कभी महात्मा गांधी ने कहा था कि वह 125 वर्ष जीना चाहते हैं। अस्सी वर्ष के पहले ही उनकी हत्या कर दी गई। सवा सौ वर्ष के दीर्घ जीवन के लगभग असंभव को गांधी संभव करना चाहते थे। आज कांग्रेस संभव को लगभग असंभव कर रही है। सभी पार्टियों के मुकाबले बुजुर्ग कांग्रेस के पास इतिहास, अनुभव, स्वतंत्रता संग्राम सैनिक, कालजयी नेता और जय-पराजय की रोमांचक घटनाओं का जखीरा है। उसे शायद यह आत्मसंतोष हो गया है कि वह 128 वर्ष जी चुकी।
कुछ लोग अपने अनुभव को ही भुला देते हैं। दूसरे लोग पड़ोसियों के अनुभव से भी बहुत कुछ सीख लेते हैं। भाजपा ने कालजयी पुरखों का टोटा होने से अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता में गांधीवादी समाजवाद को मकसद बनाया। तिलक, लाजपत राय, सुभाषचंद्र बोस, मदनमोहन मालवीय, पुरुषोत्तम दास टंडन, राजेंद्र प्रसाद, लालबहादुर शास्त्री वगैरह की तस्वीरें भाजपा कार्यालयों में पाई जा सकती हैं। कांग्रेस इन पूर्वजों को ही भूलती नजर आ रही है। जवाहरलाल नेहरू छोटे-मोटे नेता नहीं थे, जिनके नाम पर नफरत पैदा कर संघ परिवार अपना समर्थक बैंक बढ़ाना चाहता है। शहीदे-आजम भगत सिंह ने तो पंजाब के नौजवानों से यहां तक कहा था कि देश और कांग्रेस में जवाहरलाल अकेले नेता हैं, जो आधुनिक तथा वैज्ञानिक समाजवाद के असली पुरोधा हैं।
हाल के विधानसभा चुनावों में पटखनी खाने के बाद कांग्रेस में हलचल मची हुई है। वहां प्रधानमंत्री पद का मुखौटा बदलने के अतिरिक्त आर्थिक नीतियों और कार्यप्रणाली को लेकर कोई सोच या पश्चाताप नहीं दिखाई देता। मनमोहन सिंह की फितरत के कारण बिजली, कोयला, लोहा, अल्यूमीनियम वगैरह के सरकारी क्षेत्र के कारखानों और संसाधनों का बेतरह और बेवजह निजीकरण कर दिया गया। आज के मुकाबले ज्यादा बुरी हालत में रहीं इंदिरा गांधी ने कई निजी उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया। शाही थैली और पदवी की छोड़छुट्टी की। बैंकों और बीमा कंपनियों का दरवाजा जनता के लिए खोला। वी.वी. गिरि को राष्ट्रपति बनाकर ले आईं। पार्टी तोड़कर सिंडिकेट का सफाया कर दिया। ‘गरीबी हटाओ' का नारा बुलंद कर दो बार सत्ता में दो तिहाई बहुमत लेकर आईं। शहीद हुईं, तो कांग्रेस को तीन चौथाई से ज्यादा सीटें दिला दीं।
छत्तीसगढ़ की कांग्रेसी राजनीति जोगी के अपवाद को छोड़कर मध्य प्रदेश के दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और सुरेश पचौरी तक से संचालित है। मध्य प्रदेश सियायी दलदल है। दिग्विजय सिंह ने ही अपने मुख्यमंत्रीकाल में पार्टी को डुबोया है। ज्योतिरादित्य सिंधिया का ग्वालियर तथा इंदौर संभाग के बाहर कोई प्रभाव नहीं है। सीमित दिलचस्पी, पर तेज दिमाग के बावजूद कमलनाथ को मध्य प्रदेश बाहरी व्यक्ति ही मानता है। प्रतिपक्ष के नेता अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह ‘लाइक फादर लाइक सन‘ की अंग्रेजी कहावत के अनुरूप लोकप्रिय बनने के बदले धाकड़ बने रहने में विश्वास करते हैं। राजस्थान में अशोक गहलोत की सरकार के मंत्रियों और विधायकों को सुरा तथा संपत्ति में बहुत रुचि रही है। दिल्ली के चुनाव में शीर्ष कांग्रेसी नेतृत्व ने अपेक्षित दमखम नहीं दिखाया। राहुल गांधी की रैली में भीड़ नहीं होने से भी मनोबल टूटा कि मतदाता कांग्रेस को नकार रहे हैं। आम आदमी पार्टी का तेजी से उद्भव और अंकगणितीय आंकड़ा अनोखी घटना है। केजरीवाल ने इतिहास से धैर्यपूर्ण सबक लेने के बदले सत्तानशीनों को सबक सिखाने का फौरी दायित्व ओढ़ लिया।
राहुल गांधी को मनमोहन सिंह का उत्तराधिकारी बनाने भर से कौन-सी क्रांति होने वाली है? नरेंद्र मोदी कांग्रेस के दुर्गुणों को बीन-बीनकर लड़ रहे हैं। अजूबा है कि कांग्रेसी अपनी मातृ संस्था के बुनियादी गुणों से ही बेखबर हैं। राजीव गांधी ने सियासतदां बनने के बदले सेक्यूलर इंसान दिखने की मुद्रा में अयोध्या मंदिर के दरवाजे खुलवा दिए। उन्हें शाहबानो प्रकरण में कठमुल्ला कांग्रेसियों ने गुमराह किया। उन्होंने देश में दलबदल के कानून के साथ शिक्षा, सफाई और सूचना क्रांति के मिशन लाने का श्रेय लिया। महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार योजना, खाद्य सुरक्षा, लोकपाल कानून विधेयक भी लाए गए हैं। लेकिन अमेरिका के साथ हुई परमाणु करार संधि और खुदरा तथा थोक व्यापार में विदेशी पूंजी निवेश का क्या तुक है?
कम पढ़े-लिखे नेताओं की कांग्रेस में बहार क्यों है? पार्टी में अद्भुत वक्ता जगजीवन राम, कुशल प्रशासक रफी अहमद किदवई, कामयाब संगठक के. कामराज, यशस्वी बौद्धिक राजगोपालाचारी और भारत कोकिला सरोजिनी नायडू वगैरह भी रहे हैं। क्या जनार्दन द्विवेदी, राजीव शुक्ला, सत्यव्रत चतुर्वेदी, संजय निरुपम, कपिल सिब्बल, शकील अहमद, दिग्विजय सिंह, मोतीलाल वोरा और अहमद पटेल वगैरह मिलकर वह नवरत्न बनेंगे, जो मुगलिया दरबार की शोभा थे? कांग्रेस हाशिये पर जा रही है। वह सही प्राथमिकताओं का चुनाव नहीं कर रही। एक गैरराजनीतिक, अनाकर्षक, चलताऊ प्रधानमंत्री को देश के इतिहास पर वह लादे हुए है। वह अपनी शक्तियों को भूलकर कमजोरियों और नाकामियों पर आत्ममुग्ध है। कांग्रेस के पुरोधाओं ने ही सिखाया था कि वक्त एक निर्मम हथियार है। यूरो-अमेरिकी, पूंजीवादी, जनविरोधी, निजीकरण-समर्थक मूल्यों को तरजीह देने के कारण कांग्रेस अपने पाथेय तक पहुंचने के बदले तफरीह करती दिखाई दे रही है।