फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

फिर से गरीबी हटाओ

तवलीन सिंह Published by: Raman Singh Updated Sun, 07 Apr 2019 07:00 PM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
तवलीन सिंह

इस सप्ताह जब लोकसभा चुनाव के लिए मतदान की प्रक्रिया शुरू होगी, तब वह मुद्दा शायद मुद्दा भी नहीं होगा, जो मेरी राय में सबसे बड़ा मुद्दा होना चाहिए। यह मुद्दा है सामंतवाद, जो दशकों से कांग्रेस की परंपरा में रहा है। सामंतवाद को बेशक समाजवाद का चोला पहना रखा है, लेकिन राहुल गांधी के हाल में दिए भाषणों पर आपने थोड़ा ध्यान दिया हो, तो आपको इनमें सामंतवाद की झलक दिखी होगी। ध्यान दीजिए, किस तरह उन्होंने न्यूनतम आय योजना भारत के गरीबों को देने की बातें की हैं।



कांग्रेस अध्यक्ष ने अपनी इस नई गरीबी हटाओ योजना का जिक्र ऐसे किया, जैसे हर वर्ष गरीबों को अपनी जेब से निकाल कर देने वाले हैं 72,000 रुपये। यह पैसा इस देश के करदाताओं का है, लेकिन इसको हम चूंकि ‘सरकारी’ पैसा कहते हैं, इसलिए अक्सर भूल जाते हैं कि यह पैसा किसका है। जनता भी यह भूल जाती है, क्योंकि वह सदियों से गरीब, अशिक्षित रही है।


सो उसको दिखता नहीं है कि जिस तरह राजा-महाराजा अकाल या किसी अन्य संकट के समय अपनी तिजोरियां खोलकर इस बहाने नए महल बनवाया करते थे कि वह अकाल के समय किसानों को रोज़गार देने का अच्छा साधन होता था, वैसे ही आज के लोकतांत्रिक दौर में कांग्रेस के नेता सत्ता में रहने (या लौटने) के लिए गरीबों को लुभाने के लिए काल्पनिक तिजोरियां खोलते हैं।


कांग्रेस के सामंतवादी चरित्र का एक उदाहरण यह भी है कि इस दल के समर्थक यह कहते आए हैं कि उनका ‘ब्रह्मास्त्र’ प्रियंका गांधी है। सो नरेंद्र मोदी को हराने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष ने परिवारवाद का यह ब्रह्मास्त्र निकाला है।


लेकिन हम पत्रकार चूंकि कांग्रेस के ‘सेक्यूलर’ चरित्र को भाजपा के ‘सांप्रदायिक’ चरित्र से ज्यादा पसंद करते हैं, ऐसे में बहुत कम पंडित हैं, जिन्होंने कांग्रेस को सामंतवादी कहा है। कांग्रेस के चौवालिस सांसदों में से हर दूसरा सांसद किसी राजनेता का वारिस है, लेकिन सेक्यूलरिज्म के बहाने हम इस पर भी ध्यान आकर्षित करने से कतराते हैं।


भारत को शर्मिंदा होना चाहिए कि स्वतंत्रता के सत्तर वर्षों में से पचपन वर्ष हम पर एक ही परिवार ने राज किया है। भारत को शर्मिंदा होना चाहिए कि इस चुनाव में विपक्ष की पैरवी न सिर्फ वही परिवार, बल्कि ऐसा गठबंधन कर रहा है, जिसमें ऐसे राजनीतिक दल बंधे हुए हैं, जो पूरी तरह सामंतवादी हैं। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक इस महागठबंधन में तकरीबन जितने दल हैं, सब विरासत में मिले हैं किसी वारिस को। यह सामंतवाद नहीं है, तो क्या है?


चुनावी दौरों पर मैं पिछले दिनों जब भी निकली हूं, गांवों और कस्बों में अधिकतर लोग मुझे ऐसे मिले हैं, जो खुलकर कहते हैं कि उनको नरेंद्र मोदी पसंद हैं, क्योंकि वह देश के लिए काम कर रहे हैं, अपने परिवार के लिए नहीं। सर्वेक्षण भी बताते हैं कि अधिकतर भारतवासी चाहते हैं कि मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बनें।
विज्ञापन


मोदी की गलतियां हमको दिखती हैं बहुत सारी, सो हम उन्हें गिनाते रहते हैं बिना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि को देखे। मेरी नजरों में उनकी सबसे बड़ी देन यही है कि पिछले पांच वर्षों के कार्यकाल में उनके परिवार का एक भी सदस्य सत्ता के मजे लूटने के लिए सामने नहीं आया है। आज भी उनकी वृद्ध माताजी उसी छोटे-से घर में रहती हैं, जहां पहले रहती थीं। प्रधानमंत्री निवास में जब वह आती हैं, तो मेहमान बनकर। असली लोकतांत्रिक देशों में ऐसा ही होता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next