो, वही तो सच्चा राजनीतिक जीवन है। एक क्षण में तुम सत्तासीन करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण नई पार्टी बनाते ही दरिद्र बन जाते हो। कभी तुम्हारे बिना महानायक परिवार का पत्ता भी नहीं हिलता, तो कभी वह तुम्हें पहिचानता भी नहीं है, यही जीवन है।
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न यह राजनीतिक शरीर किसी पार्टी का है, न राजनीतिक पार्टी किसी नेता की। यह अवसरवादी सत्तामय तत्वों से बना है और सत्ता के सूर्य में ही समा जाएगा। तू शिवसेना का हाल देखकर दुखी हो रहा है, वरिष्ठ नेताओं के हाल पर आंसू बहा रहा है। यहां न कोई किसी का भाई है, न मित्र। आदमी स्वयं के विकास के लिए राजनीति में आता है और अकेला ही विकसित होकर यहां से चला जाता है।

तुम मैक्समूलर के हीनोथिज्म का महत्व समझ। राजनीतिक भक्ति पूर्णतः अवसरवादी धारा पर आश्रित है। जैसा दिवस, वैसे ही देवता का पूजन साधक को शोभा देता है। अतः तुम अपने आपको ‘केसरिया’ सत्तामय भगवान को अर्पित करो। यही वर्तमान ग्रह व नक्षत्रों में सर्वोत्तम सहारा है। तुम ‘मुलायम’ स्वर से मोह न पालो। समाजवाद के पर्वत से सत्ता के पवित्र केसरिया महासागर में छलांग लगा दो, यही जीवन है। इसी में ‘अमर’ होना सार्थक हो जाएगा।
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