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रोशनी और अंधेरे को साथ जीता हुआ कलाकार

Sat, 06 Apr 2013 11:31 PM IST
कल्लोल चक्रवर्ती
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करीब चौथाई सदी पहले वसंत कुमार शिवशंकरन पाडुकोणे यानी गुरुदत्त पर अरुण खोपकर की मराठी में आई किताब, 'गुरुदत्तः तीन अंकी शोकांतिका', एक घटना थी। एक तो इसलिए कि गुरुदत्त पर वह पहली आधिकारिक किताब थी।
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फिर, करीब एक सौ चालीस पृष्ठों की वह किताब देसी भाषाओं में सिनेमा पर गंभीर अध्ययन की शुरुआत भी थी। पच्चीस वर्ष बाद स्थिति बदल गई है। मार्क कजिन्स-डेविड बोर्डवेल, ज्योफ्री नॉवेल स्मिथ से लेकर नसरीन मुन्नी कबीर की गुरुदत्त पर किताबें आ चुकी हैं, टाइम मैग्जीन ने 'प्यासा' और 'कागज के फूल' को सौ सर्वकालीन श्रेष्ठ फिल्मों में जगह दी है, तो सीएनएन गुरुदत्त को एशिया के पच्चीस श्रेष्ठतम अभिनेताओं में शुमार कर चुका है। इसके बावजूद गुरुदत्त पर अरुण खोपकर की इस शुरुआती किताब की प्रासंगिकता बनी हुई है, तो वह इसलिए कि तीन फिल्मों की व्याख्या उस आत्महंता फिल्मकार को समझने में मदद करती है।

वस्तुतः सिनेमा के बने-बनाए ढांचे को तोड़े बगैर सामाजिक सच्चाई को कलात्मक ऊंचाई तक पहुंचाने वाली गुरुदत्त की इन तीन फिल्मों, 'प्यासा', 'कागज के फूल' और 'साहब, बीवी और गुलाम' ने हिंदी सिनेमा की धारा बदली थी। आश्चर्य नहीं कि इन फिल्मों पर उन दिग्गजों का भी ध्यान गया था, जो सिनेमा को मनोरंजन का पूंजीवादी माध्यम मानकर उपेक्षा की दृष्टि से देखते थे।
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गुरुदत्त की फिल्मों में पहली बार हाशिये के लोगों को महत्व मिला और स्त्रियों को नए नजरिये से देखा गया। प्रगतिशील साहित्य से व्यावसायिक सिनेमा तक जिस सुखांत की व्यवस्था थी, उसे इन फिल्मों ने तोड़ा। अरुण खोपकर बताते हैं कि अपने समय से आगे होने के बावजूद गुरुदत्त हिंदी सिनेमा की धारा नहीं बदल रहे थे। अगर वह क्रांति करते, तो कमाऊ फिल्मकार नहीं बन पाते।

गाने को फिल्म की मूल कहानी में बाधक मानने के बावजूद वह गानों के बगैर फिल्म बनाने या सत्यजीत राय की तरह संगीत को बैकग्राउंड म्यूजिक तक सीमित रहने का साहस नहीं जुटा पाए। लेकिन वह हिंदी के कदाचित अकेले फिल्मकार हैं, जिनकी फिल्मों में गानों की स्वतंत्र इयत्ता है, वे प्रेम या विरह को घनीभूत करने का माध्यम भर नहीं हैं।

इसी तरह श्वेत-श्याम दौर में रुपहले परदे पर छायाओं के खेल में उनका कौशल दांतों तले उंगली दबाने लायक है। एक ही चेहरे के आधे हिस्से में रोशनी और आधे में अंधेरा रखकर मायालोक रचने की कला उन्होंने ग्यारह की उम्र में ही दीवार पर दीये की रोशनी से छायाओं का संसार बनाते हुए सीख ली थी। बनी-बनाई लकीर पर चलने का पता उनकी फिल्मों के मेलोड्रामेटिक होने से भी चलता है।

लेखक ने इस संदर्भ में उन्हें ऋत्विक घटक के समकक्ष रखा है। विभाजन अगर घटक के तमाम फिल्मों के मूल में है, तो सामाजिक बदलाव से पैदा मोहभंग और व्यक्तित्व का विघटन गुरुदत्त की इन तीन फिल्मों के केंद्र में है। हालांकि यह भी सच है कि प्यासा से साहब, बीवी और गुलाम तक आते-आते गुरुदत्त की फिल्मों में बदलाव भी दिखता है। शुरुआती दो फिल्में अगर व्यक्तिगत त्रासदी का चित्रण हैं, तो तीसरी फिल्म सामंतवादी व्यवस्था के ध्वस्त होने पर आधारित है, इसलिए गुरुदत्त की सर्वश्रेष्ठ फिल्म भी है।

इस फिल्म पर गुरुदत्त की छाप भी तुलनात्मक रूप से कम दिखाई देती है। सर्गेई आइसेंस्टीन की फिल्मों में सौंदर्यशास्त्र पर अपनी मौलिक व्याख्या के लिए चर्चित अरुण खोपकर को गुरदत्त की इस किताब के लिए सर्वश्रेष्ठ पुस्तक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। लेकिन पच्चीस वर्ष बाद गुरुदत्त पर अपनी व्याख्या को विस्तार देकर वह इस किताब के साथ थोड़ा और न्याय कर सकते थे।
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गुरुदत्त-ए ट्रेजेडी इन थ्री एक्ट्स-अरुण खोपकर, अंग्रेजी अनुवाद-शांता गोखले, पेंगुइन बुक्स, मूल्य-250 रुपये।
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