हाल ही में कॉलेज के एक छात्र को अमेरिका में उस वक्त विमान से उतार दिया गया, जब वह विमान पर चढ़ने के बाद अपने परिजनों से फोन पर बात कर रहा था। उसने संयुक्त राष्ट्र के एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था और वह अपनी खुशी परिवार वालों से साझा करना चाहता था। उसकी गलती सिर्फ यह थी कि वह अरबी में बात कर रहा था। अमेरिका में इस वर्ष मुस्लिमों को विमान से ऐन वक्त पर उतार देने का यह छठा मामला है।
राजनीतिक व्यवस्था में भी इस तरह के 'इस्लामोफोबिया' ( इस्लाम का भय) को अभिव्यक्त करने से गुरेज नहीं किया जा रहा है। मसलन, डोनाल्ड ट्रंप ने मुस्लिमों के अमेरिका में प्रवेश पर अस्थायी प्रतिबंध की वकालत की है। तब शायद आगंतुकों से यह कहा जाएगा, अमेरिका में आपका स्वागत है! अच्छा तो अब यह बताइए कि आपका धर्म क्या है? टेड क्रूज मुस्लिमों पड़ोसियों की विशेष निगरानी की बात कर रहे हैं। वैसे ध्यान रहे, अमेरिका में एक हजार पुलिस अधिकारी मुस्लिम हैं। तकरीबन पचास फीसदी अमेरिकियों ने प्रतिबंध और विशेष निगरानी का समर्थन किया है।
इस तरह का नजरिया, अमेरिकी मूल्यों का प्रतिकार करता है और इससे हम असहिष्णुता का गढ़ बन जाते हैं। मगर हममें से जो लोग इस पक्षपात का विरोध करते हैं, उनके लिए यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि इस्लामिक दुनिया के भीतर भी असहिष्णुता और चरमपंथ की खतरनाक विकृतियां मौजूद हैं, और इनमें से अनेक का स्रोत सऊदी अरब है।
मुझे इस बात की खुशी है कि राष्ट्रपति बराक ओबामा सऊदी अरब के प्रवास पर हैं। वैसे भी अलग-थलग रहने के बजाय मेलजोल से बात बनती है। कूटनीतिक तफसीलों में उलझे बगैर यह देखना चाहिए कि अस्थिरता फैलाने में सऊदी अरब किस तरह की घातक भूमिका निभा रहा है। दूसरे शब्दों में कहें, तो वह किस तरह से इस्लामिक दुनिया की छवि को खराब कर रहा है। वास्तविकता यह है कि ट्रंप और क्रूज की तुलना में सऊदी अरब के नेता इस्लाम को ज्यादा नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए हमें उनकी कट्टरता का उसी तरह से विरोध करना चाहिए, जैसा कि हम ट्रंप का विरोध करते हैं।
9/11 के हमले से जुड़ी जांच से संबंधित 'गुमशुदा 28 पृष्ठों' को लेकर अमेरिकी परेशान हैं, जिनमें इस हमले में सऊदी अधिकारियों की संलिप्तता की अपुष्ट जानकारियां थीं। मगर मैं यह बता सकता हूं कि जांच आयोग के एक अधिकारी ने मुझे बताया था कि 28 पृष्ठों की यह सामग्री भ्रमित करने वाली है और आयोग ने यह पाया था कि इस हमले की साजिश में सऊदी सरकार या वहां के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा वित्तीय मदद दिए जाने के बारे में कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
