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राज्यों को ताकत देने से बनेगी बात

Thu, 25 May 2017 07:47 PM IST
शंकर अय्यर
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शंकर अय्यर
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मोदी सरकार 26 मई को केंद्र की सत्ता में अपने 1,097 दिन पूरे कर रही है। व्यवस्था स्थापित करना और राजनीतिक मजबूती इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। भाजपा की अपने सहयोगियों के साथ 14 राज्यों में सरकार है, जो देश के कुल क्षेत्रफल का 70 फीसदी है और जहां 60 प्रतिशत आबादी रहती है। आगामी लोकसभा चुनाव में अभी 18 से 20 महीने का समय है। मोदी और भाजपा के पास राजनीतिक उपलब्धि हासिल करने और जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप बदलाव लाने का अभूतपूर्व अवसर है।
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दरअसल नीति तय करने का काम केंद्र का है और राज्यों की इसमें मामूली या कोई भूमिका नहीं होती। इसी तरह योजनाओं के अनुपालन में केंद्र की भूमिका नहीं होती, यह काम राज्य सरकारें करती हैं। लेकिन अनेक कमेटियों और आयोगों की सिफारिशों के बावजूद नीतियों के अनुपालन के मामले में बदहाली बरकरार है।

भारत मे बदलाव केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग और उनके आपसी समीकरणों पर निर्भर करता है। हर बड़ी परियोजना-चाहे वह मेक इन इंडिया हो, स्वच्छ भारत हो, स्मार्ट सिटी हो, स्किल इंडिया हो या प्रधानमंत्री  कृषि सिंचाई योजना हो-इसमें राज्य सरकारों के आगे बढ़ने और नतीजा देने की जरूरत है। बदलाव को गति देने के लिए जरूरी है कि मोदी की 14 राज्य सरकारें नतीजे दिखाएं। स्वच्छ भारत और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं को ही देखें। शहरों में जलापूर्ति, सीवेज और कूड़ा प्रबंधन के मोर्चों पर इन दो योजनाओं का आकलन करें। देश का लगभग हर शहर जल संकट का सामना कर रहा है-नागरिकों ने निजीकरण में इसका समाधान ढूंढ लिया है-वे बोतलबंद पानी खरीदते है और टैंकर माफिया पर निर्भर हैं।
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देश में जितना कूड़ा इकट्ठा होता है, उसके एक तिहाई का भी शायद ही निष्पादन (ट्रीटमेंट) होता हो। देश में रोजाना 1.5 लाख टन से अधिक ठोस कचड़ा इकट्ठा होता है-जिसके 80 फीसदी हिस्से को पहले से ही भरे हुए कूड़ों के ढेर पर डाल दिया जाता है, जहां उसे जला दिया जाता है। स्वच्छ भारत अभियान का शीर्षक खुले में शौच मुक्त भारत है, लेकिन इसकी मूल थीम है-स्वस्थ भारत के लिए स्वच्छ भारत।
इसमें कोई संदेह नहीं कि केंद्र राज्य सरकारों को अधिक धन दे रहा है। लेकिन क्या राज्यों ने पंचायतों, नगरपालिका परिषदों और निगमों को सशक्त बनाया है? केंद्र राज्यों के साथ जैसा करता है और राज्य स्थानीय सरकारों के साथ जैसा व्यवहार करता है, उस बारे में स्वर्गीय विलासराव देशमुख हमेशा सटीक ढंग से कहा करते थे। बात सिर्फ फंड की नहीं है। स्थानीय सरकारें निर्णय ले सकें , इसके लिए राज्यों को शक्तियों का बंटवारा करना होगा और कामकाज के साथ फंड का भी विकेंद्रीकरण करना होगा। मेक इन इंडिया को ही लीजिए। यह आर्थिक और राजनीतिक, दोनों नजरिये से एक जरूरी और महत्वपूर्ण पहल है। भारत को निवेश चाहिए और सरकार के लिए रोजगार सृजन की जरूरत है। निवेशकों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि हर फैसले में बहुत अधिक समय लगता है, क्योंकि केंद्र और राज्यों से मंजूरी लेनी पड़ती है। एक बिजली परियोजना के लिए 90 जगहों से मंजूरी लेनी पड़ती है, जबकि भवन निर्माण या होटल परियोजना के लिए 100 जगहों से मंजूरी लेने की जरूरत पड़ती है। मोदी सरकार और भाजपा की 14 राज्य सरकारों के पास मंजूरी राज को खत्म कर देने का अभी अच्छा मौका है।

