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कसौटी: सरकार के मुखिया को आंकने की एक लोकतंत्रवादी की चाहत और भविष्य के इतिहासकारों की संभावना

रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 02 Jul 2023 07:56 AM IST

सार

भविष्य के इतिहासकार संभवतः यह दर्ज करेंगे कि पीवी नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और नरेंद्र मोदी से बेहतर प्रधानमंत्री थे। अनिवार्यतः इसलिए नहीं कि वे बाद वाले तीनों से विद्वान थे।
 
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पीएम नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो) - फोटो : PTI


पहला, मैं एक ऐसी कांग्रेस चाहता था, जो पूरी तरह से वंशवाद के प्रति कृतज्ञ न हो। दूसरा, मैं एक ऐसी भाजपा चाहता था, जो खुद को आरएसएस और हिंदू राष्ट्र के उसके विचार से अलग कर ले। तीसरा, मैंने एकीकृत और सुधारोन्मुख वाम की कामना की, जो कि हिंसा से पूरी तरह से मुक्त होने के साथ ही अर्थव्यवस्था पर राज्य के नियंत्रण से संबंधित अपने विचार को त्याग दे। और अंत में मैंने एक ऐसी नई पार्टी के गठन की कामना की थी, जो कि विस्तारित मध्य वर्ग की आकांक्षाओं पर आधारित हो, जाति या धर्म से इतर सभी के लिए खुली हो और ऐसी नीतियों को आगे बढ़ाए, जो कि इसी तरह से किसी खास संप्रदाय या जातीय समूह के प्रति उन्मुख न हों।


पंद्रह साल और तीन आम चुनावों के बाद विनम्रतापूर्वक यह देखने का प्रयास है कि यह इच्छा सूची हकीकत से कितनी दूर है। अंततः कांग्रेस में अब एक गैर-गांधी अध्यक्ष है, लेकिन पार्टी पर अब भी परिवार का मजबूत नियंत्रण है। दरअसल कांग्रेस अध्यक्ष बनते ही मल्लिकार्जुन खरगे भारत जोड़ो यात्रा में शामिल हुए और कहा कि भारत के अगले प्रधानमंत्री राहुल गांधी हो सकते हैं। यात्रा ने सोशल मीडिया में 'राहुल फॉर पीएम' हैंडल के निर्माण को प्रेरित किया; कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद इसमें और तेजी आई। बेशक, पार्टी हलकों में इसे लेकर अजीब असहमति की आवाज भी उठती है और कभी-कभी प्रधानमंत्री पद के लिए एक वैकल्पिक कांग्रेस उम्मीदवार का नाम आगे किया जाता है और वह हैं, राहुल की बहन, प्रियंका गांधी।


जहां तक भारतीय जनता पार्टी की बात है, तो आरएसएस और हिंदुत्व से दूरी बनाना तो दूर, वह और मजबूती से उसकी गिरफ्त में आ गई है। तथ्य यह है कि लोकसभा के इसके 300 से अधिक सांसदों में एक भी मुस्लिम नहीं है, यह सामान्य तौर पर अल्पसंख्यकों और विशेष रूप से मुस्लिमों के प्रति उसके व्यापक दर्शन को ही बताता है, जो कि उनके साथ इस भूमि के समान नागरिक की तरह व्यवहार नहीं करता। पाठ्यपुस्तकों का पुनर्लेखन और नए शैक्षणिक पाठ्यक्रम का निर्माण सत्तारूढ़ दल की बहुसंख्यकवादी मानसिकता की अन्य अभिव्यक्तियां हैं।


