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तमाशों पर वक्त बर्बाद करती आप

Tue, 16 May 2017 11:00 AM IST
तवलीन सिंह
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तवलीन सिंह
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जो लोग हारना नहीं जानते, उनको राजनीति में आना ही नहीं चाहिए। इसे राजनीतिज्ञ अक्सर अच्छी तरह से समझते हैं। लेकिन ऐसा लगने लगा है कि आम आदमी पार्टी के लोग यह अभी तक नहीं समझ पाए हैं। सो जब से पंजाब और गोवा के विधानसभा चुनावों और दिल्ली नगर निगम के चुनाव में आप को हार का सामना करना पड़ा है, उसने चुनाव आयोग पर ऐसे आरोप लगाए हैं, जो सही होते, तो भारत में लोकतंत्र ही न होता। पिछले सप्ताह दिल्ली विधानसभा में नकली ईवीएम में गड़बड़ करके जो तमाशा खड़ा किया गया, वह कभी नहीं होता, अगर आप के बड़े नेताओं को थोड़ी-सी भी राजनीतिक समझ होती।
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ईवीएम के इस तमाशे से चुनाव आयोग बदनाम नहीं हुआ है, अरविंद केजरीवाल और उनके साथी बदनाम हुए हैं। दुनिया जानती है कि चुनावों में थोड़ी-बहुत धांधली हो सकती है, पर उतनी हरगिज नहीं होती, जितनी आप साबित करना चाहती है। केजरीवाल के  आरोपों में थोड़ा भी सच होता, तो स्वीकार करना पड़ता कि चुनाव आयोग मोदी सरकार का पिट्ठू बन चुका है। तब यह भी स्वीकार करना पड़ता कि भारत में लोकतंत्र है ही नहीं। क्या यही कहना चाहते हैं दिल्ली के मुख्यमंत्री और उनके साथी? तब सवाल यह भी उठता है कि उस समय उन्हें चुनाव आयोग की ‘बेईमानी' क्यों नहीं दिखी, जब 2015 में अरविंद केजरीवाल की नई-नवेली पार्टी ने दिल्ली विधानसभा की तीन छोड़ सारी सीटें जीती थीं। वह जीत इतनी अप्रत्याशित थी कि दुनिया हैरान रह गई थी और कुछ समय के लिए ऐसे लगा कि अरविंद केजरीवाल प्रधानमंत्री बन सकते हैं।

सच यह है कि केजरीवाल प्रधानमंत्री बनने का सपना लेकर ही राजनीति में आए थे। याद कीजिए, 2014 के लोकसभा चुनाव में वह नरेंद्र मोदी को हराने के लिए दिल्ली छोड़कर बनारस भागे थे। बनारस में बुरी तरह हारने के बाद वह वापस दिल्ली लौटे थे, लेकिन उनका दिल कभी दिल्ली में लगा नहीं। शुरू से उनकी नजरें पंजाब पर टिकी रहीं। और क्यों न टिकी रहतीं, जब लोकसभा में उनके दोनों सांसद इसी राज्य के हों? ऊपर से राजनीतिक पंडितों ने भविष्यवाणी की थी कि पंजाब में आप की ही सरकार बनने वाली है। मानना पड़ेगा कि पंजाब में केजरीवाल की सभाओं में लाखों लोग आए। जब वहां उनके रोड शो होते, तो इतने लोग आते कि उनका काफिला बैलगाड़ी की रफ्तार से चलता था। गोवा में उम्मीदें बुलंद नहीं थीं, फिर भी जगह-जगह केजरीवाल के बड़े-बड़े पोस्टर दिखे थे। परिणाम जब आए, तब केजरीवाल की महत्वाकांक्षा को असली चोट पंजाब के मतदाताओं ने पहुंचाई। उसके बाद आप वाले ईवीएम में गड़बड़ होने की बातें करने लगे।
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दिल्ली नगर निगम के चुनाव को आप की परीक्षा के रूप में देखा गया। केजरीवाल ने मतदाताओं को धमकियां तक दीं कि भाजपा को वोट देने वाले डेंगु और चिकनगुनिया को वोट दे रहे हैं। दिल्ली वाले फिर भी नहीं माने और तीनों नगर निगमों में भाजपा की जीत हुई। हालांकि  इन पर भाजपा का कब्जा एक दशक से था। सच है कि दिल्ली की सड़कों पर अभी तक स्वच्छ भारत का असर नहीं दिखता है, जो बताती है कि नगर निगम अपना काम पूरी तरह नहीं कर रहे।

दिल्ली में हारने के बाद केजरीवाल के अपने साथी जब उनका विरोध करने लगे, तब उन्हें याद आया कि सारा दोष ईवीएम पर डाला जा सकता है। अगर केजरीवाल राजनीति में रहना चाहते हैं, तो अच्छा होगा कि वह हारना सीख जाएं। राजनीति वह मैदान-ए-जंग है, जहां बड़े-बड़े महारथी भी हार चुके हैं।
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