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बहुत कुछ बदलना बाकी है

मृदुला मुखर्जी Published by: Raman Singh Updated Fri, 25 Jan 2019 07:45 PM IST
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विविधता

आज हम 70वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं, जो महात्मा गांधी की 150वीं जन्म शताब्दी समारोह का वर्ष होने के कारण विशेष है। गणतंत्र रोमन के रिपब्लिक शब्द का हिंदी अनुवाद है, जिसका अर्थ ऐसे राज्य से है, जहां शासन की शक्तियां जनता में निहित होती हैं। गणतंत्र की हमारी उपलब्धियां छोटी नहीं हैं। बल्कि इतने वर्षों में हमारी नींव मजबूत ही हुई है। हाल के दशकों में मतदान प्रतिशत में हुई बढ़ोतरी और इसमें महिलाओं की बढ़ती भागीदारी इसका एक बड़ा सुबूत है। कुछ दशक पहले तक भी महिलाएं इतनी बड़ी संख्या में मतदान केंद्रों पर नहीं पहुंचती थीं। इसके अलावा, वे पति या परिवार के निर्देशानुसार ही मतदान करती थीं। लेकिन आज ऐसा नहीं है। महिला मतदाताओं को ध्यान में रखकर कई फैसले किए जाते हैं-बिहार में नीतीश सरकार द्वारा शराबबंदी कानून लागू करना इसका उदाहरण है। ऐसे ही व्यवस्था के प्रति नाउम्मीदी के बावजूद न्यायपालिका के प्रति जनता का भरोसा कायम है। कभी न्यायाधीश पीएन भगवती ने एक चिट्ठी के आधार पर जनहित याचिका (पीआईएल) की जो शुरुआत की थी, वह परंपरा दिनोंदिन मजबूत हुई है। आम आदमी में यह भरोसा पैदा हुआ है कि वह न्यायपालिका का दरवाजा खटखटा सकता है, जहां से उसे निराश नहीं होना पड़ेगा। ऐसे ही पंचायती व्यवस्था का, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है, जिस तरह विकास हुआ है, वह भी गणतंत्र के रूप में हमें उम्मीद से भर देता है।



लेकिन इस अवसर पर हमें उन विडंबनाओं पर भी नजर डालनी चाहिए, जिसके कारण गणतंत्र कमजोर पड़ता है। गणतंत्र में जनता ही सर्वोच्च होनी चाहिए। लेकिन हम पाते हैं कि गण और तंत्र के बीच दूरी बढ़ गई है। पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। महात्मा गांधी की प्रार्थना सभा में कोई भी जा सकता था। नेहरू ने अपने इर्द-गिर्द सुरक्षा या प्रोटोकॉल की ऐसी दीवारें नहीं खड़ी की थीं। जनता के असुविधाजनक सवालों को आज दबा दिया जाता है, उनकी अनदेखी की जाती है। आजाद भारत में यह प्रवृत्ति कम या ज्यादा हमेशा पाई गई है। इस उपेक्षा के कारण ही पूर्वोत्तर में समस्याएं पैदा हुई थीं। यह प्रवृत्ति आज भी बरकरार है। कश्मीर का उदाहरण लीजिए। कश्मीर के लोगों को समस्याओं की तरह पेश किया जाता है। जम्मू-कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है, जिसे हमसे कोई छीन नहीं सकता। ऐसे में, कश्मीर के लोगों की चिंता हमारी चिंता होनी चाहिए। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। इससे राज्य व्यवस्था के प्रति जनता का भरोसा कम होता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा मंडरा रहा है। असम में नागरिकता विधेयक की आलोचना करने के कारण चर्चित और वयोवृद्ध लेखक हीरेन गोहांई के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा चलाना इसका ताजा उदाहरण है। धर्म के आधार पर नागरिकता देना, धर्म के आधार पर घृणा और हिंसा-यह तो संविधान की मूल धारणा के ही खिलाफ है। ऐसे में, यह सवाल पैदा होता है कि 26 जनवरी, 1950 को जिन उम्मीदों के साथ हमने गणतंत्र की स्थापना की थी, क्या वे उम्मीदें पूरी हुई हैं। संसद एवं विधानसभाओं में हाथापाई होती है। चुनावों के दौरान जनप्रतिनिधियों के संवाद का स्तर गिर जाता है। राजनीति के अपराधीकरण से मुक्ति की कोई कोशिश नहीं है। चुनाव खर्च में पारदर्शिता नहीं है। उच्च सदन में थैलीशाहों को चुनकर इसके उद्देश्य को ही खत्म कर दिया गया है। संविधान की समीक्षा और सेक्यूलरिज्म शब्द को हटाने की बातें होती हैं। इतिहास तक को सुविधाजनक और हास्यास्पद तरीके से बदल दिया जाता है।


पिछले कुछ वर्षों में हमने देखा है कि संसद और संसदीय परंपराओं के प्रति सम्मान कम होता गया है। संसद के काम की अवधि ही केवल कम नहीं हुई है, संसद के अंदर के दृश्य भी हैरान करने वाले हैं। बहसों से बचा जाता है। राज्यसभा में जाने से बचने के लिए मनी बिल का रास्ता अपनाया जाता है। अध्यादेश लाए जाते हैं। आज सरकारें अपना विरोध नहीं सह सकतीं, जबकि नेहरू खुद अपनी नीतियों की आलोचना करते थे। संसदीय लोकतंत्र में सत्तारूढ़ पार्टी को विपक्षी दलों से भी सीखने के लिए तैयार रहना चाहिए। आंबेडकर ने कहा था, संसद विपक्ष का मंच है। जनता के मन में लोकतंत्र के प्रति श्रद्धा खत्म हो जाए, तो यह खतरनाक है।


हालांकि इस बीच हमने अनेक मोर्चे पर प्रगति की है। हम एक आर्थिक ताकत बन चुके हैं। सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष अनुसंधान आदि के क्षेत्र में हमारी उपलब्धियां बहुत बड़ी हैं। गरीबी उल्लेखनीय रूप से कम हुई है। लेकिन पिछले डेढ़-दो दशक में अमीरी-गरीबी के बीच खाई भी बहुत बढ़ी है। इतनी असमानता पहले नहीं थी। आज लोगों के पास पैसा तो इफरात है ही, वे इसका प्रदर्शन भी खूब करते हैं। शादियों में बेतहाशा खर्च किया जाता है। मुकेश अंबानी की बेटी की शादी का ही उदाहरण लीजिए। पहले शाहखर्ची की आलोचना होती थी, अब नहीं होती। पर समाज पर इसका असर तो पड़ता ही है। यह संविधान के उद्देश्यों के भी विपरीत है।


औरतों की स्थिति बदली है। उनमें साक्षरता बढ़ी है और वे सजग भी हुई हैं। सामाजिक रूप से पिछड़े राज्यों में बच्चियों के पैदा होने पर पहले जैसा विरोध नहीं होता। हरियाणा में कन्याओं का लिंगानुपात सुधरा है। पर इन्हीं दिनों गुजरात में पाटीदार समाज के बीच बिगड़े लिंगानुपात के कारण ओडिशा और दूसरे राज्यों से दुल्हन लाने का रिवाज चौंकाने वाला है। यानी लड़कियों के प्रति समाज का रवैया नहीं बदला है। वह रवैया बदलेगा, तभी बेहतर उम्मीद की जा सकती है।  

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