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ऊंचे विकास लक्ष्य और मांग में सुस्ती

Mon, 25 Apr 2016 07:12 PM IST
जयंतीलाल भंडारी
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जयंतीलाल भंडारी
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हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक महत्वाकांक्षी योजना ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (भारत का कायाकल्प) को अंतिम रूप दिया है। प्रधानमंत्री की मौजूदगी में नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने योजना से संबंधित प्रेजेंटेशन देकर बताया कि देश के संसाधनों का पूर्ण क्षमता के साथ उपयोग किया गया, तो दस फीसदी की विकास दर प्राप्त करके अर्थव्यवस्था का कायापलट किया जा सकता है। देश की आर्थिक विकास दर अगर 10 प्रतिशत रहे, तो अगले 16 साल में गरीबी खत्म हो सकती है। इतना ही नहीं, सकल घरेलू उत्पाद की डबल डिजिट ग्रोथ से 17.5 करोड़ नई नौकरियां भी पैदा हो सकती हैं। साथ ही 2032 तक भारतीय अर्थव्यवस्था 10 लाख करोड़ डॉलर यानी 100 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बन सकती है। इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था 22 खरब डॉलर की है। चीन की अर्थव्यवस्था 113 खरब डॉलर की है। यद्यपि यह प्रेजेंटेशन देश की आर्थिक संभावनाओं की चमकीली तस्वीर है, पर इसके तहत ऊंचे आर्थिक लक्ष्य और कार्य बिंदुओं के बीच कोई स्पष्ट कड़ी नहीं है। ऊंचे लक्ष्यों के लिए कितना धन लगेगा और यह कहां से आएगा, इसकी स्पष्ट रूपरेखा नहीं है।
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भारत के विकास की संभावनाएं राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में स्पष्ट रूप से रेखांकित हो रही हैं, लेकिन विकास के बहुत ऊंचे लक्ष्य हासिल करना कठिन बना हुआ है। हाल ही में मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वर्ष 2015-16 में भारत 7.5 फीसदी की विकास दर के साथ दुनिया के उभरते हुए देशों में सबसे तेज विकास दर वाला देश बन गया है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम-2015 की रिपोर्ट के अनुसार सुस्त पड़ी हुई वैश्विक अर्थव्यवस्था में नई आर्थिक संभावनाओं के मद्देनजर भारत पहले क्रम पर है। आर्थिक समीक्षा 2015-16 में भी अनुमान लगाया गया है कि 2016-17 में विकास दर 7.25 से 7.75 प्रतिशत के बीच रहेगी। अर्थविशेषज्ञों का मानना है कि चूंकि इस बार मौसम विभाग के अनुमान के मुताबिक मानसून में बारिश सामान्य से ज्यादा होगी, इसलिए विकास दर मौजूदा 7.5 प्रतिशत से अधिक होगी। चूंकि वर्ष 2016-17 के बजट के तहत कृषि सुधार, ग्रामीण सड़कों में निवेश बढ़ाए जाने, 2018 तक 18,000 गांवों के विद्युतीकरण का लक्ष्य, किसानों के हित में फसल बीमा शुरू किए जाने, कृषि उत्पादन, वितरण एवं प्रसंस्करण में 100 प्रतिशत एफडीआई की अनुमति दिए जाने जैसे मसले शामिल हैं, जिससे कृषि एवं ग्रामीण विकास में वृद्धि होगी। परिणामस्वरूप विकास दर में वृद्धि होगी।

वर्ष 2016 में उद्योगों की रफ्तार बढ़ने की भी संभावना है। उद्योग जगत का भी मानना है कि 2016 में अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन बेहतर रहेगा। पर अर्थव्यवस्था के समक्ष कई चुनौतियां भी हैं, जिनका समाधान जरूरी है। ऐसी चुनौतियों में निजी क्षेत्र का निवेश कम होना, बैंकों की बैलेंस सीट का तनाव, बहुत ज्यादा कॉरपोरेट उधारी, मांग की कमी, निर्यात में कमी और वैश्विक अवरोध शामिल हैं। बैंकों में डूबा धन मुख्य रूप से चार-पांच क्षेत्रों, स्टील, बिजली, इन्फ्रास्ट्रक्चर, राजमार्ग, टेक्सटाइल और चीनी उद्योग से जुड़ा है। वस्तुत: अर्थव्यवस्था में नई मांग का निर्माण करना देश की प्रमुख जरूरत है। देश में मांग कमजोर बनी हुई है, क्योंकि आय का विकास धीमी गति से हो रहा है। भारत के विश्व अर्थव्यवस्था का ग्रोथ इंजन बनने की संभावना को साकार करने के लिए विकास से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में रणनीतिक प्रयासों की जरूरत है।
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