पिछले दो संसद सत्रों के दौरान भारी व्यवधान और स्थगन के बाद बजट सत्र में लोकसभा में कामकाज पटरी पर लौटा है और न केवल विधायी कामकाज शुरू हुआ है, बल्कि मौजूदा समय के कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस एवं चर्चा भी हो रही है। इस अर्थ में संसद का मौजूदा बजट सत्र हमारे लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है। संसद ही नहीं, उसके बाहर भी मौजूदा समय में बहस हो रही है और राष्ट्रीय क्षितिज पर कन्हैया कुमार जैसे एक संभावित नेता का उभार हम देख रहे हैं।
बहस किसी भी लोकतांत्रिक समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। बहस मूल्यवान विश्लेषण और वाचन कौशल को बढ़ाती है और समाज को महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के लिए सक्षम बनाती है, चाहे मुद्दा वैज्ञानिक, ऐतिहासिक, धार्मिक या राजनीतिक ही क्यों न हो। यह बहस में हिस्सा लेने वालों के सामने उचित निष्कर्ष तैयार करने की चुनौती पेश कर उनका बौद्धिक एवं नैतिक विकास करने में मदद करती है, जिसमें उन्हें गंभीर रूप से जटिल मुद्दों को जांचना, मान्यताओं पर सवाल उठाना, आंकड़ों की विश्वसनीयता का मूल्यांकन करना और वैकल्पिक दृष्टिकोण पर विचार करना आवश्यक होता है। बहस संप्रेषण कौशल को प्रोत्साहित और परिष्कृत करती है, जिससे कोई भी व्यक्ति न केवल अपने लिए मुखर होने की ताकत जुटाता है, बल्कि अपनी आवाज की तलाश कर उसका उपयोग करता है। बहस मजेदार भी होती है।
बहस एक अनुपम बौद्धिक चुनौती एवं उत्तेजना प्रदान करती है, जैसा कि अमेरिकी नेता और मानवाधिकार कार्यकर्ता मैल्कम एक्स ने अपनी आत्मकथा में लिखा है-'वहां सबके बीच मैं खड़ा हूं, सबकी नजरें मुझ पर टिकी हैं, मेरे मन की बातें मेरे जुबान से निकल रही हैं, जबकि मेरा मस्तिष्क आगे कही जाने वाली अन्य नई चीजों की तलाश कर रहा है और मैं यदि इसे सही तरीके से निपटाकर अपना प्रभाव जमा लेता हूं, तो फिर मैं बहस में जीत जाता हूं-एक बार जब मुझे इसका अनुभव हो गया, तो फिर मैं बहस में उतर गया।'
ब्रिटिश हाउस ऑफ कामन्स के विचारशील बहस के आधार पर भारत के सांसद भी जीवंत एवं दर्शकोन्मुख बहस करते रहे हैं। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने बहस के दौरान कुछ तीखी एवं व्यंग्यात्मक भाषा का प्रयोग किया, जो कड़वाहट के बावजूद स्वागतयोग्य है, क्योंकि बहस होना अच्छा है।
संसद में राहुल गांधी जब राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद ज्ञापन के लिए बोलने के खड़े हुए, तो सबकी नजरें उन्हीं पर टिकी थीं। उन्होंने अपने भाषण में कुछ प्रासंगिक मुद्दों को उठाया, लेकिन मोदी का मजाक भी उड़ाया। प्रधानमंत्री के प्रति अपने विचार स्पष्टता से रखते हुए उन्होंने उनकी नीति एवं कामकाज के रवैये पर टिप्पणी की। राहुल गांधी के भाषण के कुछ हिस्से अच्छे थे, लेकिन उनकी भाषण शैली अब भी प्रभावशाली नहीं है। विचार के स्तर पर कांग्रेस उपाध्यक्ष ने जरूर कुछ आशाजनक संकेत दिए हैं, लेकिन चौबीसों घंटे, सातों दिन टेलीविजन के जमाने में उन्हें अपनी भाषण शैली में कुछ सुधार करने की जरूरत है।
राहुल गांधी ने सदन से बाहर जाकर स्मृति ईरानी का जवाब सुनने का एक महत्वपूर्ण मौका गंवा दिया। यह एक तरह से पलायन था। राहुल के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने संभवतः इस गलती को महसूस किया होगा। राहुल की सबसे बड़ी समस्या है कि उन्हें कम लोग गंभीरता से लेते हैं। लोकसभा में उन्होंने देश के गरीबों और वंचितों के साथ अपने अनुभवों को आवेग के साथ बताया। राहुल को सामान्य-सी सीख यही है कि कठिन परिश्रम से उन्हें नहीं भागना चाहिए और उन्हें और ज्यादा बोलना चाहिए।
जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संसद में बोलने का अवसर मिला, तो उन्होंने काफी तीखा पलटवार किया, मजाक के बदले मजाक उड़ाया, ताने के बदले ताना मारा। अपने भाषण में उन्होंने पूर्व कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों- जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के भाषणों का जिक्र किया, जो पहले की उनकी शैली के बिल्कुल विपरीत था, जब वह अपने भाषण में नेहरू-गांधी परिवार की चर्चा तक नहीं करते थे। यहां तक कि जब नई दिल्ली में अफ्रीकी देशों के नेताओं का सम्मेलन हुआ था, तब उन्होंने नेहरू का नाम तक नहीं लिया था, जबकि कई लोग (जिसमें प्रतिष्ठित अतिथि भी शामिल थे) मानते थे कि भारत-अफ्रीका गठजोड़ की चर्चा तब तक अधूरी है, जब तक उसमें नेहरू का जिक्र न किया जाए।
स्मृति ईरानी का भाषण बेहद ध्रुवीकृत होने के बावजूद सम्मोहित करने वाला था। उनका भाषण नाटकीयता, मिथक एवं अर्धसत्य का मिश्रण था, जो भाषण कला का मादक कॉकटेल जैसा लगता था। उन्होंने संसद को अपना मंच बनाकर शेक्सपीयर को सही साबित कर दिया, जिन्होंने कहा था कि पूरी दुनिया एक रंगमंच है। एक ही झटके में उन्होंने खुद को सुषमा स्वराज, योगी आदित्यनाथ और कई अन्य से काफी आगे भाजपा का बड़ा वक्ता साबित कर दिया। पर मायावती के साथ उनकी बहस को भाजपा के भीतर भी कुछ लोगों ने सहजता के साथ नहीं लिया है। जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने में ज्यादा दिन नहीं हैं, तब इस दलित आइकन को निशाने पर लेना क्या उचित था?
भारत जैसे तेजी से ध्रुवीकृत और खंडित समाज में एक दूसरे से जुड़ने और साझा बेहतरी के लिए वैचारिक प्रतियोगिता की बेहद जरूरत है। सार्वजनिक बहस में हिस्सा लेकर हम विवादित मुद्दों की सामुदायिक चर्चा और सार्वजनिक क्षेत्र में अलग-अलग मतों और लोकतांत्रिक भागीदारी को प्रोत्साहित कर सकते हैं। चूंकि सार्वजनिक अभिव्यक्ति के लिए कुछेक अवसर ही मौजूद हैं, इसलिए सार्वजनिक बहस सामुदायिक चर्चा के लिए महत्वपूर्ण मंच है। लेकिन इसके लिए देश को कुछ कड़वा सुनने की भी आदत बनानी होगी। दुखद है कि न तो सत्ता पक्ष और न ही विपक्ष की ओर से इस मामले में कोई परिपक्वता दिख रही है।
-वरिष्ठ पत्रकार और 24, अकबर रोड के लेखक