भारत ने आतंकवाद के खिलाफ एक बड़ी कार्रवाई को अंजाम देते हुए नियंत्रण रेखा के पार पाकिस्तान में घुसकर बालाकोट स्थित आतंकी शिविरों को पूरी तरह से तबाह कर दिया है। यह कार्रवाई हाल ही में पुलवामा में हुए आत्मघाती बम हमले के जवाब में की गई, जिसमें सीआरपीएफ के चालीस जवान मारे गए थे। पुलवामा हमले को लेकर पूरे देश में आक्रोश और गुस्से की भावना देखी गई तथा सार्वजनिक रूप से पाकिस्तान से प्रतिशोध लेने की मांग होने लगी। उस हमले के पीछे जैश-ए-मोहम्मद और पाकिस्तानी सेना का हाथ था। उस हमले ने भारत के समक्ष एक चुनौती पेश कर दी थी कि भारत पाकिस्तान को कैसे इसका जवाब देता है। प्रधानमंत्री मोदी ने सैन्य विकल्पों का चुनाव हमारे सशस्त्र बलों की पसंद पर छोड़ दिया था, जो अपना काम बेहतर जानती है।
भारत द्वारा पाकिस्तान की आतंकी जड़ों पर इस हवाई हमले से पाकिस्तान और दुनिया को कई किस्म के संदेश देने की कोशिश की गई है। पहला तो यह कि अब भारत के सब्र की हद पार हो चुकी है और भारत नियंत्रण रेखा से आगे जाकर पाकिस्तान स्थित आतंकी ठिकानों पर हमला करने के लिए तैयार है, जिनको पाकिस्तान इतने वर्षों से पनाह देता आया है। इससे भारत के समर्थन में खड़े दुनिया के देशों को भी यह संदेश दिया गया है कि भारत अपनी सुरक्षा के लिए उनके पास नहीं आता है, बल्कि भारत को उनकी मदद इसलिए चाहिए कि वे आतंकवाद को पनाह देने वाले पाकिस्तान को अलग-थलग करें और पाकिस्तान की आर्थिक कमर तोड़ दें, ताकि वह आतंकवाद को पनाह देना बंद करे। पाकिस्तानी सेना के जनरलों को यह एहसास हो जाए कि जिन आतंकवादियों को उन्होंने इतने वर्षों से पाला-पोसा है, अब वही आतंकवादी उनके लिए आर्थिक बोझ बन चुके हैं।
दूसरा संदेश यह है कि हमारे पास पाकिस्तान से संचालित आतंकी खबरों की खुफिया जानकारियां हैं। हमने इटेलिजेंस खबरों का एक डाटाबेस बना रखा है, जिसके बारे में हमने दुनिया के साथ ही पाकिस्तान को भी बार-बार बताया है। लेकिन पाकिस्तान कहता है कि उसे ऐसी गतिविधियों की जानकारी नहीं है! इस हमले के जरिये हमने बता दिया है कि अगर पाकिस्तान आतंकियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करना चाहता, तो हम कर सकते हैं। तीसरा हमने यह संदेश दिया है कि भारत आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई कश्मीर के अंदर भी लड़ सकता है और कश्मीर के बाहर पाकिस्तान में भी। जैसा कि अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था, 'हम आर-पार की लड़ाई लड़ने को तैयार हैं।' अब अगर पाकिस्तान इसका जवाब देने की कोशिश करता है, तो दुनिया भर में यह साबित हो जाएगा कि पाकिस्तान इन आतंकवादियों का संरक्षक है। उसके समक्ष यह समस्या पैदा हो गई है कि दुनिया के सामने खुद को आतंकवाद का पीड़ित बताने वाला पाकिस्तान अब स्वयं को कैसे पीड़ित बताएगा, जबकि आतंकवादियों को पनाह देता है।
