देश के राजनीतिक दलों के बीच ऐसा सन्नाटा कभी खिंचा था, याद नहीं आता, और न यही याद आता है कि देश का हर नामचीन राजनीतिज्ञ इस कदर पोली जमीन पर कब खड़ा दिखाई पड़ा था! अरविंद केजरीवाल और इंडिया अगेंस्ट करप्शन के उनके साथियों को इस बात का पूरा श्रेय देना ही पड़ेगा कि देखते-देखते उन्होंने मुल्क की तासीर बदल दी है। आज उनकी और उनकी टीम की आलोचना में लोग चाहे जो भी कह रहे हों, रंग सभी के चेहरे के उड़े हुए हैं और सभी दिल-ही दिल में समझ रहे हैं कि चाहे जितना कुछ भी वे कहें, रंग कुछ जम नहीं रहा।
राजीव गांधी जब अपनी मां का उत्तराधिकार संभालने की जद्दोजहद में लगे थे, तब उन्होंने एक शब्द चलाया था, जिसे भाई लोगों ने बहुत उछाला। वह शब्द था, पावर ब्रोकर या सत्ता के दलाल। न वह शब्द नया था और न ऐसे लोग ही अनजान थे। लेकिन राजीव गांधी ने जब यह कहा, तब हवा यह बनाई गई कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का बेटा, जो देश का भावी प्रधानमंत्री है, देश की राजनीतिक बीमारी की जड़ पहचानता है और इसे जड़ से बदलना चाहता है। तब किसे पता था कि सत्ता की दलाली को निशाने पर लेने वाले राजीव गांधी आगे खुद ही दलाली की रकम के आरोप के ऐसे शिकार बनेंगे कि फिर वापसी नहीं कर सकेंगे। और इससे भी अधिक यह किसे पता था कि उनके जाने के वर्षों बाद, उनका दामाद सत्ता की दलाली के वैसे ही आरोप में घिर जाएगा, जिसकी बात उन्होंने बहुत जोर से उठाई थी! अब पूरी कांग्रेस अपने दामाद के लिए कवच खोजने और बनाने में लगी हुई है और अरविंद केजरीवाल तथा उनके साथी आगे निकल गए हैं।
सलमान खुर्शीद का मामला कितना फूटा, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन वह स्वयं किस कदर फूटे, यह सारे देश ने टेलीविजन पर देखा। याद आता है 1974-75 का दौर, जब केंद्रीय रक्षा मंत्री जगजीवन राम इंदिरा गांधी की टोली के माननीय सदस्य हुआ करते थे, तब पटना में जयप्रकाश-विरोधी एक सरकारी सभा में ऐसी ही फूहड़ बातें और चुनौतियां उछाल कर गए थे! पार्टी भी वही, खैरख्वाह भी वैसे ही और परिवार भी वही!! इतिहास इस तरह स्वयं को दोहराता है, यह देखना हैरान करता है। सलमान खुर्शीद अपनी धूल झाड़ें, इससे पहले ही भारतीय संस्कृति की पहरेदार पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी धुल गए। ऐसे धुले कि सारी पार्टी, सारा संघ परिवार और उनका लड़खड़ाता राजग, सभी सकते में आ गए!
