द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जब अंतरराष्ट्रीय संबंधों में गठबंधन की राजनीति का वर्चस्व बढ़ा, तब बहुत से विकासशील देशों ने खुद को इससे अलग रखा और भारत के नेतृत्व में गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल हुए। अब आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध की विफलता की गंभीर वास्तविकता के बीच भारत एक बार फिर आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक आंदोलन शुरू करना चाहता है। बेशक एशिया और अफ्रीका के बहुत से देश आज आतंकवाद के खिलाफ युद्ध की रणभूमि बने हुए हैं, पर आतंकवादी नेटवर्क के खिलाफ, और आतंकी गतिविधियों में सक्रिय सहयोग करने वाले देशों के खिलाफ शायद ही कोई विश्वसनीय गठजोड़ है।
शीतयुद्ध के दौरान वैचारिक स्तर पर प्रतिस्पर्धी देशों अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ ने एक-दूसरे के खिलाफ गठजोड़ बनाया था। अमेरिकी गठबंधन शीतयुद्ध के बाद बचा रह गया, जबकि सोवियत समर्थित गठबंधन उसके विघटन के बाद ढह गया। नाटो, वार्सा संधि संगठन, दक्षिण पूर्वी एशिया संधि संगठन (सीईएटीओ), मध्य संधि संगठन (सीईएनटीओ) जैसे तमाम गठबंधन अपने शत्रु देशों को निशाना बनाते थे।
मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में देशों को निशाना बनाने के लिए किसी भी तरह के गठबंधन की जरूरत नहीं है। अमेरिका और चीन के बीच तथा रूस और अमेरिका के बीच रिश्ते तनावपूर्ण रहने के बावजूद ये देश एक-दूसरे को कट्टर शत्रु के रूप में नहीं देखते। भले ही चीन और अमेरिका विभिन्न मुद्दों पर एक-दूसरे पर संदेह करते हैं और कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर झगड़ा करते हैं, पर वे एक-दूसरे के सबसे मजबूत व्यापार और निवेश भागीदार में से एक हैं। विभिन्न मसलों पर रूस एवं अमेरिका में मतभेद हैं, पर वे सीरिया में व्याप्त गृहयुद्ध और परमाणु अप्रसार जैसे क्षेत्रों में लगातार सहयोग करते हैं।
दरअसल राष्ट्रों के बीच युद्ध बहुत मुश्किल हो गया है। इसकी एक वजह यह है कि हथियार एवं गोला-बारूद बहुत परिष्कृत हो गए हैं। फिर तेजी से वैश्वीकृत होती दुनिया में विभिन्न देश एक-दूसरे पर निर्भर भी हैं।
पर आतंकवाद आज एक कटु हकीकत है, जो स्टेट और नॉन-स्टेट ऐक्टर्स के बीच युद्ध है। आतंकवाद राज्य (देश) की अवधारणा के लिए सबसे बड़ा और तेजी से बढ़ता खतरा है। राष्ट्रों को अपने अस्तित्व के लिए दोहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। एक ओर वैश्विक ताकतें जहां अपरिहार्य वैश्वीकरण के चलते राष्ट्र की संप्रभुता से गंभीर रूप से समझौता करने के लिए मजबूर हुई हैं, वहीं राज्य को बचाने के लिए सरकार द्वारा प्रशासित कानूनों, नियमों, विनियमों और अनुशासनों का पालन करने से आतंकी नेटवर्क इन्कार करता है।
निश्चित रूप से वैश्वीकरण ने राष्ट्र के भीतर और राष्ट्रों के बीच असमानता को इस हद तक बढ़ाया है कि कमजोर और छोटे राष्ट्र खुद को बचाए रखने में असमर्थ हैं। शक्ति संतुलन में बदलाव, विश्व शक्ति के तौर पर अमेरिका का उत्तरोत्तर पतन, चीन का तेजी से उभार, विभिन्न महाद्वीपों में उभरती नई शक्तियां और ताकतवर देशों द्वारा क्षेत्रीय गठबंधनों में उतार-चढ़ाव ने विभिन्न राष्ट्रों पर भारी दबाव डाला है।
फिर भी राष्ट्रों के लिए आतंकवाद से बड़ी और कोई चुनौती नहीं है, क्यों? सबसे पहली बात तो यह है कि असंख्य विकासशील देशों में आतंकवाद अब एक घरेलू मुद्दा है। इसका जाल अमेरिका और यूरोप जैसे औद्योगिक और उन्नत देशों तक अच्छी तरह से फैल गया है। दूसरी बात यह है कि अमेरिकी नेतृत्व में नाटो सेना अफगानिस्तान में आतंकवाद से लड़ने में विफल रही है, अमेरिकी सेना की विफलता के बाद इराक में इस्लामिक स्टेट के उभार ने दखल दिया, और अरब क्रांति की विफलता के बाद लीबिया, यमन और सीरिया जैसे देशों में अन्य आतंकी संगठनों का उभार हुआ। यह बताता है कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में एक लचीली ताकत के रूप में आतंकवाद लंबे समय तक रहेगा। तीसरी बात, घातक हथियारों तक पहुंच के कारण आतंकी समूह पहले से बेहतर ढंग से हथियारों से लैस हैं। इस ताकत ने उन्हें लोगों में भय पैदा करने और राष्ट्रों के भीतर एक समानांतर शासन चलाने में सक्षम बनाया है। चौथी बात, अंतरराष्ट्रीय संचार एवं प्रौद्योगिकी क्रांति ने आतंकी नेटवर्क की भर्ती करने, तालमेल बनाने और लक्ष्यों पर हमला करने की क्षमता को मजबूत बनाया है। साइबर स्पेस की सुरक्षा बहुत कमजोर है और यहां तक राष्ट्र भी नियमों, संस्थानों और कानूनों के जरिये साइबर स्पेस सुरक्षा सुनिश्चित करने में सक्षम नहीं हैं।
आज आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक गठबंधन का कोई विकल्प नहीं है। खासकर इसलिए कि जो देश अपनी राष्ट्रनीति के एक उपकरण के तौर पर आतंकी नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं, उनके खिलाफ बाकी राष्ट्र एकजुट नहीं हैं। इस्लामिक स्टेट को छोड़कर बाकी अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का सबसे घातक स्रोत पाकिस्तान है। यह आतंकवाद का परमाणु हथियारों से लैस संरक्षक है। पाकिस्तान आतंकवादियों को पनाह, प्रशिक्षण और हर सुविधा देता है तथा सिर्फ भारत ही नहीं, अन्य देशों के खिलाफ भी उन्हें हमले करने की छूट देता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक गठजोड़ का जब आह्वान किया, तब रूस पाकिस्तान के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास के लिए तैयार हो गया, और चीन तो लगातार उसे गले लगा रहा है। जब तक राष्ट्र आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले देशों के खिलाफ एकजुट नहीं होंगे, तब तक वैश्विक या क्षेत्रीय स्तर पर कोई भी गठबंधन इस बीमारी से नहीं निपट सकता। इसका परिणाम राष्ट्रों के अस्तित्व और नागरिक समाज के लिए एक भयंकर चुनौती के रूप में सामने आएगा। इसके अलावा कमजोर देश वैश्विक व्यवस्था में निश्चित रूप से एक बड़ा छेद करेगा। इसलिए आतंकवाद-विरोधी वैश्विक गठजोड़ वक्त की जरूरत है।
रेक्टर (प्रो-वीसी), जेएनयू