एक कहावत है, वाटर वाटर एवरिवेयर नॉट ए ड्राप टू ड्रिंक, यानी हर जगह पानी-पानी है, परंतु एक बूंद भी पीने के लिए नहीं है। यही कुछ हमारे देश में भवन निर्माण के क्षेत्र में हो रहा है। इस समय दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और बंगलुरू जैसे महानगरों और देश के बी-ग्रेड शहरों में दिन रात नए-नए भवन बन रहे हैं।
बहुमंजिलीय योजनाएं घोषित हो रही हैं, पर इनके खरीदार आम उपभोक्ता न होकर, आमतौर पर निवेशक ही हैं। एक तरह से हाउसिंग सेक्टर ने स्टॉक एक्सचेंज का रूप ले लिया है, जहां निवेशक और अधिक धन कमाने के लिए धन लगाता है। जबकि इस समय देश में एक करोड़ फ्लैट या आवासीय इकाइयां खाली पड़ी हैं और इनमें रहने वाले अगले 20 साल तक इनमें नहीं आएंगे।
ये एक करोड़ फ्लैट यदि अगले कुछ वर्षों तक इस्तेमाल में नहीं होने वाले, तो यह राष्ट्र के धन, प्राकृतिक संसाधनों, श्रम और बिजली-पानी की सरासर बरबादी है। इन भवनों के निर्माण में बड़े भूभाग का इस्तेमाल हुआ है। जो ईंटें इनमें लगीं, उनको बनाने में कृषि योग्य उपजाऊ मिट्टी लगी, बडे़ पैमाने पर लोहा व अन्य धातुएं लगीं, लकड़ी के लिए जंगल काटे गए। निर्माण कार्य में बिजली का उपयोग हुआ और इसके अलावा बड़े पैमाने पर सीमेंट-रोड़ी के लिए पहाड़ों का खनन किया गया। आवागमन के लिए सड़कों के निर्माण में कोलतार इत्यादि लगा। यह देश की ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों के बेजा इस्तेमाल का एक उदाहरण है।
तसवीर का दूसरा पहलू यह है कि आवासीय क्षेत्र में आपूर्ति ज्यादा है और मांग कम। और इसी कारण आज राजधानी क्षेत्र मे 15 लाख, मुंबई में पांच लाख और इसी प्रकार अन्य शहरों को मिलाकर एक करोड़ आवासीय इकाइयां आबाद नहीं हो सकी हैं। जो क्षेत्र पहले हरियाली व गंगा-यमुना के बीच का सबसे उपजाऊ इलाका था, आज वह कंकरीट का जंगल बन गया है। यदि दिल्ली को केंद्र में रखकर देखें, तो दिल्ली से आगरा, पलवल तक कृषि कार्य बंद-सा हो गया है और इन क्षेत्रों में केवल भवन निर्माण हो रहा है। किसानों से उनकी भूमि 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत ले ली गई हैं। जनहित में ली गई भूमि बिल्डरों व माफियाओं को राजनेताओं व नौकरशाहों के इशारे पर भ्रष्टाचार के जरिये आसान शर्तों पर उपलब्ध करा दी गई। इस कारण देश में जगह-जगह किसान व आदिवासी जल, जंगल व जमीन बचाने के लिए आंदोलन पर हैं।
बीस-तीस वर्ष पहले तक उपजाऊ जमीन को बेचना पाप समझा जाता था, परंतु आज नैतिक मूल्य गिर गए हैं। इसे व्यवसाय का रूप देकर पाप-पुण्य की ऊहापोह से मुक्ति पा ली गई है। इस प्रक्रिया की शुरुआत होती है, संबंधित राज्य सरकार द्वारा कृषि भूमि को अधिग्रहण के लिए चिह्नित करके, फिर भूमि अधिनियम कानून के तहत भूमि का अधिग्रहण कर लेने से। यह अधिग्रहण केवल जनहित में जैसे सड़क निर्माण, रेलवे लाइन या चिकित्सालय इत्यादि के निर्माण के लिए होना चाहिए। परंतु देश में ज्यादातर मामलों में इस कानून का दुरुपयोग खुलकर व बड़े पैमाने पर हुआ। ये जमीनें येन-केन प्रकारेण आवासीय परियोजनाओं को दे दी जाती हैं।
इस क्षेत्र में धन आने का सबसे बड़ा कारण है, 1991 का आर्थिक उदारीकरण। उदारीकरण के बाद भवन निर्माण को प्रगति व रोजगार का एक साधन मान लिया गया। इसलिए सरकार ने भवन निर्माण के लिए सस्ती ब्याज दरों पर ऋण तथा इन ऋणों पर दिए जाने वाली किस्तों को आयकर में छूट के लिए मान्यता प्रदान की। इस प्रकार के बढ़ावे के कारण चारों तरफ भवन निर्माण की बाढ़-सी आ गई। इस क्षेत्र में धन का दूसरा बड़ा कारण है, काले धन की आसान व सुरक्षित खपत। इस कारण भ्रष्टाचारी व काले धन वाले रियल एस्टेट को ही इसके लिए उपयुक्त मानते हैं। कहा जाता है कि बहुत से राजनेताओं का भ्रष्टाचार द्वारा कमाया धन रियल एस्टेट के कारोबार में लगा है।
जब देश की संपदा देशवासियों के काम नहीं आती, वहीं से समाज में आंदोलन की जड़ें जम जाती हैं। इस प्रकार के असंतुष्ट समाज को कोई भी अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल हवा देकर बड़ा आंदोलन खड़ा कर सकता है।