फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

उपलब्धि है, अलादीन का चिराग नहीं

Thu, 04 Aug 2016 07:48 PM IST
शंकर अय्यर
विज्ञापन
शंकर अय्यर
विज्ञापन
वर्ष 2000 में सचिन तेंदुलकर टेस्ट एवं एकदिवसीय क्रिकेट में 46 शतक जड़कर अपने करियर के शिखर पर थे। ब्रिक्स का गठन नहीं हुआ था। भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 457 अरब डॉलर था। भारतीयों की प्रति व्यक्ति आमदनी 452 डॉलर थी। 1991 के आर्थिक संकट के एक दशक बाद विदेशी मुद्रा भंडार में 38 अरब डॉलर जमा थे। सरकार ने करीब दो लाख करोड़ रुपये राजस्व के रूप में एकत्र किया था। और देश की आबादी बस सौ करोड़ के पार हुई ही थी। उसी वर्ष पहली बार 'एक देश-एक कर' यानी वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की परिकल्पना की गई थी। नवंबर, 1999 में राष्ट्रव्यापी वैट लागू होने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ एक बैठक की, जिसमें एकीकृत कर व्यवस्था की जरूरत बताई गई। उसके बाद वित्त मंत्रियों की एक समिति और विजय केलकर के नेतृत्व में एक टास्क फोर्स का गठन किया गया। पर वह विचार क्षुद्र राजनीति का शिकार हो गया-भाजपा और कांग्रेस का रुख इस पर निर्भर था कि वे सत्ता में हैं या विपक्ष में।
विज्ञापन


बुधवार को राष्ट्र ने 'एक भारत-एक कर' के सपने की दिशा में एक कदम बढ़ाया। इसमें सोलह वर्ष लगे, जिस दौरान तीन सरकारें चुनी गईं, देश ने पांच वित्त मंत्रियों और तीन प्रधानमंत्रियों को देखा। इस दौरान जीडीपी चार गुना बढ़कर दो ट्रिलियन (20 खरब) डॉलर और प्रति व्यक्ति आय 1,500 डॉलर से ज्यादा हो गई। विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर 350 अरब डॉलर से ज्यादा और सरकार का राजस्व 17 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया। देश की आबादी बढ़कर 131 करोड़ से ज्यादा हो गई। और हां, सचिन तेंदुलकर ने सौ शतक बनाकर संन्यास ले लिया, अब वह राज्यसभा के सदस्य हैं।

जाहिर है, भारत ने अच्छा प्रदर्शन किया है, पर वह इससे बेहतर प्रदर्शन कर सकता है, बशर्ते राजनीतिक वर्ग राष्ट्र को सबसे पहले रखें। अब जीएसटी का सपना तो साकार होता दिखता है, पर इसका भारत और भारतीयों के लिए क्या मतलब है? बेशक जीएसटी एक बहुत बड़ा कदम है, जो न सिर्फ दक्षता बढ़ाएगा, बल्कि उत्तर प्रदेश, बिहार और ओडिशा जैसे कम औद्योगिक राज्यों में उद्योगों को फैलाएगा और निवेश को प्रोत्साहित करने के साथ व्यवसाय को आसान बनाएगा।
विज्ञापन


यह समझना होगा कि कई चरणों में से यह पहला कदम है। जीएसटी को वास्तविक रूप देने के लिए अभी कई कदमों का इंतजार करना होगा-राज्यों द्वारा पूरक राज्य जीएसटी विधेयक पारित होना, दरों पर समझौता, जीएसटी नेटवर्क-ये सभी चुनौतियां हैं। यदि जीएसटी लागू भी हो गया, तो यह प्रभावी शासन की दिशा में एक कदम होगा, न कि गंतव्य की दिशा में। जीएसटी अर्थव्यवस्था की बीमारियों का समाधान नहीं है-निश्चित रूप से यह अलादीन का चिराग नहीं है।

