काले धन की प्रकृति ही कुछ ऐसी होती है कि उसके बारे में सही-सही आकलन करना मुश्किल है। इसलिए पांच सौ और हजार रुपये के नोटों को अमान्य किए जाने से होने वाले लाभ की गणना कठिन है। दस ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब तलाशने से कुछ हद तक हम यह समझ पाएंगे कि इस मुहिम से क्या हासिल होने जा रहा है या नहीं होने जा रहा है।
पहला सवाल है, लगता है कि व्यापक रूप में यह मान लिया गया है कि यह कदम काले धन की मौत साबित होगा। यह गलतफहमी है, क्योंकि नोटबंदी से सिर्फ भारतीय रुपये में रखे काले धन के मौजूदा भंडार को ही चोट पहुंचेगी। वास्तव में भारतीय रुपया उन कई रूपों में से एक है, जिनमें काला धन रखा जाता है। मसलन काला धन विदेशी मुद्रा, संपत्ति, सोने और आभूषणों आदि रूपों में भी उपस्थित है। लेकिन क्या यह पूर्ण सूची है? इसके अलावा क्या हम बता सकते हैं कि वास्तव में रुपये के रूप में कितना काला धन जमा है? पहले भाजपा कहती थी कि विदेशों में काला धन जमा है, मगर इस कदम से तो सिर्फ देश के भीतर रुपये के रूप में जमा काले धन को ही नुकसान होगा। तो क्या इसका मतलब यह है कि सरकार ने विदेश में जमा काले धन की वापसी का प्रयास छोड़ दिया?
दूसरा, अपने ज्ञात रूपों, विदेशी मुद्रा, सोना, संपत्ति आदि की तुलना में रुपये की कीमत समय के साथ घट सकती है ( मुद्रास्फीति के कारण)। जबकि विदेशी मुद्रा, सोना और संपत्ति अपनी कीमतें बढ़ने की वजह से जाने जाते हैं, ऐसे में भला कोई काले धन को रुपये में क्यों रखना चाहेगा? एक ऐसा अध्ययन मौजूद है, जो दिखाता है कि नकदी, काले धन का सबसे कम पसंदीदा विकल्प है। तीसरा, नोटबंदी से पहले तक प्रचलन में मौजूद कुल नकदी में से 39 फीसदी हजार रुपये के नोट थे, जबकि पचास फीसदी पांच सौ रुपये के नोट। सामान्य तौर पर माना जाता है कि काले धन को बड़े नोटों की शक्ल में रखा जाता है। ऐसे में क्या सिर्फ हजार रुपये के नोटों को अमान्य करने से काम नहीं चल सकता था? ऐसा करने का सबसे बड़ा लाभ यह होता कि आम लोगों को इसकी वजह से अधिक परेशानी नहीं उठानी पड़ती। चौथा, नोटबंदी के बाद ऐसी खबरें आई हैं कि नकदी की जमाखोरी करने वाले अनेक लोगों ने सोना और आभूषण खरीद लिए, जिसकी वजह से थोड़े समय के लिए सोने के दाम भी काफी बढ़ गए थे। इसी तरह से रुपये को अमेरिकी डॉलर में परिवर्तित करने से डॉलर की दर भी बढ़़ गई थी। जबकि रियल स्टेट के बाजार को तगड़ा झटका लगा। जिन्होंने काला धन सोने-डॉलरों के रूप में रखा था, उन्हें फायदा हुआ और रुपये और प्रापर्टी में रखने वालों को नुकसान हुआ। पांचवां, यदि सरकार मानती है कि काला धन विशेष रूप से पांच सौ और हजार रुपये के बड़े नोटों के रूप में ही रखा जाता है, तब तो दो हजार रुपये का नोट जारी करने से काले धन के लिए दरवाजे खुले ही रहेंगे? इस सवाल का बहुत लचर जवाब ही सामने आया है। एक टीवी चैनल की चर्चा में तो एक प्रतिभागी ने यहां तक कहा कि किसी देश में सबसे बड़ा नोट इतनी कीमत का होना चाहिए, जिससे एक जोड़ी जूते खरीदे जा सकें!
