पृथ्वी कुछ कह रही है और हम हैं कि उसे सुनना ही नहीं चाहते। बढ़ती गर्मी, खत्म होता पानी, दुनिया को जल्दी ही मरुस्थल में बदल देगा और तभी शायद पृथ्वी की बात हमारी समझ में आएगी।
ज्यादा पीछे जाने की जरूरत नहीं है। लगातार दो दशकों से हो रहे पर्यावरण परिवर्तन ही इसका प्रमाण है। इस दौरान पृथ्वी के साथ जो कुछ भी हमने किया, उसका खामियाजा तो हम भुगतेंगे ही, भविष्य को भी अनिश्चित कर देंगे। पानी देश-दुनिया का सबसे बड़ा मुद्दा है। अपने यहां तो पानी पर सब कुछ दांव पर लग चुका है। एक के बाद एक राज्य में पानी के अभाव में स्थिति गंभीर हो रही है। भरपूर वर्षा और नदियों के इस देश को जल विहीन करने में हमारा ही हाथ है। वायु भी प्रदूषित हो गई। विकसित और विकाशील देश सभी वायु प्रदूषण से व्यथित हैं। सिर्फ वायु प्रदूषण ही ऐसा क्षेत्र है, जिसमें हमने चीन को पीछे छोड़ दिया है।
इसी तरह कृत्रिम उत्पादन के लिए रसायनों का इस्तेमाल करके हमने सब कुछ जहरीला कर दिया। आज हमारी थाली विषैली हो चुकी है। वनों के हालात और भी बदतर हो चुके हैं। हिमालयी राज्यों को छोड़कर देश के किसी भी सूबे में 33 प्रतिशत वन नहीं हैं। यही हालात सारी दुनिया के हैं और इसकी वजह है नियोजन की कमी। हमने विकास के मानक तय करते समय जीवन और पृथ्वी की परम जरूरतों को दरकिनार कर दिया था, जो आज हमारे गले की हड्डी के समान है। दुनिया का कोई ऐसा देश नहीं, जो आधुनिकता की दौड़ में शामिल न हो। सारी दुनिया ही जब पृथ्वी की लूट पर तुली हो, तो पृथ्वी को कौन बचाएगा? पेरिस में बैठकर पृथ्वी नहीं बचाई जा सकती। पिछले 40 वर्षों से रियो से शुरू हुई पर्यावरण चिंता के क्या परिणाम आए, यह तो पता नहीं, पर आंकड़ों पर जरूर बात होती है कि दुनिया में कार्बन उत्सर्जन घटा है। अलबत्ता आंकड़ों के सारे दावे खोखले दिखाई देते हैं। अमेरिका के टेक्सास में आई बाढ़, भारत में भीषण सूखा और चीन की बर्फबारी क्या बताती है?
गांव-घरों में लोग सड़क, अस्पताल एवं शिक्षा छोड़कर अगर पानी के लिए हाय-हाय कर रहे हैं, तो समझना चाहिए कि इस देश की दिशा क्या होगी। अप्रैल में ही झुलसाने वाली गर्मी पड़ रही है। पृथ्वी का तापमान 20वीं सदी में बढ़ना शुरू हो गया था और विगत एक सौ वर्षों में यह 0.18 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। हालात यही रहे, तो 21वीं सदी में यह 1.1 से 6.4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा। बेमौसमी बारिश और सूखे ने पहले चरण में किसानों को जरूर तबाह किया हो, पर भुगतना तो सबको पड़ेगा।
जिस पृथ्वी को बनने में करोड़ों वर्ष लगे, उसे हमने कुछ ही दशकों में बर्बाद कर दिया। इसकी वजह यह है कि हम पृथ्वी को समझने में नाकाम रहे हैं। पर्यावरण को सुधारने के कुछ गंभीर प्रस्ताव इस दौरान हालांकि जरूर आए और कुछ गंभीर राजनेताओं ने ऐसा महसूस करते हुए पृथ्वी दिवस मनाने की ठानी। अमेरिकी सांसद जेराल्ड नेल्सन ने 1970 में इसकी शुरुआत की, जिसका उद्देश्य पर्यावरणीय शिक्षा था। आज पृथ्वी दिवस दुनिया के 190 देशों में और 19,000 संगठनों द्वारा मनाया जाता है।
विकास और विज्ञान के समन्वय के अलावा विज्ञान को अगर विपदाओं को समझने के उपयोग में लाया होता, तो हमारी हवा, मिट्टी और पानी संतुलित-सुरक्षित रहते। मंगल से पहले अपनी पृथ्वी की चिंता की जरूरत है। वर्ना दूसरी दुनिया की खोज करने वाले लोग इस दुनिया को खो देंगे।