एकीकृत कर प्रणाली नई नहीं है। 140 से ज्यादा देशों में यह लागू है। अभी उत्पादकों को कई तरह के कर चुकाने पड़ते हैं। इससे देरी होती है, भ्रष्टाचार बढ़ता है और लागत में वृद्धि होती है। जीएसटी इन सभी स्तरों को पाट देगा। पर इसका लाभ किसे होगा? इसका सबसे ज्यादा फायदा सरकार को होगा। जीएसटी 17 तरह के करों को एक में मिला देगा, यह संग्रह क्षमता बेहतर होने का वायदा करता है, भ्रष्टाचार और जीएसटी नेटवर्क प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल के बाद कर चोरी में कमी होगी। दूसरा सबसे बड़ा लाभ उत्पादकों को होगा-कागजी कार्यवाही कम होगी, देरी नहीं होगी, कम लागत पर वस्तुओं का तेजी से परिवहन संभव होगा।

इससे करदाताओं को क्या मिलेगा, यह एक बड़ा सवाल है, जिसका जवाब मिलना शेष है। यह इस पर निर्भर करेगा कि वित्त मंत्रियों की समिति और केंद्र सरकार वर्तमान स्थिति को भविष्य के साथ कैसे जोड़ती हैं। अनुमान है कि जीएसटी से जीडीपी में 0.7 फीसदी से 1.5 फीसदी की बढ़ोतरी होगी। जीडीपी में वृद्धि कई चीजों पर निर्भर करती है और यह भविष्य की बात है।

सबसे बड़ा सवाल जॉन-जानी-जनार्दन का है कि इसमें मेरे लिए क्या है। सिद्धांत बताता है कि बेहतर अनुपालन, कम चोरी, कम भ्रष्टाचार से सरकार की आय और कॉरपोरेट घरानों की बचत में बढ़ोतरी होगी। सवाल है कि इसका लाभ लोगों को कितना होगा। यह विकास की राजनीति और पुनर्वितरण पर निर्भर करता है। संसद में हर सांसद ने दोआयामी रुख अपनाया-राष्ट्र के धन की रक्षा करना और दरों को कम रखना। प्रतिस्पर्धी हितों और परस्पर-विरोधी उद्देश्यों के साथ सामंजस्य बिठाना सरकार की सबसे बड़ी चुनौती है।

करदाताओं को इससे कितना लाभ होगा, यह इस पर निर्भर करेगा कि दर कैसे तय की जाती है। मुख्य आर्थिक सलाहकार की अध्यक्षता में बनी समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि न राज्यों के राजस्व को नुकसान हो, न ही केंद्र को, यानी जीएसटी की दर 17 से 19 फीसदी के बीच हो। आशंका है कि मध्यवर्ग और वेतनभोगी वर्ग को दूरसंचार, स्वास्थ्य सेवा, बीमा, शिक्षा आदि पर ज्यादा खर्च करना पड़ेगा। ऐसे कई संदेह हैं, जिसके चलते कई सांसदों ने जीएसटी दर की एक सीमा की जरूरत पर जोर दिया।

यदि सरकार वाकई इसे आजादी के बाद का सबसे बड़ा सुधार बनाना चाहती है, तो उसे अपनी कथनी से आगे बढ़ना होगा। जीएसटी की शुरुआत सरकारों के लिए अच्छी और बुरी रही है। कुछ ने चुनाव में जीत हासिल की, तो बहुतों को जनादेश खोना पड़ा। राजनीति संभावनाओं की कला है। सरकार के सामने वर्तमान को भविष्य के साथ जोड़ने के लिए अनुसंधान, विश्लेषण और मुश्किलों से पार पाने की चुनौती है। जीएसटी की शुरुआत के साथ बड़े सुधारों की जरूरत है। अकेले जीएसटी पर्याप्त नहीं है। इसका पहला सिद्धांत यही है कि कम दर निर्धारित होनी चाहिए। दर कम रहने पर राजस्व में बढ़ोतरी होगी। इसलिए यह सरकारी खर्च में कटौती का भी अवसर है। बेकार के मंत्रालयों को बंद करें, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को बेच दें और पैसे-पैसे का हिसाब रखें। सबसे महत्वपूर्ण यह कि इसे राज्यों को सशक्त बनाने के अवसर के रूप में लें-उन्हें स्वयं नीति तैयार करने और नतीजा देने दें।
विज्ञापन


-वरिष्ठ पत्रकार एवं एक्सीडेंटल इंडिया के लेखक
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें