पिछले सप्ताह जब प्रियंका गांधी के सक्रिय राजनीति में आने की फिर अफवाह फैली, तब मुझे याद आया कि कितनी बार मैंने यह अफवाह सुनी है। पहली बार तब सुनने में आई थी, जब प्रियंका की दादी प्रधानमंत्री थीं। उन दिनों प्रधानमंत्री निवास में पत्रकारों का आना-जाना काफी आसान था, सो हम जैसे लोग वहां जाया करते थे। ऐसे ही एक बार मुझे उनके किसी वफादार सेवक ने बताया था कि इंदिरा जी को पूरा विश्वास है कि उनकी असली वारिस उनकी पोती होंगी। ऐसा क्यों, जब मैने पूछा, तो सेवक ने कहा, इसलिए कि वह इस छोटी उम्र में ही राजनीति में रुचि दिखा रही हैं। टाइम मैगजीन आते ही वह उठा लेती हैं और पूरा पढ़ लेती हैं। उन दिनों अपने देश में एक या दो विदेशी पत्रिकाएं ही आया करती थीं और उनमें टाइम मैगजीन सबसे लोकप्रिय थी।
समय गुजरता गया। प्रियंका की दादी की हत्या के बाद उनके डैडी प्रधानमंत्री बने, फिर दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से उनकी भी हत्या कर दी गई। तब प्रियंका की मम्मी ने कांग्रेस को अपने परिवार की विरासत मानकर इसकी जिम्मेदारी संभाली। जब 2004 में केंद्र में उनकी सरकार बनी, तो सोनिया गांधी ने राहुल को विदेश से वापस बुलाया और अपनी राजनीतिक विरासत के बारे में समझाया।
राहुल भैया को भारत की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और ऐतिहासिक समस्याओं के बारे में बताने के लिए विशेषज्ञ नियुक्त किए गए, और 2009 में सक्रिय राजनीति में उतर कर उन्होंने अमेठी में जीत हासिल कर दिखाया। तब भी दिल्ली में प्रियंका के आने की बात होती थी। ऐसी अफवाहें फैलाने में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का सबसे ज्यादा हाथ होता था। उन्हें लगता था कि जनता के साथ मिलने-जुलने और भाषण देने में प्रियंका ज्यादा माहिर हैं। सो अमेठी-रायबरेली में ‘प्रियंका लाओ, कांग्रेस बचाओ’ के पोस्टर दिखते थे।
2012 में जब उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव हुए थे, तब प्रियंका ने अपने भैया और मम्मी के चुनाव क्षेत्रों की जिम्मेदारी संभाली थी। फिर भी इन जनपदों में कांग्रेस बुरी तरह हारी, पर किसी ने प्रियंका को दोष नहीं दिया, क्योंकि सब जानते हैं कि गांधी परिवार के बिना कांग्रेस कुछ भी नहीं है। कांग्रेस कार्यकर्ता यह भी जान गए हैं कि जब सोनिया और राहुल गांधी का जादू नहीं चला, तो अब कांग्रेस को बचाने के लिए प्रियंका के सिवा कोई है भी नहीं। प्रियंका के पति ने राजनीति में आने की घोषणा कई बार की, पर कांग्रेस में उनके समर्थक कम हैं, सो प्रियंका के राजनीति में सक्रिय होने की फिर से मांग उठ रही है।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की चुनावी जिम्मेदारी संभाल रहे प्रशांत किशोर चाहते हैं कि सूबे की मुख्यमंत्री प्रत्याशी के तौर पर प्रियंका का नाम घोषित किया जाए। प्रशांत किशोर ने जब प्रियंका का नाम लेना शुरू किया, तब हम सबको विश्वास होने लगा कि इस बार प्रियंका का राजनीति में आना लगभग तय है। हालांकि कांग्रेस की तरफ से उनका नाम तय नहीं हुआ है, पर खबर गर्म है कि प्रियंका इस बार अमेठी और रायबरेली के बाहर भी कांग्रेस का प्रचार करने के लिए निकलेंगी। क्या उनके आने से कांग्रेस की तकदीर बदल जाएगी? क्या मायावती और अखिलेश यादव जैसे स्थानीय राजनेताओं को प्रियंका चुनौती दे पाएंगी? यह कहना तो मुश्किल है, पर प्रियंका के आने से एक निष्क्रिय राजनीतिक दल में शायद नई ऊर्जा भर जाए।