छठा, यदि इस कदम के जरिये आतंकियों के वित्तीय स्रोतों को चोट पहुंचाना है, तो हमें यह भी जानना होगा कि आतंकियों के वित्तीय स्रोत क्या हैं, खासतौर से नकली मुद्रा। अनुमानों के मुताबिक नकली मुद्रा एक छोटी समस्या है। सातवां, यदि यह कदम नकदीविहीन अर्थव्यवस्था की ओर आगे बढ़ने के लिए उठाया गया है, तो क्या इसके लिए जरूरी नियामक ढांचा और कानूनी सुरक्षा (गुप्त लागत, डाटा प्रोटेक्शन और निजता आदि) सुनिश्चित की गई है? ऐसा कोई भी कदम उठाने के लिए हमें सुरक्षा से संबंधित जागरूकता फैलाने और वित्तीय साक्षारता की जरूरत है। नकदीविहीन अर्थव्यवस्था गरीबों पर भारी पड़ सकती है, क्योंकि गरीबों को बहुत सारे छोटे-छोटे लेनदेन करने होते हैं (लिहाजा प्रतिशत में कुल कमीशन बढ़ सकता है)। आठवां, आखिर सरकार यह कैसे तय करेगी कि कौन-सा काला धन है या अघोषित धन है और कौन-सा नहीं है? क्या आयकर का दायरा बढ़ाकर उससे अधिक फायदा उठाने की सरकार की कोई योजना है? कर दायरा बढ़ाने से दीर्घकाल में कहीं अधिक फायदा हो सकता है। लेकिन इसके बजाय कर सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना कहीं बेहतर नहीं होता? (एक निश्चित नकद राशि खाते के साथ पैन कार्ड होना अनिवार्य कर दिया जाए।)
नौवां, क्या इस बात की संभावना नहीं है कि यह कदम गैरकानूनी गतिविधियों को बढ़ावा देगा? उदाहरण के लिए, ऐसी खबरें भी आई हैं कि लोग पांच सौ रुपये के पुराने नोट के बदले तीन सौ रुपये तक लेने को तैयार हो गए हैं। अपुष्ट खबरों के मुताबिक, ऐसी गतिविधियों में कई जगह बैंक कर्मचारी तक संलिप्त हैं। दसवां, आखिर नोटबंदी की कुल लागत कितनी है? उदाहरण के लिए, यदि हम चार हजार रुपये निकालने के लिए एक घंटा कतार में खड़े होते हैं, और यदि हम अपने समय की कीमत प्रति घंटे सौ रुपये आंकें, तो हमें उनतालीस सौ रुपये ही मिलते हैं। इस कदम से विभिन्न तरह की वैध आर्थिक गतिविधियां एक दिन से लेकर अनिश्चितकाल तक के लिए स्थगित हो गई हैं (सब्जियों का कारोबार, परिवहन और कृषि संबंधी कार्य)। इसके अलावा देश भर में नोटबंदी की वजह से पचास से अधिक मौतें होने की खबरें भी आ चुकी हैं।
नोटबंदी कुछ जगहों पर रुपये के रूप में रखे काले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक हो सकती है, पर इससे संपत्ति, सोना और विदेशों में जमा काले धन पर फर्क नहीं पड़ेगा। नोटबंदी से होने वाले लाभ को लेकर कुछ भी स्पष्ट नहीं है, मगर इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। सरकार ने हाल ही में विकास दर और एलपीजी से हुई बचत में जो डाटा जारी किया, उस पर सवाल उठे हैं, जिससे सरकार की विश्वसनीयता कम हुई है। इसलिए नोटबंदी को लेकर सरकार जो दावे कर रही है, उसे परखने की जरूरत है। एक फीसदी गलत लोगों की कीमत निन्यानबे फीसदी क्यों चुकाएं?