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एक अलबेला प्रधानमंत्री : इन्हीं कारणों से विभिन्न पत्रिका प्रबंधनों ने उन्हें तीन बार बर्खास्त किया

के. विक्रम राव Published by: के. विक्रम राव राव Updated Wed, 31 Jul 2019 03:51 AM IST
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बोरिस जॉनसन - फोटो : a

ब्रिटिश मीडिया की नजर में प्रधानमंत्री पद हेतु अंतिम पसंद एलेक्जेंडर बोरिस जॉनसन थे। गत सप्ताह वह यह पद पा भी गए। तीन दशकों से श्रमजीवी पत्रकार रहे जॉनसन को उनके संपादकजन मानते रहे कि वे तथ्यों का आदतन निरादर करते हैं। सार्वजानिक उक्तियों तथा वक्तव्यों को विकृत करते हैं। उनकी कलम पर राग-द्वेष छाए रहते हैं। गांभीर्य तथा कौतुक को वह पर्यायवाची बना डालते हैं। इन्हीं कारणों से विभिन्न पत्रिका प्रबंधनों ने उन्हें तीन बार बर्खास्त किया था। फिर भी यह आदमी स्तंभकार, संवाददाता और संपादक के रूप में ऐसा सिक्का था, जो मीडिया व्यवसाय में बार-बार लौट आता था।

जॉनसन की मीडिया-धर्मिता भी उनके वंश की भांति विविधता से भरपूर है। तुर्की नस्ल के अल्बानी पत्रकार अली कमाल उनके परदादा थे। उनकी रगों में, उन्हीं के शब्दों में, यहूदी, जर्मन और फ्रेंच रक्त प्रवहित होता है। अमेरिका में जन्मे थे, लिहाजा वहीं के बाशिंदे बने। बाद में ब्रिटिश नागरिक बने। वह जन्मजात कट्टर रोमन कैथोलिक थे। उसे परिवर्तित कर उन्होंने चर्च ऑफ इंग्लैंड के उदार धर्म को अपनाया। उनके माता-पिता को एक रूसी मूल का प्रवासी व्यक्ति बोरिस मिला, तो उसी का नाम अपने इस ज्येष्ठ पुत्र को दे दिया।



नरेंद्र मोदी के अटूट प्रशंसक जॉनसन अपने को भारतवर्ष का जामाता कहने में गौरव महसूस करते हैं। हालांकि वह भिन्न किस्म के दामाद हैं। उनकी (दूसरी तलाकशुदा) पत्नी मारिना ह्वीलर की माता (सरदारनी दीप सिंह कौर) सरगोधा (अब पाकिस्तानी पंजाब में) की थीं। उनके पिता सर शोभा सिंह को ब्रिटिश राज ने कनॉट प्लेस के निर्माण का ठेका दिया था।

अर्थात उनके बड़े पुत्ररत्न-पत्रकार सरदार खुशवंत सिंह अपने रिश्ते में बोरिस जॉनसन के सौतेले चचिया ससुर थे। शायद इसी रिश्तेदारी के नाते ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने घोषणा कर दी कि भारत से ब्रिटेन का व्यापार अब दोगुना किया जाएगा, क्योंकि वह गतिहीन हो गया है। चीन का व्यापार ब्रिटेन में कई गुना बढ़ा है।

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बोरिस जॉनसन - फोटो : a
ब्रिटिश मीडिया की नजर में प्रधानमंत्री पद हेतु अंतिम पसंद एलेक्जेंडर बोरिस जॉनसन थे। गत सप्ताह वह यह पद पा भी गए। तीन दशकों से श्रमजीवी पत्रकार रहे जॉनसन को उनके संपादकजन मानते रहे कि वे तथ्यों का आदतन निरादर करते हैं। सार्वजानिक उक्तियों तथा वक्तव्यों को विकृत करते हैं। उनकी कलम पर राग-द्वेष छाए रहते हैं। गांभीर्य तथा कौतुक को वह पर्यायवाची बना डालते हैं। इन्हीं कारणों से विभिन्न पत्रिका प्रबंधनों ने उन्हें तीन बार बर्खास्त किया था। फिर भी यह आदमी स्तंभकार, संवाददाता और संपादक के रूप में ऐसा सिक्का था, जो मीडिया व्यवसाय में बार-बार लौट आता था।

