अब्बा को जब देखो, गालियां ही सूझती रहती हैं। वह साइज भी नहीं देखते कि छोटी गाली दे रहे हैं या बड़ी। न ही उम्र का करते हैं लिहाज। बस जब शुरू हो जाते हैं, तो रुकने का नाम तक नहीं लेते। असल में लोगों का गाली देने का अपना-अपना तरीका और स्टैंडर्ड होता है। यह जरूरी नहीं कि नासमझ ही गालियों का इस्तेमाल करते हैं, बल्कि टाई-सूट पहने लोगों की मोटी समझदानी में से भी गालियों के गुल निकलकर खिलते हैं। जितनी बड़ी गाली, सामने वाले पर उतना बड़ा दबदबा और आसपास के माहौल में रुआब अलग!
गाली कोई ऐरी-गैरी चीज नहीं है। गाली की भी समाज में एक पहचान रही है। हर शख्स इससे भली-भांति परिचित है। सुबह से लेकर शाम तक बिना थके ये न जाने कहां-कहां तक का सफर तय कर डालती हैं। असल में, गाली पेश करने के अपने-अपने ढंग होते हैं। कोई साधारण-सी बात पर ही पूरी अंताक्षरी सुना देता है, तो कोई संसद में देकर लाइमलाइट में आ जाता है। गाली देने वाले की कोई जाति या बिरादरी नहीं होती। बिना झिझके, बिना पूछे किसी को जब जी चाहे, किसी भी एंगल से शान से सुना डालो। यह मामला फ्री ऑफ कास्ट का है भाई।
अगर गाली का भी कोई बाजार होता, तो सोचा जाता। गाली अमीर भी देता है और गरीब भी। बस गाली देने के स्टाइल में फर्क होता है। गरीब की जब किसी से ठन जाती है, तो वह दहाड़ता हुआ सीधा नुक्कड़ या सड़क पर आता है, क्योंकि जब वह अपने मुख से शानदार अंतरे निकालता है, तो वही उसकी पहचान कराते हैं। लेकिन जब अमीर की किसी से ठनती है, तो वह सड़कों की धूल नहीं फांकता, बल्कि ग्लैमरस स्टाइल में चुप रहता है। उसकी गाली की आवाज किसी के कानों से नहीं टकराती, बल्कि नजर से बयां होती है।
इसलिए आज जरूरी है कि गालियों के लिए भी एक अलग सेंसर बोर्ड बने। जितनी प्रभावशाली गाली होगी, उतनी ही जल्दी वह बोर्ड द्वारा पास होगी।