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नीतीश के नारे में दम नहीं

Sun, 24 Apr 2016 06:48 PM IST
नीलांजन मुखोपाध्याय
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नीलांजन मुखोपाध्याय
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हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 'संघ मुक्त भारत' का आह्वान किया। भाजपा नेताओं ने उनके इस बयान की आलोचना की। शाहनवाज हुसैन का कहना था कि नीतीश कुमार को ऐसा कहने का कोई हक नहीं है, क्योंकि वर्षों तक वह भाजपा के साथ रहे हैं। कभी नीतीश सरकार में उप-मुख्यमंत्री रहे सुशील मोदी ने न सिर्फ यह कहा कि नीतीश कुमार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाना चाहते हैं, बल्कि उन्होंने उन्हें चुनौती भी दी कि अगर उनमें हिम्मत है, तो बिहार में ऐसा करके दिखाएं। सुशील मोदी ने सवाल किया कि संघ से यदि उन्हें इतनी ही नफरत थी, तो फिर जदयू इतने लंबे समय तक गठजोड़ में क्यों रहा। नीतीश के आह्वान पर अन्य दलों की ओर से कोई खास प्रतिक्रिया नहीं हुई है। तो फिर भाजपा को प्रतिक्रिया देकर इसे इतना महत्वपूर्ण क्यों बनाना चाहिए?
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दरअसल भाजपा यह महसूस कर रही है कि यह नारा अपील करने वाला है और इसमें आने वाले दिनों में भाजपा-विरोधी दलों को एकजुट करने की क्षमता है। नीतीश कुमार का आह्वान स्पष्टतः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'कांग्रेस मुक्त भारत' नारे के आधार पर बुना गया है, जो उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में दिया था। पर मोदी ने कांग्रेस को अप्रासंगिक बनाने के लिए अन्य दलों से सहयोग नहीं मांगा था, जबकि नीतीश कुमार ने गैर-भाजपा पार्टियों से भगवा दल को चुनौती देने के लिए संयुक्त मंच तैयार करने का आह्वान किया है।

मोदी सरकार की लोकप्रियता में कमी आने के साथ ही देश में पिछले कुछ महीनों से राजनीतिक उबाल जारी है, पर एक अकेली पार्टी को छोड़कर किसी ने भी नीतीश कुमार के आह्वान का स्वागत नहीं किया। दूसरी पार्टियां भाजपा-विरोधी मोर्चे से दूर ही रहीं (संघ मुक्त भारत वास्तव में भाजपा मुक्त भारत की ही व्यंजना है), क्योंकि बिहार के मुख्यमंत्री के नारे में निहित संदेश यह था कि वह स्वयं ऐसे मोर्चे का नेता बनना चाहते हैं। कोई अन्य नेता इस स्थिति को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं है।
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वर्ष 2014 का चुनाव परिवर्तनकारी था। यह वन मैन शो था और वैचारिक लाइन पर भाजपा का सामाजिक आधार विस्तृत न होने के बावजूद उसे काफी ज्यादा सीटें मिलीं। पार्टी को अतिरिक्त समर्थन मोदी के कारण मिला, क्योंकि भाजपा अब भी मोदी समर्थक वोट के बगैर 30 फीसदी से कम मतों वाली पार्टी है। अन्य पार्टियां तभी फायदे में रहेंगी, जब वे बिहार की तरह भाजपा-विरोधी वोटों को बंटने नहीं देंगी। लेकिन ऐसा हर बार और हर जगह संभव नहीं है। उदाहरण के लिए, असम को देख सकते हैं, जहां नीतीश कुमार ने बिहार की तरह महागठबंधन बनाने का आह्वान किया, लेकिन ऐसा नहीं हो सका, क्योंकि कांग्रेस और ऑल असम यूनाइटेड फ्रंट इसके प्रति उदासीन थीं। भाजपा को हराने के उद्देश्य को छोड़कर वे उत्साहित नहीं हुईं, क्योंकि नीतीश कोई स्पष्ट साझा एजेंडा बनाने में अक्षम रहे। विपक्ष को एकजुट करने की इच्छा रखने वाले नीतीश कुमार या किसी दूसरे नेता को मुद्दा आधारित एजेंडा पेश करना होगा, जिसमें कम से कम एक मुद्दा ऐसा होना चाहिए, जिस पर किसी को विरोध नहीं हो। राज्य स्तर को छोड़कर किसी भी दल का अंध विरोध काम नहीं करने वाला।