जॉनसन की मीडिया-धर्मिता भी उनके वंश की भांति विविधता से भरपूर है। तुर्की नस्ल के अल्बानी पत्रकार अली कमाल उनके परदादा थे। उनकी रगों में, उन्हीं के शब्दों में, यहूदी, जर्मन और फ्रेंच रक्त प्रवहित होता है। अमेरिका में जन्मे थे, लिहाजा वहीं के बाशिंदे बने। बाद में ब्रिटिश नागरिक बने। वह जन्मजात कट्टर रोमन कैथोलिक थे। उसे परिवर्तित कर उन्होंने चर्च ऑफ इंग्लैंड के उदार धर्म को अपनाया। उनके माता-पिता को एक रूसी मूल का प्रवासी व्यक्ति बोरिस मिला, तो उसी का नाम अपने इस ज्येष्ठ पुत्र को दे दिया।

नरेंद्र मोदी के अटूट प्रशंसक जॉनसन अपने को भारतवर्ष का जामाता कहने में गौरव महसूस करते हैं। हालांकि वह भिन्न किस्म के दामाद हैं। उनकी (दूसरी तलाकशुदा) पत्नी मारिना ह्वीलर की माता (सरदारनी दीप सिंह कौर) सरगोधा (अब पाकिस्तानी पंजाब में) की थीं। उनके पिता सर शोभा सिंह को ब्रिटिश राज ने कनॉट प्लेस के निर्माण का ठेका दिया था।

अर्थात उनके बड़े पुत्ररत्न-पत्रकार सरदार खुशवंत सिंह अपने रिश्ते में बोरिस जॉनसन के सौतेले चचिया ससुर थे। शायद इसी रिश्तेदारी के नाते ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने घोषणा कर दी कि भारत से ब्रिटेन का व्यापार अब दोगुना किया जाएगा, क्योंकि वह गतिहीन हो गया है। चीन का व्यापार ब्रिटेन में कई गुना बढ़ा है।

प्रधानमंत्री जॉनसन का तीस-वर्षीय पत्रकारी जीवन काफी दिलचस्प रहा। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय छात्र यूनियन के अध्यक्ष के काल में वह व्यंग्य पत्रिका 'दि ट्रिब्यूटरी' के प्रधान संपादक बने। जब वह प्रतिष्ठित 'लंदन टाइम्स' (1987) में कार्यरत थे, तो एक खोजी लेख लिखा था, जो राजा एडवर्ड द्वितीय के पुरातन महल के बारे में था। जॉनसन ने उसमें कल्पित तथ्य लिखे। जांच के बाद उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। फिर वह दैनिक 'टेलीग्राफ' से जुड़े। वह राजधानी ब्रेसेल्स (बेल्जियम) में उसके ब्यूरो प्रमुख नियुक्त हुए।

यहां भी वह करतब दिखाने से बाज नहीं आए। यूरोपीय आयोग की तीव्र आलोचना में उन्होंने कई विवादित रपट भेजी, जो छपी भी थी। इनकी समीक्षा कर वरिष्ठ संपादक क्रिश पैटन ने जॉनसन को फर्जी पत्रकारिता का ‘महानतम रचयिता’ बताया। हालांकि जॉनसन के यूरोपीय आयोग पर लिखे आलोचनात्मक लेखों की प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर ने तारीफ की।

मगर उनके बाद प्रधानमंत्री बने जॉन मेजर ने जॉनसन के लेखों पर अप्रसन्नता व्यक्त की थी। घटनाक्रम बदला और ब्रिटेन के संसदीय निर्वाचन में जॉनसन के लेखों और समाचार टिप्पणी का बुरा प्रभाव कंजरवेटिव पार्टी पर पड़ा। वह हार गई।

