नोटबंदी के असर ने अर्थव्यवस्था को बहुत नुकसान पहुंचाया है और आर्थिक विकास दर का अनुमान पहले ही नीचे खिसक चुका है। इसी दौरान वित्त मंत्री अरुण जेटली ने नोटबंदी के बाद कर संग्रह में वृद्धि का आंकड़ा पेश कर यह साबित किया है कि नोटबंदी का फैसला देश और अर्थव्यवस्था के लिए कितना अनुकूल था। आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से नवंबर तक अप्रत्यक्ष कर, जिसमें केंद्रीय उत्पाद शुल्क, सेवा कर और सीमा शुल्क आते हैं, के मोर्चे पर 5.52 लाख करोड़ रुपये की वसूली हुई, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 26.2 प्रतिशत अधिक था। मौजूदा वित्त वर्ष के शुरुआती आठ महीनों में (अप्रैल से नवंबर) उत्पाद शुल्क का संग्रह 2.43 लाख करोड़ रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 43.5 प्रतिशत अधिक था। जबकि बजट में उत्पाद शुल्क में 12.15 प्रतिशत बढ़ोतरी का लक्ष्य था। इस दौरान सेवा कर का संग्रह 1.6 लाख करोड़ रहा, जो 43.5 फीसदी अधिक था, जबकि बजट में लक्ष्य 10 फीसदी बढ़ोतरी का रखा गया था।
इसके बावजूद नोटबंदी से नुकसान तो हुआ ही। इसलिए आगामी एक फरवरी को अरुण जेटली जब संसद में बजट भाषण के लिए खड़े होंगे, तब उनसे अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए बुनियादी विकास के क्षेत्र में बहुत उम्मीदें होंगी। आम धारणा यह है कि बजट में लोगों पर आयकर का बोझ कम रखा जाएगा। इससे लोगों पर वित्तीय दबाव कम पड़ेगा, उनके पास ज्यादा पैसा बचेगा, जिससे खर्च और उपभोग में वृद्धि होगी।
अभी ढाई लाख रुपये तक की सालाना आय पर आयकर नहीं लगता। उम्मीद यह है कि बजट में छूट की इस सीमा को बढ़ाकर साढ़े तीन लाख किया जाएगा। आयकर छूट की सीमा बढ़ेगी, तो वस्तुओं और सेवाओं की मांग बढ़ेगी। इसके साथ, यह उम्मीद भी है कि आयकर की धारा 80 सी में कटौती की सीमा मौजूदा डेढ़ लाख से बढ़ाकर दो लाख की जाएगी। छूट में इस वृद्धि से दो चीजें सुनिश्चित होंगी-एक यह कि करदाता दीर्घावधि के रिटायरमेंट प्रोडक्ट्स में निवेश करने में रुचि लेंगे। दूसरे, इससे सरकार को भी दीर्घावधि की बुनियादी संरचनाओं के निर्माण के लिए फंड की नियमित व्यवस्था होती रहेगी।
इन्हें सिर्फ जनता की उम्मीद नहीं मानना चाहिए, बल्कि मानने का कारण है कि बजट में ये कदम उठाए जाएंगे, क्योंकि खुद सरकार ऐसा करना चाहती है, ताकि उसकी आर्थिक नीतियां जारी रहे और नोटबंदी से अर्थव्यवस्था को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई हो सके। बजट में निश्चित तौर पर कैशलेस अर्थव्यवस्था को आकार देने के लिए डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहित करने का कदम उठाया जाएगा। हम इसी दौरान नेशनल पेमेंट काउंसिल ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) द्वारा डिजिटल भुगतान करने वाले को पुरस्कृत करते देख रहे हैं। आम आदमी इस तरह के पुरस्कारों से बहुत उत्साहित होता है। फिर इस तरह के उपायों से डिजिटल भुगतान का इस्तेमाल भी बढ़ेगा। बैंक और पॉइंट ऑफ सेल टर्मिनल मुहैया कराने वालों के पास इस बीच ऐसे टर्मिनल की मांग बहुत बढ़ गई है। इसके अलावा डिजिटल मनी एप डाउनलोड करने में भी तेजी आई है। ये सारी चीजें कैशलेस अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ने के बारे में ही बताती हैं।
ये तमाम कदम उठाने का नतीजा यह होगा कि बजट में इसका साफ संकेत मिल जाएगा कि करों के मोर्चे पर कितनी राशि इकट्ठा हुई है और विकास कार्यों के लिए कितनी राशि का आवंटन किया जा सकता है। नोटबंदी के बाद आर्थिक व्यवस्था में क्षमता और पारदर्शिता जिस तरह बढ़ी है, उससे न केवल अर्थव्यवस्था में नकदी की उपलब्धता बढ़ेगी, बल्कि मांग में भी वृद्धि होगी। इससे सरकार को बुनियादी ढांचे में निवेश करने में मदद मिलेगी।
चूंकि 31 मार्च से पहले सरकारी कर्मचारियों को वेतन आयोग का बकाया भी मिल जाएगा, जिससे उपभोग में वृद्धि होगी। हाल के दिनों में सीपीएसई ईटीइफ के विनिवेश से भी, जो म्यूचुअल फंड योजना की तरह काम करता है, आर्थिक गतिविधियों में गति आएगी। बजट में इसी तरह के और कदम उठाए जा सकते हैं।
उदाहरण के लिए, कर कानूनों को सरल बनाने का काम हो सकता है। इनकम टैक्स सिंपलीफिकेशन कमेटी ने इस संबंध में अपनी सिफारिश सरकार को पहले ही सौंप दी है। आयकर कानून को सरल करने से न केवल आयकरदाताओं का दायरा बढ़ेगा, बल्कि करदाताओं और औद्योगिक समुदायों के बीच भी यह धारणा मजबूत होगी कि सरकार इस मामले में संजीदा है। इसी तरह सरकार को कर विवादों में मुकदमेबाजी का बकाया घटाने के साथ ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए, जिससे मामलों का त्वरित समाधान हो।
इन तमाम कदमों पर अमल से वित्त मंत्री को बजट में बुनियादी क्षेत्रों में अधिक निवेश करने और आर्थिक विकास बढ़ाने के लिए निजी और सार्वजनिक निवेश बढ़ाने में मदद मिलेगी। तुलनात्मक रूप से कम ब्याज वाली छोटी कृषि और हाउसिंग लोन योजना तथा प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत ग्रामीण इलाकों में गरीबों के लिए बननेवाले घरों से 2017-18 में पूंजी और राजस्व खर्च बिल, दोनों बढ़ेंगे।
ऐसे ही कौशल विकास योजना से रोजगार में बढ़ोतरी की उम्मीद है। बजट में इन घोषणाओं से 'मेक इन इंडिया' और 'स्टार्ट-अप इंडिया' को भी गति मिलेगी। इसी तरह से आयकरदाता इस बजट में रीइंबर्समेंट और भत्तों के संबंध में वित्त मंत्री से अधिक स्पष्टता की उम्मीद कर सकते हैं। अब तक इस मामले में भ्रम यह रहता था कि दावे किस तरह किए जाएं। मध्य वर्ग पर करों का बोझ कम करने के लिए इस बार 15 फीसदी के टैक्स स्लैब की भी उम्मीद की जा सकती है।
कुल मिलाकर, आनेवाला बजट वित्त मंत्री के लिए अर्थव्यवस्था को गति देने का अवसर बनेगा, जिससे आम लोग भी लाभान्वित होंगे।
लेखक आउटलुक मनी के संपादक हैं