उत्तर प्रदेश में बिजली एक राजनीतिक रूपक है। उदय (उज्ज्वल डिस्कॉम एश्योरेंस योजना) के तहत हुए काम से मोदी सरकार गर्वित होगी। अलबत्ता बिजली की कमी और उसकी कटौती बरकरार है। इसकी वजह है कि राज्य बिजली बोर्ड अब भी फंड की कमी से जूझ रहे हैं। जाहिर है, बिजली की समस्या का आंशिक समाधान ही हुआ है। बिजली के मोर्चे पर पारेषण और वितरण घाटे को, जो एक अर्थ में चोरी ही है, कम करने की जरूरत है, जिस पर राज्य ही कदम उठा सकता है।

बड़े पैमाने पर टैक्स चुकाने से बचने का मुद्दा भी बहस के केंद्र में है, कि किस तरह उद्यमी रिकॉर्ड में मामूली ही बने रहते हैं, और यह कि व्यापार और उद्योग में एक विशाल गैर संगठित क्षेत्र का अस्तित्व अब भी बना हुआ है। समस्या की जड़ दरअसल पुराने और अप्रचलित कानूनों में है, जो देश में रोजगार की व्यवस्था को नियंत्रित करते हैं। राजस्थान जैसे राज्यों ने श्रम सुधार की दिशा में कोशिश की है। केंद्र और 14 राज्य सरकारें  श्रम क्षेत्र में आधुनिक संहिता तय कर  ही सकती हैं। हालांकि इन पर अमल राज्य सरकारों को करना होगा। भाजपा शासित राज्यों को इस मामले में आगे बढ़कर रास्ता दिखाना चाहिए। इससे उस मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को लाभ मिलेगा, जिसके अवसर चीन से भारत आ रहे हैं।

बहुद्देश्यीय योजनाओं की सफलता इस पर निर्भर करती है कि केंद्र समवर्ती सूची की गुत्थी को किस तरह सुलझाता है, ताकि फंड और कामकाज को राज्यों में विकेंद्रित किया जाए। प्रधानमंत्री ने अनेक बार टीम इंडिया की बात कही है-जिसके तहत केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर देश को आगे ले जाएंगी। लेकिन इस बारे में सिर्फ कहना काफी नहीं है। बदलाव की गति को आगे बढ़ाने के लिए शासन के ढांचे को पुनर्गठित करना होगा-यानी जो राज्यों के विषय हैं, वे उन्हें सौंपने होंगे। यह इतना जटिल मामला है कि बहुमत की सरकार के लिए भी यह मुश्किल काम है। इसमें समय भी लगेगा। इसी कारण सरकारों को हिलाना जरूरी है। भाजपा अपनी राज्य सरकारों को ठेका आधारित खेती, कौशल प्रशिक्षण के लिए पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप), तकनीक आधारित खेती और पंचायत और नगर निकायों के लिए कैडर तैयार करने के लिए प्रेरित कर सकती है।

मोदी सरकार के सामने शासन का प्रतिस्पर्धी मॉडल तैयार करने का अवसर है। ये तो अवसरों के कुछ उदाहरण भर हैं। अवसर इशारे कर रहे हैं। क्या मोदी सरकार इन अवसरों का लाभ उठाएगी?
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