फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

पारदर्शितापूर्ण खुली प्रक्रिया के जरिये हो कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव

रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 08 Mar 2020 02:54 PM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
rahul gandhi sonia gandhi - फोटो : विवेक निगम

अमेरिका में दो हफ्ते बिताने के बाद मैं बस वापस ही आया हूं। मेरी यह यात्रा इत्तफाक से ऐसे समय हुई, जब वहां अगले राष्ट्रपति के चुनाव के सिलसिले में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार के चयन के लिए प्राइमरी का आयोजन हो रहा था। अमेरिकी दोस्तों के साथ बातचीत इसी विषय पर केंद्रित रही, जिसमें उम्मीदवारों के तुलनात्मक गुणों के विरोधाभास पर बात होती रही। 



शाम को मैं होटल के अपने कमरे में टेलीविजन पर चलने वाली बहसें और टाउन हाल से संबंधित कार्यक्रम देखता था, जिनमें उम्मीदवार सीधे अपनी दावेदारी प्रस्तुत कर रहे थे। मैं सैंडर्स की गंभीरता, वारेन की बुद्धिमत्ता और बुटिगेज के आकर्षण से प्रभावित हुआ, जबकि बीडेन की उपलब्धियां भी कोई खारिज करने लायक नहीं थीं। 


मैं जब विदेश में था, तब भारत में इस बात पर चर्चा हो रही थी कि मुख्य विपक्षी पार्टी का अगला अध्यक्ष कौन हो सकता है। कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ सांसदों ने इस मुद्दे के निपटारे के लिए चुनाव कराने की मांग की। कुछ युवा कांग्रेसियों ने अखबारों में आलेख लिखकर उनकी आवाज को तेज किया और वे भी यही सोचते हैं कि किसी नए चेहरे का चुनाव ही भारत की सबसे पुरानी पार्टी को नया रूप देने का सही तरीका हो सकता है। 


कांग्रेस के भीतर से नए अध्यक्ष के चुनाव को लेकर उठ रही इन आवाजों से आशय ऐसे चुनाव से है, जिसमें व्यक्तिगत तौर पर उम्मीदवार खुद को आगे करें और अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के 1,200 सदस्य वोट डालें। हालांकि अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी का उदाहरण एक अन्य और कहीं अधिक लोकतांत्रिक विकल्प प्रस्तुत करता है। 


आखिर कांग्रेस क्यों नहीं पार्टी सदस्यों तक सीमित रहने वाले चुनाव से पहले टेलीविजन पर बहसों और टाउन हाल के आयोजन पर विचार कर सकती, जिनमें उम्मीदवार अपने दृष्टिकोण और नेतृत्व की अपनी क्षमता का प्रदर्शन करें? यह प्रक्रिया किस तरह की हो सकती है, इस बारे में कुछ कहने से पहले मुझे जरा आज की भारतीय राजनीति के दो महत्वपूर्ण सच को सामने रखने दीजिए। 


पहला, भारत में आम चुनाव तेजी से अध्यक्षीय प्रणाली जैसे हो रहे हैं और जो व्यक्ति 2014 और 2019 में नरेंद्र मोदी का मुकाबला करने में जिस बुरी तरह नाकाम रहा हो, वह 2024 में सफल होने की उम्मीद नहीं कर सकता। इसी आधार पर राहुल गांधी को कांग्रेस की अध्यक्षता नहीं मिलनी चाहिए और उनकी बहन को भी यह जिम्मेदारी नहीं मिलनी चाहिए। विशेष रूप से युवा भारतीयों में परिवारिक आधार पर मिलने वाली सुविधा और विशेषाधिकार को लेकर अरुचि है। 


हाल ही में दिल्ली में मेरी मुलाकात तकरीबन 80 कॉलेज विद्यार्थियों से हुई थी और तकरीबन वे सारे भाजपा की बहुसंख्यकवाद की राजनीति के खिलाफ थे। जब मैंने उनसे पूछा कि उनमें से कितने लोग यह सोचते हैं कि राहुल गांधी नरेंद्र मोदी का प्रभावी तरीके से मुकाबला कर सकते हैं, तो इस पर सहमति जताने के लिए उनमें से किसी ने हाथ नहीं उठाया। 
विज्ञापन


दूसरा सच यह है कि हाल के वर्षों में सिकुड़ने के बावजूद कांग्रेस अकेली ऐसी पार्टी बची है, जिसका पूरे भारत में भारतीय जनता पार्टी के अलावा आधार हो। इसके नए अध्यक्ष का निर्वाचन इस उम्मीद को जिंदा रख सकता है कि विपक्ष नरेंद्र मोदी और भाजपा को तीसरे कार्यकाल से रोक सकता है। इसीलिए इसके नए नेता का चुनाव जितना संभव हो सके विचार-विमर्श और पूरी तरह से पारदर्शितापूर्ण खुली प्रक्रिया के जरिये होना चाहिए। 