1998 से 2004 के बीच एनडीए-प्रथम के शासन के दौरान सरकार की नीतियां और कार्यक्रम हिंदुत्व के प्रभाव से अछूते नहीं थे। हालांकि, ये प्रभाव अपेक्षाकृत कम थे, जबकि 2014 में केंद्र में दूसरी बार एनडीए के सत्ता में आने के बाद से, ये और भी अधिक स्पष्ट हो गए हैं। हिंदुत्व की विचारधारा के बढ़ते प्रभाव के साथ ही भाजपा तेजी से एक व्यक्तित्व पंथ की बंधक बन गई है। अतीत में पार्टी ने स्पष्ट रूप से खुद को इंदिरा गांधी की कांग्रेस से अलग दिखाने के लिए 'व्यक्ति पूजा' से दूर रखा था। हालांकि वह संयम अब त्याग दिया गया है और सांसद तथा कैबिनेट मंत्री प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चाटुकारिता भरी प्रशंसा करने में एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं।


धार्मिक बहुसंख्यकवाद और व्यक्तित्व पंथ का यह मेल संसद के नए भवन के उद्घाटन समारोह में वास्तविक के साथ ही प्रतीकात्मक रूप में स्पष्ट नजर आया था। इसमें, जहां राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति अनुपस्थित थे, वहीं उत्सवों का संयोजन इस तरह से किया गया था कि कैबिनेट मंत्री भी शायद ही नजर आ रहे थे। इसका उद्देश्य अकेले एक व्यक्ति को प्रदर्शित करना था, जिसमें उपकृत पुजारी इस अवसर को हिंदुत्व का मंच प्रदान कर रहे थे। उनकी पार्टी के सदस्यों और विस्तारित संघ परिवार ने प्रधानमंत्री को हिंदू सम्राट के दर्जे तक पहुंचा दिया।


अब लेफ्ट या वाम की बात करते हैं। भारतीय राजनीति के इस तत्व ने भी अपने में कोई सुधार नहीं किया, जैसा कि इस लेखक ने उम्मीद की थी। सामने आकर और बहुदलीय लोकतंत्र को अपनाने के बजाय नक्सलवादी अपने प्रभाव वाले जिलों में अनियंत्रित हिंसक कार्रवाई जारी रखे हुए हैं। जहां तक संसदीय वामपंथ की बात है, तो जिस एक राज्य केरल में वे सत्ता में हैं, वहां उन्होंने शासन के प्रति अपने दृष्टिकोण में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं किया है। उच्च मानव विकास सूचकांक बाहर से निजी निवेश के लिए एक चुंबक होना चाहिए; हालांकि, यहां ऐसा नहीं है, क्योंकि माकपा अब भी अर्थव्यवस्था पर सरकार के नियंत्रण वाले दृष्टिकोण का समर्थन करती है।
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पंद्रह साल पहले की मेरी इच्छा सूची में चौथे क्रम पर था एक नई पार्टी का निर्माण। 2012 में भारतीय राजनीतिक मंच पर आम आदमी पार्टी के आगमन के साथ इस इच्छा की सैद्धांतिक रूप से पूर्ति हुई। हालांकि व्यवहारिक रूप में आप ने कोई बड़ा बदलाव नहीं लाया। हालांकि दिल्ली में सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य प्रदान करने में इसका अच्छा रिकॉर्ड है, दूसरी ओर इसकी बैलेंस शीट में अरविंद केजरीवाल के इर्द-गिर्द एक पंथ का निर्माण और पीड़ित अल्पसंख्यकों के लिए खड़े होने से पार्टी का इनकार, जैसे नकारात्मक पक्ष भी हैं।


अब अगले आम चुनाव को एक साल भी नहीं बचे हैं। मैं एक अन्य इच्छा सूची पेश करना चाहता हूं, जो कि पिछली बार से छोटी होगी। मैं चाहता हूं कि लोकसभा में किसी भी एक पार्टी को बहुमत न मिले; वास्तव में सबसे बड़ी पार्टी को बहुमत से पर्याप्त रूप से पीछे होना चाहिए। हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री स्वाभाविक रूप से सत्तावादी हैं, उनके व्यक्तित्व के इस अहितकर पहलू को आम चुनावों में उनकी पार्टी को मिले लगातार दो बहुमत से बल मिला है। मोदी से पहले इंदिरा गांधी को 1971 में जब उनकी पार्टी को भारी बहुमत मिला था, अपनी सत्तावादी प्रवृत्तियों के प्रदर्शन का प्रोत्साहन मिला था।