सऊदी अरब को लेकर चिंता इसलिए होनी चाहिए, क्योंकि उसने चरमपंथ, घृणा, स्त्री विरोध और शिया-सुन्नी विभाजन को बढ़ावा दिया। यही विभाजन अब पश्चिम एशिया के गृहयुद्ध का सबब बन गया है। वास्तव में सऊदी अरब का नाम बदलकर किंगडम ऑफ बैकवर्डनेस ( पिछड़ेपन का साम्राज्य) कर देना चाहिए। सऊदी अरब में महिलाओं के ड्राइविंग पर प्रतिबंध लगा हुआ है और कार की सवारी करने पर वे सीट बेल्ट नहीं पहन सकतीं। वहां सामूहिक बलात्कार की पीड़ित 19 वर्षीय युवती को दो सौ कोड़े मारने की सजा सुनाई जा चुकी है (हालांकि विरोध के बाद किंग ने उसे माफी दे दी)। वहां सार्वजनिक चर्चों पर प्रतिबंध है और अल्पसंख्यक शियाओं को भारी उत्पीड़न झेलना पड़ता है।
सऊदी अरब में इस्लाम की शुरुआत हुई थी, इस लिहाज से मुस्लिम दुनिया में इसका बहुत प्रभाव है। इस्लाम पर इसके नजरिये को विशेष वैधता प्राप्त है। इसके मौलवियों की पहुंच दूर तक है, मीडिया उनके विचारों को दुनियाभर में फैलाता है। यही नहीं, यह देश घृणा के बीज बोने के लिए गरीब मुल्कों के मदरसों को भारी आर्थिक मदद भी पहुंचाता है। पाकिस्तान से लेकर माली तक सऊदी अरब की वित्तीय मदद से जगह-जगह मदरसे उग आए हैं और धार्मिक चरमपंथ को बढ़ावा दे रहे हैं और आतंकी पैदा कर रहे हैं। विकीलीक्स के जरिये जारी हुए अमेरिकी विदेश मंत्रालय के दस्तावेजों से पता चला था कि पाकिस्तान में ऐसे चरमपंथी मदरसे गरीब परिवारों को 6,500 डॉलर का इनाम देते हैं ताकि वे कम से कम अपने एक बेटे को वहां भेजे। साफ साफ शब्दों में कहें तो सऊदी अरब इस्लामिक चरमपंथ और असहिष्णुता को दुनियाभर में वैधता प्रदान करने का काम कर रहा है। मुझसे कुवैत के एक नागरिक ने कहा था, सऊदी अरब अमेरिका का शत्रु नहीं है, बल्कि खुद का शत्रु है।
एक नए सर्वेक्षण के मुताबिक, पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका के युवा अरब आधुनिक बनना चाहते हैं। सर्वे में शामिल 52 फीसदी युवाओं ने कहा कि पश्चिम एशिया में धर्म कुछ ज्यादा ही बड़ी भूमिका निभा रहा है। सऊदी के अनेक लोगों ने बेताबी के साथ सहिष्णुता पर बातचीत शुरू की है। ऐसी ही पहल करने वाले एक ब्लॉगर को गिरफ्तार कर लिया गया था और उसे एक हजार कोड़े मारने की सजा सुनाई गई।
अतीत में मैंने कई बार इस आधार पर सऊदी अरब का समर्थन किया था कि आखिर यह सही दिशा में तो आगे बढ़ ही रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से मानो यह उलटी दिशा में चल रहा है। उसने यमन में बर्बर युद्ध की भी शुरुआत की थी। सऊदी अरब को लेकर ओबामा की सबसे बड़ी चूक यह है कि उन्होंने उस युद्ध के लिए उसे हथियार मुहैया कराए थे। इसे ह्यूमन राइट्स वाच ने युद्ध अपराध करार दिया था। लेखक और पत्रकार बिल ओरेली ने मेरी आलोचना करते हुए मुझे इस्लाम का सबसे बड़ा समर्थक करार दिया था और मैं आज भी पश्चिम के इस्लामोफोबिया की निंदा करता हूं। लेकिन इसके साथ ही मैं यह कहना चाहता हूं कि सऊदी अरब हमारे गैस स्टेशन से कहीं कुछ अधिक है; यह इस्लामिक दुनिया में जहर का स्रोत है और इसकी कट्टरता हमारी कट्टरता को हवा दे रही है।