अफगानिस्तान में हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। वहां हाल ही में अल्पसंख्यक समुदाय के सिखों-हिंदुओं पर निशाना बनाकर किए गए भीषण आत्मघाती हमले में 19 निर्दोष लोग मारे गए, जिनमें 12 सिख और हिंदू शामिल थे। तालिबान के दौर को छोड़ दें, तो वहां धर्म के आधार पर गैर मुस्लिम समुदाय के लोगों का ऐसा कत्लेआम पहले शायद ही हुआ हो। तालिबान ने सिखों व हिंदुओं की अलग से पहचान के लिए अपने बाजू पर पीले पट्टे बांधने का हुक्म दिया था। इसके बावजूद जानलेवा वारदातें हुई थीं। इस हमले की जिम्मेदारी अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन आईएस ने ली है, जिसमें 70 फीसदी लड़ाकू पाकिस्तान मूल के हैं और जिनकी जड़ें पाक की खुफिया एजेंसी आईएसआई और तालिबान से जुड़ी हुई हैं। इसलिए माना जा रहा है कि इस हमले के पीछे आईएसआई की साजिश है। अफगानिस्तान में सिख और हिंदू सदियों से साथ-साथ रहते आए हैं। अमानुल्लाह, जाहिर शाह जैसे बादशाहों की सरकारों में उनको बड़े-बड़े पद मिले हुए थे। दूसरी ओर, पाकिस्तान एक ऐसा देश है, जहां अल्पसंख्यक समुदाय के सिख-हिंदू ही नहीं, बल्कि ईसाई, पारसी, कादियान व शिया भी बहुसंख्यक सुन्नी मुसलमानों के निशाने पर आते रहते हैं।
अफगानिस्तान के शहर जलालाबाद में जो यह हमला हुआ, इसकी निंदा कई देशों ने की है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधि ने पाक का नाम लिए बिना कहा है कि अफगानिस्तान में आतंकवाद की समस्या स्थानीय नहीं है और वहां हमले उसके पड़ोसी देश स्थित पनाहगाहों से किए जा रहे हैं, जिसने तालिबान नेताओं को शरण दे रखी है और जो लश्कर-ए-तैयबा तथा जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों के एजेंडे का समर्थन करता है। याद रहे कि पाकिस्तान ने ओसामा बिन लादेन और मुल्ला उमर को पनाह दी। हाल ही में तहरीक-ए-तालिबान-पाकिस्तान के सरगना मुल्ला फजलुल्लाह का अफगानिस्तान में एक ड्रोन हमले में मारा जाना यही दर्शाता है।
काबिले गौर है कि अफगानिस्तान सातवीं सदी तक अखंड भारत का हिस्सा था। वह पहले एक हिंदू राष्ट्र था। बाद में बौद्ध राष्ट्र बना और उसके बाद वह इस्लामी मुल्क बन गया। अफगानिस्तान का इतिहास भारत से जुड़ा हुआ है। भारत अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में वर्षों से लगा हुआ है और वहां सड़कें, पुल और बुनियादी ढांचे की अनेक परियोजनाओं पर काम कर रहा है। पाकिस्तान व उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई को यह किसी सूरत में सहन नहीं। पाक चाहता है कि भारत अफगानिस्तान से निकल जाए और तालिबान शासन की तरह वहां कठपुतली सरकार हो, जो उसके इशारे पर नाचे। वर्षों की जंग और दहशतगर्दी के बाद तालिबान को यह एहसास हो जाना चाहिए था कि देर-सबेर अफगानिस्तान में शांति, विकास और खुशी के लिए उसे शांति बहाली के लिए बातचीत की मेज पर आना होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।दरअसल तालिबान की शर्त है कि बातचीत शुरू होने से पहले अमेरिका को अफगानिस्तान से निकलना होगा, जो मौजूदा हालात में संभव नहीं है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि वर्तमान गंभीर हालात में अफगानिस्तान में शांति बहाली कैसे होगी। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को पाकिस्तान पर स्पष्ट शब्दों में यह कहते हुए दबाव बनाना होगा कि वह और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई अफगानिस्तान में जारी हिंसक कार्रवाइयों को तुरंत बंद कर दे, वर्ना खामियाजे के लिए तैयार रहे।
हाल ही में पेरिस में 37 देशों की फाइनेंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की बैठक में आतंकवादियों की फंडिंग रोकने में नाकाम रहने के कारण उसका नाम ग्रे सूची यानि संदिग्ध देशों की सूची में डाल दिया है। इस्लामाबाद के खिलाफ ऐसे ही कुछ और कठोर कदम उठाने की जरूरत है।