 

मोदी और इंदिरा के कार्यकालों के बीच, मतदाताओं ने अपनी समझदारी से या उसके अभाव में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी को 1984 के चुनावों में 400 से अधिक सीटें दीं, जिसके राजनीति और शासन के लिए दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम थे। भारत इतना बड़ा और विविधतापूर्ण देश है कि इसे सहयोग और परामर्श के अलावा किसी अन्य तरीके से नहीं चलाया जा सकता। हालांकि, संसद में विशाल बहुमत सत्तारूढ़ दल में अहंकार और घमंड को बढ़ावा देता है।


एक प्रधानमंत्री जिसके पास इतना बहुमत होता है, वह अपने कैबिनेट सहयोगियों के साथ दुर्व्यवहार करता है, विपक्ष का अनादर करता है, प्रेस को वश में करता है, संस्थानों की स्वायत्तता को कमजोर करता है, और राज्यों के अधिकारों और हितों की उपेक्षा करता है, खासकर तब, जब वहां प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली पार्टी के बजाय किसी और दल की सरकार हो।


भविष्य के इतिहासकार संभवतः यह दर्ज करेंगे कि पीवी नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और नरेंद्र मोदी से बेहतर प्रधानमंत्री थे। अनिवार्यतः इसलिए नहीं कि वे बाद वाले तीनों से विद्वान थे। दरअसल राव, वाजपेयी और सिंह ने जिन परिस्थितियों में पद संभाला था, उसने उन्हें कैबिनेट मंत्रियों को और अधिक स्वायत्तता देने, गठबंधन सहयोगियों (जो कि विभिन्न समूहों, धर्मों और हितों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे) को सुनने, सक्रिय रूप से विपक्ष से सलाह लेने, स्वतंत्र प्रेस का निषेध न करने, न्यायपालिका पर दबाव न डालने, सार्वजनिक संस्थानों की स्वायत्तता में अनावश्यक दखल न देने और राज्यों के अधिकारों और उनके हितों का सम्मान करने को मजबूर किया।  


जब ये गठबंधन सरकारें सत्ता में थीं, तब एक प्रभावशाली प्रधानमंत्री के साथ एक प्रबल पार्टी की अनुपस्थिति से आर्थिक विकास, संघवाद, अल्पसंख्यक अधिकार और स्वतंत्र संस्थान सभी को लाभ हुआ। यदि नरेंद्र मोदी और भाजपा को 2024 के आम चुनावों में लगातार तीसरी बार बहुमत मिलता है, तो यह संभवतः भारत में लोकतंत्र, बहुलवाद और संघवाद के लिए हानिकारक होगा। विपक्ष की और भी उपेक्षा की जाएगी, स्वतंत्र प्रेस के तत्वों को और अधिक दबाया जाएगा, अल्पसंख्यकों को और अधिक असुरक्षित महसूस कराया जाएगा, राज्यों को केंद्र के सामने और भी अधिक झुकने के लिए कहा जाएगा। ऐसी स्थिति संभवतः अर्थव्यवस्था के लिए भी हानिकारक होगी। (गठबंधन सरकार का कोई भी प्रधानमंत्री इतना अहंकारी नहीं होगा कि नोटबंदी जैसा विनाशकारी प्रयोग थोप दे।) यही मेरी एकमात्र इच्छा है कि अगले आम चुनाव में किसी भी पार्टी को 250 सीटों से अधिक न मिले, बल्कि आदर्श रूप में 200 से अधिक सीटें न मिलें। यदि ऐसा होता है, तो भारत पर अधिक बुद्धिमानी से नहीं, तो निश्चित रूप से कम अहंकारी ढंग से, बिना किसी एक पार्टी के शासन किया जाएगा।

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