जब अखबारों में पढ़ा मैंने कि अजमल कसाब ने फांसी के तख्त पर चढ़ने से पहले अल्लाह से माफी मांगी थी, तो मुझे बात समझ में नहीं आई। अखबारों के मुताबिक, कसाब के आखिरी शब्द थे, अल्लाह कसम, दोबारा ऐसी गलती नहीं होगी।
कैसी गलती, जब अल्लाह का नाम लेकर कसाब और उसके साथियों ने बेगुनाह लोगों का कत्ल-ए-आम किया था मुंबई में? कैसी गलती, जब उन्होंने यहूदियों को खास निशाना बनाया सिर्फ इसलिए कि वे उनके दुश्मन माने जाते हैं? अजमल कसाब जिस जेहाद का सिपाही था, क्या उस जेहाद का बुनियादी सिद्धांत यह नहीं है कि अल्लाह के नाम पर यह जंग लड़ी जा रही है काफिरों के खिलाफ?
मेरी बातों में सचाई है, लेकिन ऐसी बातें हम अपने इस 'सेक्यूलर' देश में करने से कतराते हैं। ऐसा कहने वालों का इरादा तो होता है अपने आप को 'सेक्यूलर' साबित करने का, लेकिन अनजाने में ये लोग एक पूरी कौम को बदनाम करने का काम करते हैं।
राजनीतिक तौर पर यह गलती सबसे ज्यादा करते हैं वे राजनीतिक दल, जो अपने आपको अति-सेक्यूलर मानते हैं। और अगर मुंबई के एक बहादुर पुलिस वाले ने अपनी जान देकर कसाब को जिंदा न पकड़ा होता, तो संभव है कि आज इस देश के सेक्यूलर बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों ने 26/11 का दोष संघ पर थोप दिया होता।
याद कीजिए कि ऐसी कोशिश हुई थी। एक पत्रकार ने किताब लिखी हमले के कुछ महीनों बाद, जिसका नाम था, 26/11- आरएसएस की साजिश, और उस किताब को समर्थन मिला कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह का।
मेरे कहने का मतलब यह है कि हम इस जेहाद का मुकाबला नहीं कर सकेंगे, अगर इस तरह की सेक्यूलर बातें होती रहेंगी, क्योंकि दुश्मन को तभी हराया जा सकता है, जब उसे पहले पहचाना जाए। स्पष्ट शब्दों में कहना होगा कि जेहाद के नाम पर भारत के खिलाफ एक ऐसा युद्ध लड़ा जा रहा है, जिसमें मरते हैं वे बेगुनाह लोग, जो जानते ही नहीं कि वे रणभूमि के बीच खड़े हैं।
पाकिस्तान के सैनिक शासकों ने जब समझ लिया कि भारत के खिलाफ खुलकर युद्ध लड़ना कामयाब नहीं हो सकता, तब से शुरू हुआ है यह नया युद्ध, जिसको हम जानते हैं जेहाद के नाम से। न सिर्फ जेहादियों और पाकिस्तानी सेना का मकसद एक है; वह है भारत के टुकड़े करना, उनके सिपाही भी मिले हुए हैं।
सुबूत मिल गए हैं अब भारत और अमेरिका की सरकारों को, कि जो लोग पाकिस्तान में बैठकर कसाब और उसके नौ साथियों को शतरंज के मोहरों की तरह चला रहे थे मुंबई शहर की बिसात पर, उनमें पाक सेना के अफसर मौजूद थे।
भारत सरकार कहती आई है 2008 से, कि लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद जब तक गिरफ्तार नहीं होते हैं, तब तक यकीन करना मुश्किल होगा कि पाकिस्तान 26/11 के दोषियों पर वास्तव में कानूनी कार्रवाई करना चाहता है। लेकिन कैसे पकड़ेगी वह सरकार हाफिज सईद को, जब वह पाक सेना का अपना सिपहसालार है?
कसाब की फांसी से उनको शांति मिलेगी, जिनके परिजन उसने मारे थे 26/11 को, लेकिन यह हमारी जेहादी समस्या का हल नहीं होगा। यहां तक कहने को मैं तैयार हूं कि कसाब के जाने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, क्योंकि पिछले चार वर्षों में हमारे शासकों ने एक बार भी साबित करके नहीं दिखाया कि वे पहचान गए हैं देश के असली दुश्मनों को।
मुंबई में रहती हूं मैं ओबेरॉय होटल के बहुत पास, और यकीन कीजिए कि आज भी हम उतने ही असुरक्षित हैं, जितने उस दिन थे, जब कसाब और उसके जेहादी साथी हमारे शहर में आए थे मौत बनकर।
फांसी पर चढ़ने से पहले माफी अगर मांगनी चाहिए थी कसाब को, तो उन लोगों से मांगते, जिनके जीवन पर 26/11 का काला साया हमेशा रहेगा। माफी मांगनी ही थी, तो उन मांओं से मांगते, जिनके बेटे उसकी अंधी गोलियों के निशाने बने।
माफी मांगनी ही थी, तो उन बच्चों से मांगते, जिनके मां-बाप उनके सामने मरे। माफी मांगते ही अगर, तो उन सिपाहियों से मांगते, जो सिर पर कफन बांधकर उतर आए थे ऐसे मैदान-ए-जंग में, जिसमें न दुश्मन दिखा, न युद्ध का कारण।
देश से जेहादियों को उखाड़ना है, तो दुश्मन को पहचानना होगा। उसकी मानसिकता समझनी होगी और स्वीकारना होगा कि इस जेहाद को पैदा किया है पाकिस्तान के सैनिक शासकों ने।