टीवी पर कुछ एक्सपर्ट टाइप लोग राहुल गांधी की गैर-मौजूदगी पर चर्चारत हैं। एंकर ने प्रश्न उछाला, राहुल गांधी वरिष्ठ नेताओं से नाराज होकर छुट्टी पर चले गए हैं। इसे आप कैसे देखते हैं? जवाब मिला, जी, जिन्हें खुद कांग्रेसी नहीं देख पाए, उन्हें भला मैं कैसे देख सकता हूं! एंकर बोला, हुजूर, आपने पर्सनली ले लिया... मेरा मतलब है कि बजट सत्र में राहुल गांधी की छुट्टी के क्या मायने हैं? जवाब मिला, अब कांग्रेस की इतनी दुर्गति हो चुकी है कि राहुल गांधी अगर मौजूद भी रहते, तो किसी का क्या बिगाड़ लेते? संसद में झपकी लेने से बढ़िया ही है कि कुछ दिन हवा-पानी बदलकर आएं।
एंकर ने दूसरे एक्सपर्ट से पूछा, राहुल गांधी कांग्रेस से कई बड़े-बुजुर्गों की छुट्टी करना चाहते हैं, लेकिन उन नेताओं पर उनकी चल नहीं रही। ऐसे में राहुल गांधी को क्या करना चाहिए? एक्सपर्ट बोला, सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि अगर वरिष्ठ नेताओं की छुट्टी कर दी गई, तो उनकी दाल-रोटी कैसे चलेगी? इसलिए रोजगार गारंटी योजना की तर्ज पर कांग्रेस के अंदर भी ऐसे नेताओं के पुनर्वास की एक योजना होनी चाहिए। वैसे भी रोजगार गारंटी योजना कांग्रेस के लिए पहले भी लकी रही है।
एंकर ने प्रश्नवाचक मुद्रा में पूछा, कांग्रेस के अंदर रोजगार गारंटी योजना से आपका मतलब क्या है? एक्सपर्ट ने जवाब दिया, दिल्ली चुनाव में मोदी साहब ने एक जुमला उछाला था जहां झुग्गी, वहीं मकान, इसी तर्ज पर कांग्रेस ‘जहां नेता, वहीं दुकान’ की स्कीम ला सकती है। यह स्कीम उन नेताओं के लिए फायदेमंद रहेगी, जो बरसों से चौबीस-अकबर रोड में जमे हुए हैं।
एंकर ने अगले एक्सपर्ट से पूछा, क्या भाजपा की तरह कांग्रेस भी बड़े-बुजुर्गों को ठिकाने लगाने के लिए मार्गदर्शक मंडल नहीं बना सकती? एक्सपर्ट अपना अनुभव झोंकते हुए बोला, इसमें बड़ा रिस्क है। जिन बंदों के मार्गदर्शन से पार्टी अब विलुप्त होने के कगार पर है, अगर उन्हें फिर वही काम सौंप दिया, तो भविष्य में लोग कांग्रेस के निशान ही ढूंढा करेंगे।