परंपरा तो यह है कि संसद के दोनों सदन सर्वसम्मति से चलते हैं, न कि सत्तापक्ष के बहुमत से। एक बहुत ही छोटे से प्रश्न से इसे समझाने की कोशिश करता हूं। जैसे कि ‘हमें बिना भोजनावकाश के संसद की कार्यवाही जारी रखनी चाहिए?’ इस बात का निर्णय पीठासीन पदाधिकारी की अनुमति या सदन के बहुमत से नहीं, बल्कि सर्वसम्मति से होना चाहिए। फिर भी दोनों पीठासीन पदाधिकारियों ने राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) के खिलाफ चर्चा के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। बहुत ही दुख की बात है कि यह पिछली सरकार के पांच सालों की याद दिला रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी के इरादे
संसद के दोनों सदनों में पहली बहस और संसद के बाहर लिए गए फैसलों ने सरकार की मंशा और दिशा को स्पष्ट कर दिया है कि देश सिर्फ एक व्यक्ति के आदेशों पर चलेगा। सदन में दो महत्वपूर्ण घटक (टीडीपी और जेडीयू) के अलावा अन्य छोटे दलों का काम सिर्फ सदन की मेज थपथपाना है। मोदी अपने मंत्रियों या दोनों सदनों के विपक्षी नेताओं को कोई मौका नहीं देंगे। अपनी सरकार की सभी गलतियों का ठीकरा जवाहरलाल नेहरू से शुरू कर बाद की कुछ अन्य सरकारों पर फोड़ा जाएगा। भाजपा के प्रवक्ता ट्रोल्स को लेकर बेहद आक्रामक रहेंगे। उन जांच एजेंसियों पर कोई रोक नहीं लगाई जाएगी, जो सरकार के इशारे पर काम करती हैं और उनका काम जारी रहेगा।
स्पष्ट रूप से 543 सांसदों वाली लोकसभा में भाजपा के 240 या एनडीए के 292 सांसद मिलकर भी मोदी को नहीं रोक पाए तो बाकी के सांसदों का क्या है। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए चार दिन बहुत कम होते हैं, लेकिन ये शुरुआती संकेत हैं।
- महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में भाजपा या एनडीए के सांसद बहुत डरे हुए हैं, क्योंकि बहुत जल्द राज्यों में चुनाव होने वाले हैं और उन्हें स्थिति और खराब होने का अंदेशा है। महाराष्ट्र में वर्तमान सरकार का धीरे-धीरे पतन, हरियाणा में कांग्रेस और भाजपा के बीच बराबरी का मुकाबला, इसके अलावा झारखंड हाईकोर्ट द्वारा हेमंत सोरेन को जमानत देने के फैसले ने इन तीनों राज्यों में इंडी गठबंधन में एक नई जान फूंक दी है।
- एनडीए/भाजपा को पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मेघालय, मणिपुर, नगालैंड और कर्नाटक में हार का मुंह देखना पड़ा, लेकिन खुशी की बात यह है कि यहां अभी चुनाव नहीं होने वाले हैं।
- एनडीए/भाजपा केरल और तमिलनाडु में हार गई।
- दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आसाम, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और गुजरात के एनडीए/भाजपा सांसदों के चेहरों पर एक बड़ी मुस्कान तो थी, लेकिन वे ‘गठबंधन’ वाले टैग की वजह से शर्मिंदा हैं। उन्हें इस बात का भी अंदेशा है कि यह गठबंधन लंबे समय तक चल पाएगा या नहीं?
पहाड़ सी चढ़ाई
भाजपा इस बात को अच्छी तरह जानती है कि अजेय पार्टी होने का दावा करने से पहले उसे एक बड़ा पहाड़ चढ़ना है। उसी तरह कांग्रेस को भी भाजपा से ऊंचे पहाड़ पर चढ़ना है। मैं इस बात को बता सकता हूं कि कांग्रेस ने नौ राज्यों में अपनी अधिकतर सीटें जीती हैं, लेकिन 170 सीटों वाले 9 राज्यों में कांग्रेस ने मात्र 4 सीटें जीतीं, जबकि 215 सीटों पर खुद न लड़कर उसने अपने सहयोगियों को उतारा। कांग्रेस और इंडी गठबंधन एक मजबूत विपक्ष के तौर पर है, लेकिन वे सरकार को हराने की स्थिति में नहीं हैं।
राजसत्ता की चाबी टीडीपी(16) और जेडीयू (12) के हाथों में है। दोनों ही पार्टियां बजट का इंतजार करने के साथ विशेष दर्जा की मांग करते रहेंगे, जबकि उन्हें भी पता है कि मोदी यह नहीं देने वाले हैं। दोनों ही पार्टियों को महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में होने वाले चुनाव के नतीजों का इंतजार रहेगा।
नीतियों पर अनुमान
अनिश्चित राजनीतिक परिस्थितियों का आर्थिक नीतियों से क्या लेना-देना है? मैं कुछ चिंताजनक अनुमान लगा सकता हूं-
- सरकार इन्कार की मुद्रा में बनी रहेगी। वह बढ़ती बेरोजगारी, विशेष रूप से खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमत और निचले तबके में व्याप्त गरीबी और असमानता की बात से भी इन्कार करती रहेगी। ऐसे में मौजूदा आर्थिक नीतियों में कोई आमूलचूल बदलाव नहीं होगा।
- सरकार बुनियादी ढांचे और वैनिटी परियोजनाओं में निवेश करना जारी रखेगी। हालांकि बुनियादी ढांचे पर सरकारी व्यय के आर्थिक लाभ हैं, निजी निवेश नहीं होगा और विकास दर मध्यम रहेगी। घालमेल वाले आंकड़ों से इसका बचाव किया जाएगा।
- सरकार चाइबोल के नेतृत्व वाले विकास के दक्षिण कोरिया मॉडल का पालन करना जारी रखेगी। प्रमुख क्षेत्रों में एकाधिकार और अल्पाधिकार पनपेंगे। नतीजतन, छोटे और मझोले उद्योगों की रफ्तार सुस्त हो जाएगी। नए रोजगार का सृजन सुस्त रहेगा। कम पढ़े-लिखे और लाखों की तादाद में हर साल तैयार होने वाले अकुशल युवाओं को सबसे ज्यादा तनाव झेलना होगा।
- एक बढ़ती उम्र वाले नेता के नेतृत्व में सरकार का तीसरा कार्यकाल उन प्रतिभाओं को अपनी ओर नहीं खींच पाएगा, जो शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन, कृषि एवं वानिकी, विज्ञान एवं अनुसंधान और विकास जैसे प्रमुख क्षेत्रों में परिवर्तन लाने में सहायक हो सकते हैं।
नरेंद्र मोदी ने संसद में दिए गए अपने भाषणों में जितने वादे किए हैं, वे उन्हीं में विश्वास रखते हैं। इसलिए इस तरह की स्थितियों के लिए तैयार रहें।