ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची कह भी चुके हैं कि भारत जैसे तेहरान के मित्र देशों के लिए यह मार्ग खुला रहेगा। ऐसे संकट के समय में, जब अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में तेल की कीमतों में आग लगी हुई है, होर्मुज के जोखिम भरे रास्ते से तेल और गैस से भरे सबसे अधिक जहाज सुरक्षित निकालना भारत की एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी कही जा सकती है। यही नहीं, 2019 के बाद यह पहली बार है, जब भारत ने ईरान से तेल व एलपीजी आयात किया है, जिसका भुगतान अमेरिकी प्रतिबंधों से बचते हुए युआन/स्थानीय मुद्राओं में करके ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित की गई है।
होर्मुज समुद्री मार्ग की अहमियत इससे ही समझी जा सकती है कि भारत के कच्चे तेल के आयात का करीब 40 फीसदी, एलएनजी आयात का 50 फीसदी से अधिक और एलपीजी आयात का करीब 90 फीसदी हिस्सा इसी मार्ग से ही गुजरता था। भारत की सालाना एलपीजी खपत 3.3 करोड़ टन से अधिक है, जिसमें आयात पर निर्भरता 60 फीसदी है। पिछले कुछ समय में देश में गैस-तेल संकट के संदर्भ में विपक्षी दलों ने सरकार को घेरने की कोशिश की है, लेकिन सरकार ने बेहद तनावपूर्ण वैश्विक हालात में अमेरिका व इस्राइल के साथ ही ईरान के साथ भी संबंधों को साधते हुए अपनी बहुध्रुवीय विदेश नीति का ही परिचय दिया है।
ध्यान देने वाली बात है कि ईरान ने भी पश्चिम एशिया में जारी तनाव को कम करने में भारत की भूमिका को अहम बताया है। हालांकि, चुनौतियां अभी बाकी हैं। अगर अमेरिका व ईरान में जंग रोकने पर सहमति हो भी जाती है, तो ट्रंप की शैली को देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि यह कितना टिकेगी। ऐसे में, भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के मद्देनजर दीर्घकालिक रणनीति अपनानी चाहिए। अच्छी बात है कि भारत ऊर्जा आयात में विविधीकरण को बढ़ावा दे रहा है। लेकिन, अब समय आ गया है कि स्वदेशी ऊर्जा उत्पादन को भी बढ़ावा मिले। आयात निर्भरता को कम करके ही वैश्विक भू-राजनीतिक जोखिमों के असर को सीमित किया जा सकता है।