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नाम में ही सब धरा है

Thu, 30 Jul 2015 08:36 PM IST
प्रकाश पुरोहित
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मंत्रिमंडल को यह तो समझ में आ गया था कि व्यापम में कोई गड़बड़ नहीं है। गड़बड़ होती, तो हमारे मुख्यमंत्री साहब अब तक शुद्ध विधायक रह गए होते। सीधी-सी बात है कि सारा किया-धरा नाम का ही है। इसीलिए मंत्रिमंडल की जरूरी बैठक बुलाई है मुख्यमंत्री ने, कि इस मनहूस व्यापम का नाम ही बदल देते हैं। न रहेगा बांस और न फूटेगा किसी का सिर। हां, तो कुछ नया नाम सोचकर आए हैं आप लोग? मुख्यमंत्री ने फाइलें पलटते हुए पूछा।
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हमें तो सोचे हुए कई बरस हो गए। जब से आप आए हैं, हमने तो सोचना ही बंद कर दिया है, क्योंकि सब आप ही सोच लेते हैं। और फिर आपसे अच्छा-भला और कौन सोच सकता है? वरिष्ठ मंत्री ने मुख्यमंत्री को याद दिलाया।

आप लोग कुछ तो हाथ बंटाया कीजिए। मुख्यमंत्री ने ऊपर से क्रोध और अंदर से खुशी जताते हुए कहा।

हाथ तो बंटा दें, लेकिन आप तो दिमाग की बात कर रहे हैं। वह तो न जाने कब से उपयोग ही नहीं किया है। आपने याद दिलाया, तो हमें याद आया कि हम भी एक दिमाग रखा करते थे। एक और सीनियर, उर्फ मुख्यमंत्री पद के पुराने दीवाने ने कहा।
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यदि हम व्यापम का नाम व्यापक कर दें तो? पशुपालन से लोक निर्माण मंत्री बनने के अभिलाषी ने कहा।

वैसे ही व्यापम को व्यापक कहने लगे हैं लोग। व्यापक रख देंगे, तो भी पता नहीं चलेगा कि व्यापम नहीं कह रहे हैं।

सभी सोचने का अभिनय करने लगे। वैसे, सभी जानते थे कि करना-धरना तो मुख्यमंत्री को ही है, क्योंकि यह सारा किया-धरा भी तो उनका ही है।

ये आपके कुछ अफसर भी तो साहित्य-वाहित्य करते हैं न, उन्हीं को सौंप दीजिए। ले आएंगे कोई आड़ा-तिरछा नाम। अभी-अभी सीनियर हुए मंत्री ने सुझाया।

व्यापम भी तो अफसर का ही दिया नाम है।

तो यह तय रहा कि मुख्यमंत्री साहब जो नाम तय करेंगे, हमें मंजूर है। मगर किसी ने यह नहीं कहा कि जिसने किया है, वही भुगते भी। वैसे, सारे कहना यही चाहते थे। और कैबिनेट की महत्वपूर्ण बैठक समाप्त हो गई, महत्वपूर्ण फैसला लेकर।
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