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चुनाव में मुद्दा बनती भाषाएं : लोग अपनी मां और मातृभाषा से टूटकर प्यार करते हैं

उमेश चतुर्वेदी
Updated Mon, 08 Mar 2021 08:10 AM IST
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कोलकाता का परेड ब्रिगेड ग्राउंड - फोटो : सोशल मीडिया

स्वाधीनता के बाद से लेकर अब तक हुए चुनावों में हर बार तीन मुद्दों को राजनीतिक दल हवा देते रहे हैं। गांवों का उत्थान, गरीबी का समूल नाश और किसानों की स्थिति सुधारने जैसे वादों और दावों के इर्द-गिर्द अब तक का चुनावी अभियान केंद्रित रहा है। लेकिन संभवत: 1967 के बाद यह पहला मौका है, जब भाषाएं भी चुनावी अभियान का एक हिस्सा बनी हैं।



इन दिनों पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की प्रक्रिया जारी है। संयोग से पांचों राज्यों में स्थानीय संस्कृति और उपराष्ट्रीयताओं पर जोर देने की परिपाटी रही है। पश्चिम बंगाल के समाज को अपनी बांग्ला भाषा, अपनी संस्कृति और अपने पुरखों पर नाज है। पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज होने की तैयारी में जुटी भाजपा इस संस्कृति प्रेम को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश में है। उसके चुनाव घोषणा पत्र में बांग्ला भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने का वादा इसी का नतीजा है।


राज्य की सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी जिस मां, माटी और मानुष की बात करती हैं, उसकी नाभिनाल भी बांग्ला भाषा से जुड़ती है। इस बीच यहां एक और भाषा मुद्दा बन रही है। राज्य की करीब 80 सीटों पर जीत-हार का फैसला करने की स्थिति में हिंदी भाषियों के होने के चलते अब ममता बनर्जी हिंदी की भी बात कर रही हैं। हिंदी के विकास के लिए वह राज्य में हिंदी अकादमी का गठन तो कर ही चुकी हैं, उनकी पार्टी में भी हिंदी भाषी प्रकोष्ठ काम कर रहा है। स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में शायद पहला चुनाव है, जहां हिंदी भी सकारात्मक मुद्दा बनकर उभरी है।


यह संयोग नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इन दिनों तमिल भाषा न सीख पाने का ज्यादा मलाल है। तमिलनाडु में भी चुनाव हो रहा है। व्यक्ति पूजा केंद्रित तमिल राजनीति तो भाषा के मामले में 1937 से ही संवेदनशील रही है। इस राज्य में 1967 के चुनावों में भाषा भी अहम मुद्दा थी। तमिलनाडु को इस बात का गर्व है कि तमिल भारत की सबसे पुरानी भाषा है। वह शास्त्रीय भाषा भी है। तमिल संस्कृति और भाषा को लेकर राज्य की बड़ी आबादी संजीदा रही है।


शायद यही वजह है कि ऐन चुनावों के पहले प्रधानमंत्री ने तमिल न सीखने का जिक्र करके तमिल जनता के दिलों को छूने की कोशिश की है। पुडुचेरी की अधिसंख्य आबादी भी तमिलभाषी है। तमिल की बात यहां के लोगों के भी दिलों को छूती है। केरल भी ऐसा ही चुनावी राज्य है, जहां मलयालम भाषा को लेकर वहां के निवासी बेहद संजीदा रहते हैं। हालांकि अब तक किसी भी गठबंधन या दल ने यहां की भाषा को लेकर कोई बयान नहीं दिया है, लेकिन यह भी सच है कि यहां पूरी कोशिश मलयाली संस्कृति के जरिये ही मतदाताओं को रिझाने की हो रही है।


पूर्वोत्तर के असम में चूंकि भाषा ऐसा मसला है, जिसे सीधे छूना किसी भी दल के लिए आसान नहीं है। यहां एक तरफ बंगाली समुदाय का वर्चस्व है, जो अपनी बांग्ला संस्कृति और भाषा के प्रति बेहद आग्रही होता है, तो दूसरी तरफ असमिया मूल की भारी जनसंख्या है। ऐसे में किसी भी राजनीतिक दल के लिए भाषा को लेकर ऐसा रुख अपनाना चुनौतीपूर्ण है, जो पूरे प्रदेश के मतदादातों के दिलों को समान रूप से साध सके। वैसे असमिया और बांग्ला संस्कृति में काफी समानताएं हैं। इसलिए यहां के राजनीतिक दल असमिया संस्कृति के नाम पर भाषाओं के मुद्दों को थामने की कोशिश करते हैं।


चाहे तमिल हो या फिर बांग्ला या फिर हिंदी, मौजूदा चुनावों में इनकी चर्चा से भाषाकर्मी और भाषाविद आशावादी हैं। लेकिन कुछ अन्य भाषा बोलने वाले सवाल भी उठा रहे हैं। संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग करने वाले भोजपुरी भाषी समाज राजनीतिक दलों को अपनी मांग पर गौर न करने के लिए कोस रहा है। बांग्ला की बात हो या फिर तमिल या हिंदी की, मौजूदा चुनावों में उनकी पूछ की वजह है उनकी राजनीतिक ताकत। स्पष्ट है कि जहां की भाषा ताकतवर होती है, जहां के लोग अपनी मां और मातृभाषा से टूटकर प्यार करते हैं, वही भाषा राजनीतिक हथियार भी होती है।

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