आदरणीय नेता जी, जीत के बाद आप जहां भी होंगे, आशा ही नहीं, विश्वास है कि सत्ता सुरा के मद में हद से परे कुशल-मंगल होंगे! पर सच कहें, तो हम यहां बिलकुल ठीक नहीं हैं। आपको दिन-रात एक कर जिताने के बाद हमने सोचा था कि हमारी तकदीर बदल जाएगी, पर हमारे तो अब भी वही हाल हैं, जो विपक्ष के रामदीन के मंत्री होने पर थे।
मन में आस थी कि आपके मंत्री पद की शपथ लेते ही हमारी चांदी हो जाएगी, पर यहां तो हाथ कबाड़ी का लोहा भी नहीं लग रहा है। असल में, आपने जो अफसर यहां भेजे हैं, वे हमें खाने नहीं देते! हर जगह टांग अड़ा रहे हैं। हमने उन्हें कित्ती बार कहा कि हम अपोजिशन के खाने वाले नहीं हैं, रूलिंग पार्टी के पांच साल से भूखे वर्कर हैं। अब हमारे मंत्री जी जीते हैं, तो हमें खाने के सारे अधिकार दिए जाएं। अब इस देश के हर साधन, संसाधन पर कायदे से हमारा हक है। पर नेता जी, हमारी यहां कोई सुनता ही नहीं। हमने जो डीसी साहब को अपने वर्करों की लिस्ट आपके पास उनको देने को दी थी, क्या आपने वह उन्हें नहीं भेजी? अगर नहीं भेजी हो, तो कृपा करके उन्हें भिजवा दीजिए प्लीज!
देखो नेता जी! सच तो यह है कि हमें न तो आपका कोई अफसर नदी से रेत, बजरी चुराने दे रहा है, न नदी का खेतों को सींचने वाला पानी बेचने दे रहा है, न ही बचे जंगल काटने दे रहा है। ऐसे कैसे चलेगा? कई बार उसे हाथ जोड़ कर समझा भी चुके हैं कि भैया, सरकार और कोई नहीं, अब हम ही हैं। वे पुराने खाने वाले चले गए, अब हम आए हैं। थक-हारकर हम आपसे अपील करते हैं कि इस इलाके से ऐसे अफसरों को तुरंत बदला ही न जाए, बल्कि सरकार के बंदे को कानून तोड़ने से रोकने के जुर्म में टर्मिनेट भी किया जाए।
वैसे भी जब सरकार हमारी है, तो ये अफसर कौन होते हैं, हमें खाने से रोकने वाले? हमें खाने से रोकने से पहले अपने को देखें। पर यहां अपने को देख कौन रहा है? हो सके, तो आप इन्हें समझा दें कि आपको पगार हम दे रहे हैं, इसलिए हमारे वर्करों को तनिक आंच आई, तो पगार बंद!
हमने जो कहना था कह दिया, बाकी आपकी इच्छा। आशा ही नहीं, विश्वास है कि आप अपने वर्करों के हितों की रक्षा जरूर करेंगे। क्योंकि हमारे हितों में ही आपके हित सुरक्षित हैं। शेष आपके यहां आने पर! पर इन अफसरों का जरूर कुछ कीजिएगा, नहीं तो हम न घर के रहेंगे, न घाट के।