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व्यंग्य बाण: छत्तीसगढ़ की एक चूहा पंचायत

Tue, 25 Nov 2014 10:49 AM IST
अखिलेश श्रीवास्तव
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छत्तीसगढ़ के चूहे अब तक मौन थे। हवा-हवाई बातों पर भरोसा करने के बजाय वे तथ्यों का इंतजार कर रहे थे। वे नहीं चाहते थे कि नसबंदी कांड में जिस तरह सरकार ने एक डॉक्टर को बलि का बकरा बनाया, उन पर भी उसी तरह गैरजिम्मेदार होने का आरोप लगे। महिलाओं को दी गई जानलेवा दवा में चूहामार दवा की आधिकारिक पुष्टि होने के बाद बिलासपुर के कानन पेंडारी इलाके के चूहों ने एक पंचायत बुलाई। पंचायत का मकसद मृत महिलाओं के प्रति संवेदना जताना, अनाथ बच्चों की मदद और पूरे मामले में चूहा समुदाय की बदनामी पर चर्चा करना था।
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पंचायत के मुखिया चूहे ने कहा, जिस दवा से हमें निशाना बनाया जाना था, वह उन्हीं इंसानों पर आजमा दी गई, जिन्होंने हाल ही में अपने वोट से सरकार को सिर-आंखों पर बिठाया था। अगर ये दवा सिप्रोसिन नाम की पन्नी में पैक नहीं होती, तो हमारी शहादत के काम आती। हमें अपनी जान बचने की जितनी खुशी नहीं, उससे ज्यादा दुख उन महिलाओं की जान जाने का है, जिन्होंने गरीबी की मजबूरी में अपनी सरकार पर आंख मूंदकर भरोसा किया। कोई इंसान इतना कैसे गिर सकता है कि अपने लोगों को चूहामार दवा खिला दे!

मुखिया का दाहिना हाथ माने जाने वाले चूहे ने कहा, हमें उन बच्चों के लिए कुछ करना चाहिए जो सरकार की वजह से अनाथ हो गए। फैसला किया गया कि इस साल ऐसे परिवारों के घर में रखे खाद्यान्न वे नहीं कुतरेंगे। चूहों ने एकमत से उन डॉक्टर गुप्ता के प्रति भी सहानुभूति जताई, जिन्हें जल्दबाजी में जेल में ठूंस दिया गया।
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चूहों का कहना था, 'अविश्वसनीय छत्तीसगढ़' के प्रचार पर करोड़ों फूंकने वाली सरकार को दवाओं की विश्वसनीयता पर ध्यान देना चाहिए। अपने लोगों को यह भरोसा भी दिलाना चाहिए कि जो लोग जीने की उम्मीद में सरकारी अस्पतालों में पहुंचे, वे ही उन्हें श्मशान तक पहुंचाने का जरिया न बनें। चूहों को इस बात का भी अफसोस है कि सरकार और स्वास्थ्य महकमे के घटिया कारनामों से उनकी जात बदनाम हुई।
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