पाकिस्तान को अब अपनी जनता को भी यह जवाब देना पड़ेगा कि इतने वर्षों से उसकी सेना ने इतना पैसा खुद पर खर्च किया, तो सेना क्यों उनकी हिफाजत नहीं कर पा रही है। इसका पाकिस्तान कैसे मुकाबला करता है, हमें देखना पड़ेगा। लेकिन इस कार्रवाई के बाद यह तो जरूर है कि पाकिस्तान दो-तीन कदम उठाएगा। पहला तो यही कि वह हिंदुस्तान में और आतंकी हमले करवाने की कोशिश करेगा। आतंकवादियों और भारत में अपने पाले-पोसे समर्थकों को वह भारत-विरोधी कदम उठाने के लिए उकसाएगा। इसके अलावा वह सीमा पर फौज की भारी मात्रा में तैनाती करेगा और कहेगा कि हम हमले के बारे में सोच रहे हैं। इसके साथ वह परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की भी धमकी देगा। उसका यह मकसद होगा कि वह दुनिया को दिखाए कि पाकिस्तान अब भारत से लड़ने के लिए तैयार है और इसी धमकी से दुनिया के बड़े-बड़े देशों को कश्मीर मुद्दे पर हस्तक्षेप करवाने की कोशिश करेगा।
कुछ लोगों को आशंका हो सकती है कि युद्ध छिड़ने की स्थिति में दोनों ओर से एक बटन दबाकर परमाणु हथियारों से दूसरे को मिटाया जा सकता है। लेकिन ऐसी आशंका करने वाले बहुत कम जानते हैं कि अगर परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किया जा सकता है, तो युद्ध कब और कैसे लड़े जाते हैं। वास्तव में, द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत में अमेरिका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी पर बम विस्फोट को छोड़कर परमाणु युद्ध का अध्ययन परमाणु हथियारों के गैर-उपयोग के अध्ययन पर आधारित है। पाकिस्तानी सेना अपनी सीमाएं जानती हैं और इसलिए भारत को उलझाने के लिए आतंकवादियों का इस्तेमाल करती है।
यह धारणा भी गलत है कि अगर भारत ने अन्य सभी राजनयिक, आर्थिक और भू राजनीतिक विकल्प समाप्त होने के बाद पाकिस्तान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया, तो चीन पाकिस्तान के समर्थन में आ जाएगा। बेशक चीन ने पाकिस्तान में सीपीईसी और ग्वादर पोर्ट के अलावा पाक अधिकृत कश्मीर के उत्तरी क्षेत्र में सिंधु पर कुछ बड़े बांधों से माध्यम से बहुत बड़ा निवेश किया है, लेकिन चीन हमेशा अंतरराष्ट्रीय राय के खिलाफ नहीं जाने के प्रति सावधान रहा है, जब तक दक्षिण चीन सागर जैसे उसके अपने एजेंडे को चुनौती नहीं दी जाती। हम जानते हैं कि चीन ने 1965, 1971 के भारत-पाक युद्ध और कारगिल संघर्ष के दौरान पाकिस्तान के पक्ष में हस्तक्षेप नहीं किया था।
इस हवाई हमले के अलावा भारत पाकिस्तान पर दबाव बनाए रखना जारी रखेगा। एक तो सिंधु नदी के जल को लेकर और दूसरा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे कूटनीतिक प्रयासों से अलग-थलग रखकर उसकी आर्थिक कमर तोड़ने की कोशिश करेगा। भारत को सावधान रहने की भी जरूरत है, जैश और पाकिस्तान, दोनों भारतीय शहरों और नागरिकों पर हमले की कोशिश कर सकते हंै, क्योंकि मसूद अजहर का भाई भी इस हवाई हमले में मारा गया है। इस हमले का एलान विदेश सचिव ने किया, रक्षा सचिव ने नहीं, इससे साफ है कि यह सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि आतंकवादी विरोधी कार्रवाई थी। पूरे देश के आला अधिकारियों से विचार-विमर्श के बाद इस ऑपरेशन को अंजाम दिया गया है। इस हवाई हमले का सबसे बड़ा संदेश यह है कि हम अपनी लड़ाई खुद ही लड़ने में सक्षम हैं और इसके जो भी परिणाम होंगे, उसे झेलने के लिए भी तैयार हैं।