हाल ही में मुख्यमंत्रियों एवं मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर ने जब भावुक होकर प्रधानमंत्री को न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने को कहा, तो यह मामला सुर्खियों में आ गया। प्रधान न्यायाधीश का भावुक होना कई सवाल खड़े करता है। संविधान के अनुच्छेद 141, 142 एवं 144 सर्वोच्च न्यायालय को देश की सबसे ताकतवर संस्था बनाते हैं। अनुच्छेद 141 के तहत उसके द्वारा दिया गया निर्णय देश का कानून है, जो बाध्यकारी है। अनुच्छेद 142 के अंतर्गत उसे ‘पूर्ण न्याय’ करने हेतु कोई भी निर्णय देने का अधिकार है, और अनुच्छेद 144 के अनुसार देश के सभी नागरिक एवं न्यायिक अधिकारी सर्वोच्च न्यायालय की सहायता के लिए काम करेंगे। फिर प्रधान न्यायाधीश को इतना भावुक होकर अपील करने की जरूरत क्यों पड़ी?
न्यायाधीशों की कमी उतनी बड़ी समस्या नहीं है। असली मुद्दा है, न्यायाधीशों की योग्यता। न्यायाधीशों की गुणवत्ता बढ़ाए बिना केवल संख्या बढ़ाने से लाभ नहीं होगा। एक योग्य जज जहां अधिक मामलों का निष्पादन त्वरित और न्यायपूर्ण तरीके से करता है, वहीं दूसरा जज तारीखें देता है, मामले खारिज करता है या गलत निर्णय देता है। दूसरी समस्या यह है कि जहां अदालत याचिकाकर्ता को राहत भी देती है, उन फैसलों का अनुपालन नहीं होता। अभी स्थिति यह है कि हारने वाला अपील करता है और जीतने वाला अवमानना। दीवानी अवमानना के ऐसे मामलों में संबद्ध अधिकारियों को अदालत कठोर दंड दे, तो मामलों में कमी आएगी। जज-जनसंख्या अनुपात पर पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन की टिप्पणी है-यदि हम अधिक जज, अधिक पुलिस, अधिक वकील तक अपने को सीमित कर लें, जो उसी व्यवस्था में काम करते हैं, तो हम ज्यादा लंबित मामले, ज्यादा विलंब, ज्यादा मुकदमे, ज्यादा जेल और ज्यादा अपराधी पैदा करेंगे। न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर ने भी कहा था कि लंबित मामलों के बढ़ने का असली कारण है उत्तरदायित्व एवं पारदर्शिता का अभाव। इसलिए योग्य जजों की नियुक्ति करनी होगी।
उच्च न्यायालय के ऐसे कई जज हुए हैं, जो मामले की सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लेते हैं और बिना निर्णय सुनाए अवकाश ग्रहण कर लेते हैं। कुछ ऐसे भी जज हुए, जिन्होंने सैकड़ों फैसले सुरक्षित रखे और कोई निर्णय नहीं सुनाया। ऐसे मामले दोबारा खोले जाते है, जिनसे अनावश्यक विलंब तो होता ही है, मुकदमा लड़ने वालों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है। स्थगन लेना भी विलंब का एक बड़ा कारण है। हर मामले में एक पक्ष मामले को खींचना चाहता है। पर अदालत अगली तारीख क्यों देती है? इसका एक कारण शायद यह है कि जज खुद तैयार होकर नहीं आते और स्थगन मांगते ही दे देते हैं। देश में दीवानी मामले पीढ़ियों तक तथा फौजदारी मामले दशकों तक चलते हैं। पुणे में 28 अप्रैल,1966 को बाला साहब पटलोजी को अदालत से उस मामले में राहत मिली, जो उनके पूर्वजों ने पूर्व 1206 में दायर किया था! कोलकाता में 1833 में दायर एक दीवानी मामला अभी तक लंबित है। अब सर्वोच्च न्यायालय के अनेक निर्णयों से यह व्यवस्था बन चुकी है कि त्वरित विचारण का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में शामिल है। पर हकीकत में स्थिति बहुत बदली नहीं है।