ये ऐसे उदाहरण हैं, जो विमानन सुरक्षा की कमजोर कड़ियों को ही उजागर करते हैं। ऐसे में, नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) द्वारा नॉन शेड्यूल्ड ऑपरेटर, जिनमें चार्टर्ड विमान, एयर एंबुलेंस इत्यादि आते हैं, के लिए नियमों को सख्त किया जाना स्वागतयोग्य कदम तो खैर है ही, यह विमानन क्षेत्र को अधिक विश्वसनीय बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल भी है। बेहतर होता कि यह कदम पहले ही उठा लिया जाता। खैर, डीजीसीए का यह कहना महत्वपूर्ण है कि सुरक्षा में चूक के लिए केवल पायलटों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, इसके बजाय संस्थागत स्तर पर भी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
उल्लेखनीय है कि भारत विश्व के सबसे तेजी से बढ़ते विमानन बाजारों में से एक है, जिसे हवाई यात्रियों की संख्या में निरंतर वृद्धि, नए एयरपोर्टों के निर्माण और निजी विमानन कंपनियों के विस्तार ने अभूतपूर्व गति दी है। इस तीव्र विस्तार के समानांतर सुरक्षा मानकों का सुदृढ़ीकरण नितांत जरूरी था। दुर्भाग्यवश, हालिया हादसे कहीं न कहीं निगरानी और अनुपालन के स्तर पर शिथिलता का ही संदेश देते हैं। नए नियमों के तहत सुरक्षा को व्यावसायिक हितों से ऊपर रखने और विमानन सेवा संचालकों को विमान की उम्र, रखरखाव की स्थिति व पायलट के अनुभव की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने के निर्देश महत्वपूर्ण हैं।
यह समझना होगा कि विमान हादसे महज आंकड़े नहीं होते, ऐसी हर दुर्घटना के पीछे एक मानवीय त्रासदी छिपी होती है। इसलिए, सुरक्षा से कोई समझौता स्वीकार्य नहीं हो सकता। यह भी ध्यान रखना होगा कि विमानन क्षेत्र में सुरक्षा कोई एक बार की कार्रवाई नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया है। हादसों के बाद नियमों को पहले भी कठोर किया जाता रहा है, लेकिन समय के साथ उनका प्रभाव कमजोर पड़ता जाता है। ऐसे में, डीजीसीए को सतत रूप से निगरानी, संसाधनों की उपलब्धता और ऑडिट की गुणवत्ता सुनिश्चित करनी होगी। विमानन क्षेत्र में विश्वास ही सबसे बड़ी पूंजी है और डीजीसीए के नए नियम लोगों के उसी भरोसे को पुनर्स्थापित करने की दिशा में अहम साबित होंगे, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।