उसी दौर में राजनीतिक संवाददाता के रोल में जॉनसन को कई बेहतरीन रपट के लिए राष्ट्रीय पारितोष भी मिले। मगर पत्रिका 'न्यूज ऑफ दि वर्ल्ड' ने उनकी संदेहात्मक गतिविधियों पर खोजी रपट भी छापी। शीघ्र ही वह कई टीवी न्यूज चैनलों पर सफल और प्रभावी टिप्पणीकार बने। उसी दौरान 'द टेलीग्राफ' और 'द स्पेक्टेटर' के मालिक कोनराड ब्लैक ने जॉनसन को दोनों दैनिकों के प्रधान संपादक का पद दिया।

पत्रकार रहते जॉनसन ने अपनी पत्रकार महिला साथियों के साथ अंतरंग संबंध बनाए। ये सर्व विदित थे। तब तक 'मी टू' के अभियान से मीडिया ग्रसित नहीं हुआ था। उनकी भूरी लहराती जुल्फें, बिखरे, रूखे बाल, स्वर्णिम कपोल और गहरी नीली आंखें तुरंत ध्यान खींचती हैं। जॉनसन की समानता अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप से होती है। हालांकि ट्रंप ने अपनी महिला मित्रों से रिश्तों को गोपनीय कभी नहीं रखा।

जॉनसन के प्रधानमंत्री निर्वाचित होने तथा टेरीजा मे के त्यागपत्र का खास मुद्दा यही है कि ब्रिटेन यूरोपीय संघ से हटे। नए प्रधानमंत्री ने पंचांग में तिथि भी तय कर दी है। 31 अक्तूबर तक ब्रिटेन अलग हो जाएगा। चुनौती गंभीर है। यदि ब्रिटेन सम्मानपूर्वक यूरोपीय यूनियन से नहीं हट पाया, तो स्कॉटलैंड राज्य यूनाइटेड किंगडम से अलग हो जाएगा। उत्तरी आयरलैंड में विप्लव की ज्वाला धधक रही है। अर्थात इंग्लैंड एकाकी पड़ जाएगा। वह दिवालियेपन की कगार पर आ जाएगा। सदियों से उपनिवेशों में (भारत से खासकर) लूटे माल की समाप्ति भी हो जाएगी|

इसीलिए जॉनसन को सीमित समय में आतिशी काम कर दिखाना है। मगर अभी से उन्होंने भाग निकलने की राह खोज ली है। उन्हें विकल्प के रूप में संसद भंग कराकर नया चुनाव करने का रास्ता सूझ रहा है। उन्होंने नेता विपक्ष जेरेमी कार्बिन को सत्ता में आने से रोकने का नारा भी लगा दिया है।

मगर जेरेमी कार्बिन अपने समय की बाट बड़ी सब्रता से जोह रहे हैं। प्रतिदिन उनकी लेबर (सोशलिस्ट) पार्टी की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। यह तय है कि यदि संसदीय निर्वाचन होता है, तो जेरेमी कार्बिन प्रधानमन्त्री बनेंगे। जेरेमी कार्बिन एक गांधीभक्त, सत्याग्रही, उपनिवेशवाद विरोधी, शाकाहारी और तंबाकू तथा शराब से सख्त परहेजी हैं।

जॉनसन कंजरवेटिव पार्टी का शीर्ष नेतृत्व कार्बिन की सुनामी से घबराए हुए हैं, क्योंकि आम सदस्य देखता है कि कार्बिन मामूली आदमी की भांति जमीनी बातें बोलते हैं। उन्हें गांधी अंतरराष्ट्रीय शांति पुरस्कार से 2013 में नवाजा गया था। अहिंसा में उनकी दृढ़ आस्था है। अतः जॉनसन को असली झटका कार्बिन से है। यूरोपीय यूनियन दोयम है।
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