फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

महिलाओं के हक में एक बड़ा कदम

देवेन्द्र सिंह असवाल Published by: देवेन्द्र सिंह असवाल Updated Tue, 02 Mar 2021 05:47 AM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
महिलाओं के खिलाफ अपराध - फोटो : पिक्साबे

विश्वभर के सभी प्रमुख मजहब मानते हैं कि जीवन सृष्टि प्रदत्त है, अतः मनुष्य को जीवन छीनने या समाप्त करने का अधिकार नहीं है। भारतीय दंड संहिता,1860 के तहत स्वेच्छा से गर्भपात कराना दंडनीय अपराध है। भारत के संविधान में जीवन का अधिकार मौलिक अधिकार है। परंतु पिछले कई दशकों से दुनिया भर में, विशेषकर पश्चिम में, ‘गर्भपात’ उग्र बहस का विषय रहा है। इस बहस के दो पक्ष रहे हैं–स्त्री सशक्तीकरण, गरिमा एवं स्वायत्तता तथा जीवन का अधिकार। कुछ प्रबुद्ध लोगों का मानना है कि प्रजनन और गर्भपात महिला की निजी पसंद व अधिकार हैं। दूसरी ओर कई लोग यह मानते हैं कि राज्य का परम कर्त्तव्य है जीवन की रक्षा करना, न कि जीवन लेना। वे भ्रूण संरक्षण जीवन का अभिन्न अंग मानते हैं और गर्भपात को अनैतिक। इंग्लैंड में बड़ी लंबी बहस और विरोध के बाद पहली बार 1967 में गर्भपात कानून बना और उसमें समय-समय पर संशोधन हुए। वहां विशिष्ट व निर्धारित आधार पर ही गर्भपात की अनुमति है। 



अमेरिका में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 1973 में गर्भपात को विशेष आधार और परिस्थितियों में वैध करार दिया गया। गर्भपात के संबंध में अमेरिका के सभी 50 राज्यों में एकरूपता नहीं है, परंतु वहां हर राज्य में गर्भपात निर्धारित कानून के आधार और समय-सीमा में किया जा सकता है। अब तक दुनिया के 70 फीसदी देशों ने गर्भपात संबंधी कानून बनाए हैं। गर्भपात की समय-सीमा के संबंध में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोई मानक नहीं बनाया है। भारत में चिकित्सकीय गर्भपात अधिनियम, 1971 के तहत चिकित्सक की राय के आधार पर 12 सप्ताह तक और दो चिकित्सकों की राय के आधार पर 20 सप्ताह तक गर्भपात किया जा सकता है, यदि गर्भवती महिला के जीवन और उसके मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य को गहरा खतरा है। 


बलात्कार से गर्भ और जन्म नियंत्रण उपायों की विफलता सहित, या भ्रूण की असामान्यता के मामले में भी गर्भाधान के 20 सप्ताह के अंदर गर्भपात किया जा सकता है। लंबे समय से भारत में इस कानून में संशोधन की मांग रही है। ज्ञातव्य है कि विशिष्ट परिस्थितियों में गर्भपात की अनुमति के लिए 26 याचिकाएं सर्वोच्च न्यायालय में तथा 100 से अधिक याचिकाएं विभिन्न उच्च न्यायालयों में दायर की गई हैं, जो भ्रूण की असामान्यताओं और गर्भधारण के कारण अधिनियम के तहत 20 सप्ताह की सीमा से परे, चरणों में गर्भपात की अनुमति चाहते हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी संशोधन बिल, 2020 को लोकसभा में दो मार्च, 2020 को पेश किया था, जिसे लोकसभा ने 17 मार्च को चर्चा के बाद ध्वनिमत से पारित कर दिया। इसमें गर्भपात की ऊपरी सीमा को 20 सप्ताह से बढ़ाकर 24 सप्ताह करने के साथ कुछ संशोधन का प्रस्ताव है। यह विधेयक बलात्कार पीड़ित महिला, पारिवारिक यौन उत्पीड़ित, नाबालिगों के यौन संरक्षण और व्यक्तिगत गरिमा और महिला स्वाभिमान के हित में है। भ्रूण की असामान्यता के मामलों में 24 सप्ताह के बाद गर्भावस्था को समाप्त किया जा सकता है या नहीं, यह तय करने के लिए विधेयक में प्रस्ताव है कि राज्य स्तर के मेडिकल बोर्ड गठित हों।



मातृत्व एक वरदान है, परंतु बलात्कार से उत्पन्न जीवन उस माता के लिए सामाजिक अभिशाप बन सकता है। साथ ही असामान्य भ्रूण या अनिच्छा गर्भ तथा स्त्री को जीवन संकट ऐसी परिस्थितियां हैं, जिनसे निर्धारित प्रक्रिया और निश्चित आधार पर अब गर्भपात हो सकेगा। यह विधेयक सरकार के संसदीय एजेंडा में प्राथमिकता पर है। आशा है, वर्तमान सत्र में राज्यसभा भी इसे पारित करेगी। यह संशोधन विधेयक प्रगतिकारी है, एक लंबी अपेक्षा की पूर्ति करता है तथा महिलाओं की गरिमा और स्वायत्तता के अनुरूप है और उन्हें सशक्त करता है। इसके पारित होने से कई मामले, जो न्यायालयों में लंबित हैं, उनका स्वतः निराकरण होगा और सुरक्षित गर्भपात से मातृमृत्यु दर तथा अस्वस्थता में कमी आएगी। 


(-पूर्व अपर सचिव, लोकसभा तथा संविधान व सार्वजनिक नीति विशेषज्ञ) 

विज्ञापन
विज्ञापन
Next