इसके बाद शरद पवार की कुंडली लिखी गई। यह मुंबई के पूर्व पुलिस अधिकारी वाईपी सिंह ने लिखी। इंडिया अगेंस्ट करप्शन और सिंह साहब के बीच इसे लेकर कुछ गैर-जरूरी व बेमजा नासमझी जरूर हुई, लेकिन जो तीर चला, वह निशाने पर ही था। और फिर अब तक का अंतिम धमाका रिलायंस के गोदावरी गैस बेसिन को लेकर हुआ। इसे रिलायंस साम्राज्य पर हमला मानेंगे हम, तो भूल करेंगे। पिता अंबानी के साथ रिलायंस जहां से चला और बेटों के साथ वह जहां तक पहुंचा है, उसके पीछे कौन-सी ताकत है, इसका पता लगाने की जरूरत ही नहीं है। उस खुलासे के पीछे जो राजनीतिक ताकत काम कर रही है-अटल बिहारी वाजपेयी से चलकर मनमोहन सिंह तक की सरकारें-उसे पहचानने की जरूरत है।
अरविंद केजरीवाल एक राजनीतिक दल बनाने जा रहे हैं और चुनाव भी लड़ने जा रहे हैं। कई लोग कह रहे हैं कि वह अपने राजनीतिक दल की जमीन तैयार कर रहे हैं और चुनावी सफलता की गोटियां बिठा रहे हैं। तो इसमें गलत क्या है? राजनीतिक दल बनाना, उसकी जमीन तैयार करना, उसकी सफलता के आयोजन करना, ये सब कानूनसम्मत और सांविधानिक कर्म हैं। इसे करते हुए अरविंद केजरीवाल की टोली अगर कुछ अनैतिक करती है, फिसलती-गिरती है, तो सबके लिए मौका है कि वे उस पर पत्थर फेंके और उसे नुकसान पहुंचाएं, लेकिन इससे टीम केजरीवाल आज जो कर रही है, वह गलत तो नहीं हो जाता! दिक्कत यह है कि वह जो कर रही है, उससे संसदीय राजनीति में एक नया तत्व ही दाखिल होता जा रहा है, और वह तत्व है, आंदोलन की ऊर्जा से चलने वाली राजनीति।
आंदोलन की शक्ल में चुनाव! ऐसा तो कभी हुआ नहीं। हमारी दलीय-संसदीय राजनीति गिरते-गिरते यहां तक पहुंच गई है कि चुनाव ठेके पर दिए जाने लगे हैं। चुनाव जिताने वाले माफिया हैं, जिनकी शरण में सभी जाते हैं। ऐसा भी हुआ कि कई माफियाओं को ऐसा लगा, और ठीक ही लगा, कि जब हम ही तुम्हें चुनाव जिताते हैं, तो तुम्हें क्यों जितवाएं, हम खुद ही क्यों न जीत लें। इस तरह सारी पार्टियों में ऐसे लोगों का प्रवेश हो गया और दुर्भाग्य से वे ही पार्टी के प्रमुख चेहरे भी बन गए। उनके लिए यह समझना बहुत कठिन हो रहा है कि टीम केजरीवाल यह कहकर क्या कर रही है। कई समझदार लोग लिख रहे हैं कि सबकी टोपी इस तरह उछालने से लोकतंत्र थोड़े ही चल सकता है।
सलमान खुर्शीद ने तो कहा कि ये थर्ड क्लास लोग हैं! कोई कह रहा है कि ये सड़क छाप लोग हैं। लेकिन कोई यह नहीं बता रहा कि पूंजी-सत्ता-पार्टी-व्यापार-ठेकेदार-नौकरशाह-कॉरपोरेट-धार्मिक-व्यापारी के दायरे से बाहर जो देश खड़ा है, लोकतंत्र की वह शक्ति वर्तमान स्थिति में क्या करे? वह जब आरोप लगाती है, तो आप कहते हैं कि जाकर प्रमाण लाओ; वह प्रमाण लाती है तो आप कहते हैं, अदालत में जाओ! अगर उसे ही यह सब कुछ करना है, तो देश में सारी सांविधानिक व्यवस्था क्या है और क्यों है?
सन्नाटे में उठे इस शोर के लिए हमें अरविंद केजरीवाल और दूसरे सारे लोगों को धन्यवाद तो कहना ही चाहिए। बकौल फैज अहमद फैज: ओ दर्द के मारो, मुंह खोलो, चुप रहने वालों चुप कब तक/ कुछ शोर तो इनसे उट्ठेगा, कुछ दूर तो नाले जाएंगे!