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खेती-किसानी: कृषि निर्यात को चाहिए नया गंतव्य; इसके लिए भारत को लानी होगी व्यापार भागीदारों में विविधता

सार

भारत को केवल अमेरिकी बाजार पर निर्भर रहने के बजाय अपने कृषि निर्यात को अन्य देशों में विस्तारित करने की रणनीति अपनानी चाहिए।      
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स्ट्रॉबेरी की खेती - फोटो : बासित जरगर


अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने भारत को सामान्यीकृत वरीयता प्रणाली (जीएसपी) के दर्जे से बाहर कर दिया था। जीएसपी ने भारतीय कृषि और औद्योगिक उत्पादों को अमेरिकी बाजार में शुल्क मुक्त पहुंच की अनुमति दी थी, जिससे निर्यातकों और किसानों को लाभ हुआ। लेकिन जीएसपी रद्द करने के बाद चावल, प्रसंस्कृत खाद्य और डेयरी उत्पादों जैसी कृषि वस्तुओं सहित छह अरब डॉलर से अधिक मूल्य के निर्यात प्रभावित हुए। अमेरिका को भारतीय कृषि निर्यात अब भी दो से 10 फीसदी तक के टैरिफ का सामना कर रहा है, जिससे वे कम प्रतिस्पर्धी हो गए हैं।


भारत ने हमेशा घरेलू किसानों की सुरक्षा के लिए सुरक्षात्मक शुल्कों पर भरोसा किया है, जिसकी ट्रंप ने हमेशा आलोचना की है। ट्रंप प्रशासन के सख्त रवैये को देखते हुए भारत को जीएसपी का दर्जा मिलना मुश्किल है, जिसका सीधा असर भारतीय किसानों और निर्यातकों पर पड़ेगा, क्योंकि अमेरिका चावल, मसालों और दालों जैसे भारतीय कृषि उत्पादों के लिए महत्वपूर्ण बाजार है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे में अगर अमेरिका भारतीय कृषि उत्पादों पर टैरिफ बढ़ाता है, तो अमेरिकी बाजार में इन उत्पादों की कीमतें भी बढ़ेंगी, और उनकी मांग में कमी आ सकती है।


भारतीय किसानों, विशेषकर डेयरी क्षेत्र के किसानों को डर है कि सस्ते अमेरिकी आयात से घरेलू बाजार में व्यवधान उत्पन्न होगा। अमेरिकी डेयरी उद्योग विशाल भारतीय बाजार तक पहुंच चाहता है, जहां स्थानीय डेयरी किसान सरकारी सहायता और घरेलू खपत पर बहुत अधिक निर्भर हैं। अप्रतिबंधित अमेरिकी डेयरी आयात की अनुमति देने से छोटे भारतीय डेयरी किसानों पर गंभीर असर पड़ेगा, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में आय में कमी और बेरोजगारी बढ़ने की आशंका बढ़ेगी। अब तक भारत ने इस दबाव का विरोध किया है, लेकिन चर्चाओं ने कृषि क्षेत्र में अनिश्चितता पैदा कर दी है।


ट्रंप प्रशासन ने स्वच्छता और फाइटोसैनिटरी (एसपीएस) मानकों को कड़ा कर दिया, जिससे भारतीय कृषि उत्पादों के लिए अमेरिकी बाजार में प्रवेश करना कठिन हो गया। कीटनाशक अवशेषों के स्तर और पैकेजिंग आवश्यकताओं पर सख्त नियमों ने भारतीय निर्यातकों के लिए अनुपालन लागत बढ़ा दी है। डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों ने भारतीय कृषि क्षेत्र को कई नई चुनौतियों के सामने खड़ा कर दिया है।


भारत यदि अपनी कृषि नीतियों में सुधार करता है, निर्यात को विविधीकृत करता है, प्रोसेसिंग इंडस्ट्री को बढ़ावा देता है और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल रणनीतियां अपनाता है, तो इन चुनौतियों का समाधान निकाला जा सकता है। भारत को केवल अमेरिकी बाजार पर निर्भर रहने के बजाय अपने कृषि निर्यात को अन्य देशों में विस्तारित करने की रणनीति अपनानी चाहिए। यूरोपीय संघ, अफ्रीकी देश, मध्य पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया जैसे क्षेत्रों में भारतीय कृषि उत्पादों की मांग बढ़ाई जा सकती है। भारत को विभिन्न देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते करने चाहिए, जिससे भारतीय कृषि उत्पादों के लिए नए बाजार खुल सकें।

भारत को अपने किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए भी कृषि सुधारों को गति देनी होगी। सरकार को ऐसी नीतियां लागू करनी चाहिए, जो किसानों को सीधे बाजार तक पहुंच प्रदान करें, बिचौलियों की भूमिका कम करें और कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य को और मजबूत करें। किसानों को कच्चे उत्पादों के बजाय प्रोसेस्ड और पैकेज्ड कृषि उत्पादों की बिक्री के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। इससे किसानों को अधिक लाभ मिलेगा और निर्यात क्षमता भी बढ़ेगी। डिजिटल और स्मार्ट कृषि के माध्यम से किसानों को बाजार और मौसम की सटीक जानकारी दी जा सकती है, जिससे वे अपनी उत्पादकता बढ़ाने, इनपुट लागत कम करने के साथ उपज को बेहतर कीमत पर बेच सकें।
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भविष्य की भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं से होने वाले जोखिमों को कम करने के लिए, भारत को अपने व्यापार भागीदारों में विविधता के साथ अपने घरेलू कृषि क्षेत्र को मजबूत करना होगा और टिकाऊ खेती के लिए प्रौद्योगिकी का अधिकतम लाभ उठाना होगा। ऐसा करके ही भारतीय कृषि वैश्विक व्यापार गतिशीलता में बदलाव के सामने लचीली बनी रह सकती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी जगह बना सकती है।

         
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