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अलापन मामला: सियासी खेमेबंदी में फंसती नौकरशाही

अरुणेन्द्र नाथ वर्मा Published by: अरुणेंद्र नाथ वर्मा Updated Sat, 05 Jun 2021 07:40 AM IST
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पीएम मोदी, अलापन बंद्योपाध्याय और ममता बनर्जी - फोटो : Amar Ujala

भारतीय गणतंत्र को संसार के हर प्रजातांत्रिक देश में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। नौकरशाही विधायिका द्वारा बनाई नीतियों को जमीनी सच्चाई का रूप दे सके, इसके लिए जरूरी है कि वह उसके नीतिगत निर्देशों का पूरी लगन से पालन करे। सरकारें बदलती हैं, तो नौकरशाही जिन नीतिगत निर्देशों को व्यावहारिक रूप देती आई है, वे भी बदलते हैं। राजकाज को सुचारु रूप से चलाए रखने के लिए आवश्यक है कि नौकरशाही बदलती सरकारों के साथ अपना आचरण भी बदले। पर इसे किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के प्रति व्यक्तिगत स्वामिभक्ति का स्वरूप देना गणतंत्र को अधिनायकतंत्र में बदलने का पहला कदम होगा। सरकार के आदेशानुसार व्यवस्था चलाना एक बात है और सरकार द्वारा पिंजरे में बंद कर दिए गए तोते जैसा आचरण बिल्कुल अलग बात है।



मगर नौकरशाही दलगत राजनीति के चक्रव्यूह में बड़ी तेजी से फंसती जा रही है। भयानक प्राकृतिक आपदा के आने पर प्रधानमंत्री का आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करना, संबंधित राज्य सरकार के मुख्यमंत्री और शीर्षस्थ स्थानीय अधिकारियों से विचार विमर्श करके आपदा प्रबंधन की दिशा तय करना एक स्थापित शैली है। पश्चिम बंगाल और ओडिशा में आए भयानक चक्रवाती तूफान से प्रभावित इलाकों में प्रधानमंत्री मोदी का दौरा एक सामान्य-सा कार्य था। उनकी तरफ से दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मुख्य सचिवों को नुकसान के आकलन और अभीष्ट केंद्रीय सहायता के बारे में विचार-विमर्श करने के लिए बुलाने में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं था। लेकिन ममता बनर्जी बंगाल के चुनावों में मोदी के चुनावी भाषणों की आक्रामकता और मजाक उड़ाने से आहत थीं। इन चुनावों में दोनों पक्षों की तरफ से सामान्य शिष्टाचार की मर्यादाओं की अवहेलना हुई, लेकिन चक्रवात से नेस्तनाबूद अंचलों की विपदा भुलाकर अपनी प्रतिष्ठा स्थापित करने के लिए यह समय कदापि उपयुक्त नहीं था।


दुर्भाग्यवश दीदी ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के बीच स्थापित शिष्टाचार को भुलाकर इस अवसर को अपने आहत अहं की मरहम पट्टी के लिए इस्तेमाल करना उचित समझा। दो महत्वपूर्ण सांविधानिक हस्तियों की आपसी मुठभेड़ में व्यावहारिक शिष्टाचार (प्रोटोकॉल)  की अनदेखी अपने आप में दुर्भाग्यपूर्ण थी। लेकिन इस लड़ाई में अपने साथ राज्य के मुख्य सचिव पद पर आसीन एक अनुभवी नौकरशाह को भी घसीट लाना देश की संघीय संरचना की नींव पर हमला करने जैसा है। चाहे जितनी भी सफाइयां दी जाएं, वे इस प्रश्न का समाधान नहीं कर सकतीं कि मुख्य सचिव केंद्र सरकार के निर्देश के बावजूद प्रधानमंत्री की बैठक में क्यों शामिल नहीं हुए। विरोधी दल के नेता के रूप में उनके घोर अप्रिय शुभेंदु अधिकारी को बैठक में बुलाया जाना ममता दीदी को चाहे जितना भी अप्रिय लगा हो, मुख्य सचिव अलापन बंद्योपाध्याय को प्रधानमंत्री के आदेश की अवहेलना के लिए उकसाना किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता।


केंद्र सरकार द्वारा दिल्ली बुलाए जाने पर अलापन बंद्योपाध्याय का इस्तीफा दे देना, दिल्ली न आना और मुख्यमंत्री के सचिव का पद स्वीकार कर लेना कैसे वैधानिक है, जब तक कि केंद्र ने उनका इस्तीफा स्वीकार न कर लिया हो? आपदा प्रबंधन कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि आपदा प्रबंधन हेतु प्रधानमंत्री की बैठक में उपस्थित होने का आदेश न मानने पर एक साल तक की जेल हो सकती है। सरकार के एक अत्यंत वरिष्ठ अधिकारी द्वारा ऐसा करना गंभीर अनुशासनहीनता का द्योतक नहीं तो और क्या है? इतनी गंभीर गलतियां आलापन ममता दीदी के शह देने पर ही करते जा रहे हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। कल्पना कीजिए कि अगर दूसरे राज्यों के मुख्य सचिव भी ऐसा करने लगें, तो देश की संघीय व्यवस्था का क्या होगा! दुःस्वप्न में तो यह भी संभव है कि मुख्य सचिव, पुलिस महानिरीक्षक या राज्य का सर्वोच्च अभियंता मुख्यमंत्री की बैठक में अनुपस्थित होने के बाद कहे कि 'हम नौकरशाह प्रधानमंत्री के बुलावे पर नहीं जाते और कुछ नहीं होता, तो मुख्यमंत्री जी, आप किस खेत की मूली हैं?’ 


 

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