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इस हम्माम में सब नंगे

Sun, 16 Jul 2017 05:58 PM IST
तवलीन सिंह
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तवलीन सिंह
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लालू यादव की सबसे बड़ी गलती यह है कि अपनी चोरियों को ढंग से छिपाना वह नहीं सीख पाए हैं। सीख गए होते, तो आज उनके और उनके परिजनों का यह हाल न होता। फिर से जेल जाने की नौबत शायद आन पड़ी है। वैसे जेल होती भी है, तो एक बड़े राजनेता होने के नाते उनको इतनी तकलीफ नहीं होगी, जितनी अपने भारत महान में मामूली चोरों को होती है। पिछले सप्ताह वीवीआईपी कारावास का थोड़ा-बहुत सबूत तब मिला, जब एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने अपने ही एक साथी पर आरोप लगाया कि उन्होंने शशिकला को जेल में विशेष सुविधाएं उपलब्ध करवाईं। अफवाह यह है कि इन सुविधाओं की कीमत दो करोड़ रुपये है। आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला अभी चल रहा है, पर इतना तो बहुत पहले साबित हो गया था कि शशिकला की दोस्त जयललिता की संपत्ति उनकी आमदनी से कहीं ज्यादा थी। इसी संपत्ति के कारण शशिकला जेल में हैं और राजनीति में भी।
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रही बात लालू यादव और उनके परिवार की, तो स्पष्ट हो चुका है कि उनकी संपत्ति भी आमदनी से अधिक है। यह कोई बड़ी बात नहीं है। जांच हो, तो यह जानकारी अवश्य मिलेगी कि अधिकतर भारतीय राजनेताओं की संपत्ति उनकी आमदनी से कहीं ज्यादा है। लालू जी की समस्या यह है कि वह बार-बार पकड़े जाते हैं। चोरी करने के मौके सबसे ज्यादा मुख्यमंत्रियों के पास होते हैं। सरकारी कामकाज में पारदर्शिता  इतनी कम है कि अनेक तरह से पैसे बन सकते हैं। सड़क का निर्माण करना हो, तो सौदा ऐसा तैयार किया जा सकता है, जिससे मुख्यमंत्री अपनी पसंद के किसी ठेकेदार को चुन सकें। ऊपर से जब किसी शहर के किसी क्षेत्र में जमीन को रिहायशी से व्यावसायिक में परिवर्तित करना हो, तो इतने पैसे बन सकते हैं कि मुख्यमंत्री जी अगला चुनाव हार भी जाएं, तो कोई बात नहीं। इस हम्माम में सब नंगे हैं, लेकिन चतुर चोर पकड़े नहीं जाते और नादान चोर पकड़े जाते हैं।

केंद्र में कुछ ऐसे मंत्रालय हैं, जिनको एटीएम मंत्रालय कहा जाता है। इनमें से एक है रेल मंत्रालय, जहां सीबीआई के मुताबिक, लालू जी ने बतौर रेल मंत्री बेशुमार धन इकट्ठा किया और दिल्ली और पटना में कोठियां, फार्म हाउस तथा व्यावसायिक इमारतें बना कर उसे छिपाया। कागजी तौर पर इन तमाम जायदाद की मिल्कियत अन्य कंपनियों के नाम पर हैं, लेकिन इनका अगर लालू जी से कोई वास्ता न होता, तो इनके परिजन इनके बोर्ड मे कैसे हुए हैं? इस सवाल का जवाब अगर लालू जी दे पाते हैं, तो बच जाएंगे, लेकिन अगर नहीं दे पाते, तो उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
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ऐसा कहने के बाद यह भी कहना जरूरी है कि जब लालू यादव कहते हैं कि उनके साथ यह जो हो रहा है, उसके पीछे राजनीति है, तो गलत नहीं कह रहे। ऐसा नहीं है कि सीबीआई पिंजरे का परिंदा है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि अगर केंद्र सरकार चाहे, तो सीबीआई की जांच रोकी नहीं जा सकती। बोफोर्स मामले में सीबीआई के जासूस जब सोनिया गांधी के दोस्तों के कुछ ज्यादा ही निकट पहुंचने लगे थे, तो उनको रोक दिया गया था।

भारत मे जब भी राजनीतिक भ्रष्टाचार की बात होती है, तब हमको बोफोर्स को याद करना चाहिए, क्योंकि इसी घोटाले से ही बड़े घोटालों का सिलसिला शुरू होता है। हमारी समस्या यह है कि हम बहुत जल्दी पुराने घोटालों को भूल जाते हैं। हो सकता है कि ऐसा इस बार भी हो जाए। राजनेताओं के भ्रष्टाचार को रोकने का एक ही तरीका है। वह है, सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाना।
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