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'आप' ने क्यों सबको सांप सुंघा दिया?

Thu, 12 Dec 2013 02:05 PM IST
कमर वहीद नकवी
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आम आदमी पार्टी ने सबको सांप सुंघा दिया है। उनकी हालत तो पतली है ही, जिनके हाथ की भाग्य रेखा इस चुनाव में देखते ही देखते सफाचट हो गई। लेकिन जो चौतरफा जीते, उन हुंकार वालों की भी धुकधुकी लग गई है। और सूबों के क्षत्रपों के भी दिल बैठने लगे हैं। 'आप' की झाड़ू ने राजनीति के तमाम टोटकों को ठिकाने लगा दिया। चुनाव के पहले और चुनाव के बाद, हर मौके पर कामयाबी की पूरी गारंटी वाले अचूक खानदानी नुस्खे इस बार कुछ काम नहीं आए, वरना अब तक दिल्ली में तीन-तिकड़म से सरकार बनाने का जुगाड़ कब का हो चुका होता!
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भारतीय राजनीति में यह अजूबा वाकई पहली बार हो रहा है कि सबसे ज्यादा सीटें जीतनेवाली पार्टी को जरा भी इच्छा नहीं हो रही है कि वह सरकार बनाने की कोशिश करे! यह वही पार्टी है, जो केंद्र में तेरह दिन की सरकार बनाने के लिए लड़ मरी थी। आज उसे जोड़-तोड़कर सरकार बनाना अनैतिक लगने लगा है! झारखंड भी अभी कोई कालातीत इतिहास नहीं हुआ है कि लोगों को याद न आए कि भाजपा ने वहां सरकार बनाने या सरकारों में बने रहने के लिए कैसे-कैसे अद्भुत कौशल दिखाए थे। लेकिन आज वह बहुमत से केवल चार के आंकड़े से दूर रह जाने के बावजूद कान पकड़े बैठी है कि न बाबा न, हम 'अनैतिक' तरीकों से सरकार नहीं बनाएंगे!

'आप' का यही असर और आतंक है, जिसने राजनीति के ढर्रे को बदलने की शुरुआत की है। और दरअसल, यह आतंक पार्टी का नहीं, बल्कि सचमुच आम आदमी का है। 'आप' के बहाने आम आदमी ने राजनीति में सीधे हस्तक्षेप की शुरुआत कर दी है। हाल के विधानसभा चुनावों की सबसे बड़ी उपलब्धि यही रही है कि आम आदमी ने दिल्ली में एक नए राजनीतिक प्रयोग की नींव रखी, आम आदमी पहली बार खुद चुनाव लड़ा और जीता, और पके-पकाए राजनेताओं और राजनीति के तमाम घाघ खिलाड़ियों के हर छल-बल को उसने अपनी मामूली-सी हस्ती के बावजूद बेअसर कर दिया। अब यह अलग बात है कि रामलीला मैदान में जब जनलोकपाल की मांग को लेकर अन्ना हजारे आमरण अनशन कर रहे थे, तब लबालब अहंकार से भरे इन्हीं राजनेताओं ने ताने मार-मारकर आम आदमी की बड़ी खिल्ली उड़ाई थी कि ऐसे ही कानून बनाने का बड़ा शौक है, तो राजनीति में उतर कर देखो। अन्ना और आंदोलन से जुड़े तमाम सहयोगियों-समर्थकों के भारी विरोध के बावजूद जब 'आप' नाम की पार्टी बनी, तब किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया था। लेकिन 'आप' ने अब तक अपने बारे में लगाई जा रही तमाम अटकलों, आशंकाओं, अनुमानों और आकलनों को गलत साबित किया है।
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'आप' के अलावा भी इस बार के विधानसभा चुनाव इसलिए कौतूहल से देखे जा रहे थे कि इन्हें 2014 की लड़ाई की अंगड़ाई माना जा रहा था। बात सही भी है। देश के राजनीतिक इतिहास में ऐसा चुनावी युद्ध शायद ही पहले कभी हुआ हो। नेतृत्व के संकट से जूझ रही कांग्रेस अपने अस्तित्व के लिए छटपटा रही है, भाजपा को लगता है कि यह उसके लिए 'अभी नहीं, तो कभी नहीं' जैसा मौका है, और नरेंद्र मोदी के आक्रामक नेतृत्व में वह देश की राजनीति की धारा बदल सकने के सर्वोत्तम अवसर के मुहाने पर खड़ी है। उधर मुलायम, माया, ममता, जयललिता, नीतीश, नवीन, जगन, चंद्रबाबू समेत तमाम सूबाई क्षत्रपों को लगता है कि यही मौका है, जब चुनाव बाद उनकी बड़ी भूमिका हो सकती है और कौन जाने देवेगौड़ा और गुजराल की तरह किसी का प्रधानमंत्री बनने का नंबर भी लग जाए!

अब तक यह सब गणित ठीक चल रहा था, लेकिन दिल्ली फतह के बाद 'आप' के 'भारत विजय' के इरादों ने अब तक बड़ी मेहनत से सजाई गई चौसर में नए पांसे फेंककर पूरा खेल तहस-नहस कर दिया है। 'आप' के साथ समस्या यह है कि परंपरागत राजनीति के दांव से न यह खेलती है और न वे इस पर असर करते हैं। यह अनुमान भी नहीं लग पाता कि कहां इसके उम्मीदवार मजबूत हैं और कहां कमजोर, कहां इसके समर्थक कम हैं, कहां ज्यादा, क्योंकि इसके समर्थकों की खास पहचान है ही नहीं। न बड़ी रैलियां और न न्यूज चैनलों पर 'लाइव प्रसारित' हो सकने वाले भाषण! इसलिए पता ही नहीं चलता कि वे चुनाव लड़ भी रहे हैं या नहीं। दिल्ली में यही हुआ।

मतदान के बाद तक बड़े-बड़े चुनावी पंडितों, एक्जिट पोल मास्टरों को 'आप' की कोई हवा ही नहीं लग सकी! ऐसे में लोकसभा चुनावों में उतरने का 'आप' का फैसला भाजपा समेत सभी पार्टियों के लिए मुसीबत बन सकता है। कारण यह है कि कांग्रेस-विरोध की मौजूदा लहर में 'आप' कई लोगों को एक नया विकल्प देती है। दिल्ली में अगर यहां 'आप' मैदान में न होती, तो भाजपा शायद 50 से भी ज्यादा सीटें जीतती! बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जहां भाजपा बड़ी फसल काटने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है, 'आप' वहां न केवल मोदी और भाजपा के लिए 'स्वप्नभंग' का कारण बन सकती है, बल्कि मुलायम, मायावती, नीतीश और लालू छाप राजनीति को भी बड़े झटके दे सकती है। हालांकि अभी राजनीतिक पंडित यह मानने को कतई तैयार नहीं है कि इन राज्यों के जातीय गणित को तोड़ पाना तो दूर, कभी कोई खरोंच भी लगा सकता है। लेकिन 'आप' ने दिल्ली के दलित वोटों में भारी सेंध लगाकर खतरे की घंटी बजा ही दी है।

आम आदमी को 'आप' के जरिये देश के राजनीतिक पटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का जो मौका मिला है, उसके नतीजे न केवल अगले लोकसभा चुनाव को गहरे प्रभावित कर सकते हैं, बल्कि दूसरे राजनीतिक दलों को नैतिकता की टोपी पहनने को भी मजबूर कर सकते हैं! विधानसभा चुनावों का सबसे बड़ा नतीजा यही है।
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