डेमोक्रेटिक प्राइमरी ऐसा शानदार मॉडल है, जिसे पूरी तरह न सही, मगर बुनियादी तौर पर अपनाया जा सकता है। ऐसे कौन लोग हैं, जिन्हें कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव के लिए आगे आना चाहिए या उन्हें आगे किया जाना चाहिए? ओडिशा के एक छात्र ने मुझे हाल ही में लिखा और कैप्टन अमरिंदर सिंह और शशि थरूर के नाम सुझाए। इनमें से पहले अनुभवी प्रशासक और पूर्व सैनिक हैं; दूसरे प्रखर बुद्धिजीवी और मुखर हैं। 


तीसरी संभावना भूपेश बघेल हो सकते हैं, जो कि अभी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री हैं। मुख्यमंत्री के रूप में उनके एक साल का कार्यकाल बताता है कि वह बड़ी चुनौतियों का सामना कर सकते हैं। चौथे उम्मीदवार सचिन पायलट हो सकते हैं, जिन्होंने राजस्थान के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत में अहम भूमिका निभाई थी और वह सांसद तथा केंद्रीय मंत्री भी रह चुके हैं। पांचवें कर्नाटक के सिद्धारमैया हो सकते हैं, जो कि पूरी तरह से अपने दम पर राजनेता बने हैं, जिनका ग्रामीण जन से मजबूत संपर्क है और जिन्हें पर्याप्त प्रशासनिक अनुभव प्राप्त है। 


ऊपर जिन पांच व्यक्तियों का जिक्र किया गया है, वे सब कांग्रेस पार्टी के सदस्य हैं। हालांकि यह प्रक्रिया तब और अर्थपूर्ण हो जाएगी जब इसे पूर्व सदस्यों के लिए भी खोल दिया जाए। मैं समझता हूं कि विशेष रूप से ममता बनर्जी ने मेहनत करके कांग्रेस पार्टी में अपनी जगह बनाई थी और उसे सिर्फ इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि पार्टी के बुजुर्ग लोगों ने उन्हें आगे बढ़ने का मौका नहीं दिया। यदि वह इस बहस में शामिल हो सकतीं और यह दावा कर सकतीं कि उन्हें क्यों एकीकृत पार्टी का अध्यक्ष बनना चाहिए, तो यह बहस और विश्वसनीय और सजीव हो जाएगी। 


वास्तव में, ऐसा कोई कारण नहीं है कि आखिर क्यों (अमेरिकी डेमोक्रेट्स मॉडल की तरह) यह प्राइमरी उन लोगों के लिए भी खुली हो जो कभी कांग्रेस पार्टी के सदस्य नहीं रहे। उदाहरण के लिए, कोई सफल उद्यमी या कोई चमत्कारिक सामाजिक कार्यकर्ता दावेदार हो सकता है, जिससे चुनाव कहीं और अधिक दिलचस्प हो जाएगा। 


बंद कमरों में नए अध्यक्ष का चुनाव करने के बजाय कांग्रेस को यहां सुझाए गए मॉडल पर विचार करना चाहिए। इसके लिए विभिन्न शहरों में हिंदी और अंग्रेजी में उम्मीदवारों के बीच बहस आयोजित की जा सकती है, जिसे रवीश कुमार जैसे किसी प्रतिष्ठित एंकर को मॉडरेट करना चाहिए। इसके साथ ही उम्मीदवारों को अपना दावा पेश करने के लिए प्रेस को साक्षात्कार देने, भाषण देने और व्यक्तिगत घोषणा पत्र जारी करने की छूट हो। 


इस प्रक्रिया में कुछ महीने लग सकते हैं। यदि यह प्रक्रिया जल्दी शुरू हो जाती, तो इस साल के अंत तक इसे खत्म किया जा सकता, यानी अगले आम चुनाव से साढ़े तीन साल पहले। विजेता उम्मीदवार को यह जीत खुली और पारदर्शी प्रक्रिया के जरिये मिलेगी, जिससे उसके पास पार्टी का नेतृत्व करने का पूरा अधिकार होगा। ऐसे में संभवतः नए अध्यक्ष की पहली प्राथमिकता तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और वाईएसआर कांग्रेस जैसे अलग हुए धड़ों को फिर से मुख्य पार्टी में शामिल करने की होगी। उसकी दूसरी प्राथमिकता होगी ऐसी क्षेत्रीय पार्टियों के साथ करीबी और सौहार्दपूर्ण संबंध बनाना, जिनके साथ वह गठबंधन बनाना चाहेगी। 


यह सब हो जाने के बाद कांग्रेस आम चुनाव लड़ने के लिए फंड जुटाने और सांगठनिक क्षमता खड़ी करने के बारे में विचार कर सकती है। इस स्तंभ को लिखने में बहुत मजा आया, इस विचार के प्रयोग से कि कैसे एक बार महान, अब मरणासन्न पार्टी खुद को नवीनीकृत और सुधार करना शुरू कर सकती है। हालांकि ऐसा लगता है कि इसे पढ़ा तो जाएगा, मगर मुझे संदेह है कि इसमें दिए गए सुझावों पर अमल होगा।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next