भाजपा-विरोधी मोर्चे में कांग्रेस किस तरह से शामिल होगी, इसका भी असर पड़ेगा। क्या 131 वर्ष पुरानी पार्टी दूसरे स्थान पर रहना स्वीकार करेगी या अन्य क्षेत्रीय पार्टियां इसका नेतृत्व स्वीकार करेंगी?  कांग्रेस किसी भी अन्य दल को भाजपा-विरोधी मोर्चे का नेतृत्व तब तक नहीं देगी, जब तक कि वह ऐसी स्थिति में न पड़े, जिसमें कि एचडी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल के नेतृत्व में बने संयुक्त मोर्चा सरकार को समर्थन देने के लिए वह राजी हुई थी। ऐसे में नीतीश कुमार के पास भाजपा-विरोधी दलों के मोर्चे का खुद नेतृत्व करने के आखिर क्या विकल्प बचते हैं?

ऐतिहासिक रूप से आरक्षण हिंदू एकता की राह में एक बड़ा रोड़ा रहा है। बिहार में महागठबंधन की जीत का भी आंतरिक कारक यही था, जिसमें आरक्षण पर मोहन भागवत के बयान ने भी भूमिका निभाई। बिहार में हार के बावजूद मोदी ने बार-बार राष्ट्र को आश्वस्त किया है कि आरक्षण नीति की समीक्षा का इरादा नहीं है। फिर भी संघ के कई नेता यह कहने में नहीं हिचक रहे कि आरक्षण नीति की समीक्षा होनी चाहिए। आरक्षण नीति की समीक्षा का मतलब ही नहीं है। लेकिन जिस देश में समीक्षा के आह्वान को ही नीति का विरोध मान लिया जाता है, वहां संघ द्वारा बार-बार समीक्षा की मांग को आरक्षण से उसकी असहमति के रूप में देखा जाता है।

वर्ष 1990 में वीपी सिंह ने इसे भांप लिया था और उन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की थी। हाल के वर्षों में सामाजिक व्यवस्था में उंची जातियों द्वारा भी ओबीसी सूची में शामिल करने की मांग की जा रही है। गुजरात में पटेल और हरियाणा में जाट इसका हकदार बनने के लिए अपनी सामाजिक हैसियत घटाकर बता रहे हैं। लेकिन यह संभव नहीं, क्योंकि आरक्षण की सांविधानिक सीमा 49.5 फीसदी है। यही वजह है कि हरियाणा में जातिगत हिंसा हुई, क्योंकि जो लोग इसका लाभ ले रहे हैं, उन्हें डर है कि दूसरी जातियां कहीं उनके हक में हिस्सेदारी न करें। लेकिन यदि कोई पार्टी यह घोषणा करती है कि वह कोटा और चयन के मानदंड, दोनों मामलों में आरक्षण नीति की समीक्षा के पक्ष में है, तो यह भाजपा के लिए गंभीर चुनौती होगी। जाहिर है, इसके लिए सरकार को सर्वोच्च न्यायालय का रुख करना होगा। ‘संघ मुक्त भारत’ का विचार लोगों को तभी अच्छा लगेगा, जब नीतीश कुमार या कोई भी दल नए समूहों को आरक्षण का लाभ पहुंचाने के इरादे से इसकी समीक्षा करे और कोटे की सीमा बढ़ाए। अन्यथा यह नारा खोखला ही रहेगा।
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-वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक
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