उत्तर प्रदेश क्षेत्रफल के लिहाज से देश का चौथा सबसे बड़ा राज्य है और जनसंख्या के मुताबिक पहला। अर्थ यह कि उपलब्ध संसाधनों और आवश्यकताओं का अनुपात मानकों के अनुरूप नहीं बैठता। और यहीं से शुरू होता है चुनौतियों का सिलसिला। 25 करोड़ की आबादी की हर जरूरत पूरी करना कोई आसान काम नहीं। इन परिस्थितियों में किसी भी राज्य के लिए विकास का आदर्श मॉडल क्या हो सकता है, इस पर चर्चा जरूरी हो जाती है। क्या उत्तर प्रदेश की सभी जरूरतें सरकारी रेवड़ियां बांटकर पूरी की जा सकती हैं? क्या सिर्फ बजट प्रावधानों से प्रति व्यक्ति आय अपने उच्चतम स्तर तक जा सकती है? क्या सिर्फ सरकारी पैसे से विकसित व आत्मनिर्भर उत्तर प्रदेश का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है? जवाब है नहीं। बुनियादी ढांचे के विकास को छोड़ दें तो समाज के विभिन्न वर्गों को दी जाने वाली बजटीय सहायता सिर्फ तात्कालिक राहत देती है। यह उनकी समस्याओं का स्थायी निराकरण नहीं करती। किसी भी राज्य की जनता का आर्थिक स्तर ऊंचा करने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए सुनियोजित नीति के तहत बजट निर्धारण आवश्यक हो जाता है और योगी सरकार ऐसा करने में सफल रही है।
राज्य का समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए सबसे पहले उसकी जमीनी वास्तविकताओं यानी प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता, शिक्षा, स्वास्थ्य, मानव संसाधन, कौशल, तकनीक, नवाचार, बाजार, निवेश की अनुकूलता आदि का समग्र अध्ययन जरूरी है। तभी सर्वांगीण विकास का ब्लूप्रिंट तैयार किया जा सकता है। योगी सरकार ने राज्य के लिए विकास का जो मॉडल तैयार किया है, उसकी सराहना की जानी चाहिए। यह मॉडल राज्य को उपभोग से उत्पादकता की ओर ले जाता है और यही स्थायी विकास की कुंजी है। मुफ्त की रेवड़ियां बांटने के बजाय सरकार ने दीर्घकालीन रणनीति के तहत निवेश करना बेहतर समझा। निवेश अपने लोगों में, शिक्षा के उन्नयन और उसके विस्तार में, कौशल विकास में, रोजगार के अवसर पैदा करने में, बुनियादी ढांचे के विकास में, ग्रामीण व पिछड़े इलाकों को आत्मनिर्भर बनाने में और निवेशकों के लिए राज्य को आकर्षक बनाने में। ऐसा भी नहीं है कि सरकार खर्च नहीं कर रही, बजटीय सहायता नहीं दे रही। बस, अंतर केवल इतना आया है कि सरकार वहीं पैसा लगा रही है, जहां से ठोस व स्थायी परिणाम मिलना सुनिश्चित है। पिछले कई वर्षों में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार इसी दिशा में कार्यरत नजर आ रही है। और, इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आने लगे हैं। फसल सुरक्षा के साथ-साथ उन्नत तकनीक मुहैया कराई गई तो किसानों की उत्पादकता में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला। सीएम युवा उद्यमी योजना ने युवाओं को स्वरोजगार के टूल्स दिए, उन्हें नौकरी करने के बजाय रोजगार देने के लायक बनने का मंच प्रदान किया। विभिन्न योजनाओं को बजटीय सहायता देकर ग्रामीण महिलाओं को स्वावलंबी बनाया जा रहा है।
सरकार चाहती तो एमएसएमई सेक्टर के लिए किसी बड़ी छूट का ऐलान कर लोक-लुभावन कदम उठा सकती थी, लेकिन उसने ऐसा करने के बजाय एक जिला-एक उत्पाद (ओडीओपी) योजना को आगे बढ़ाया, छोटे उद्यमियों को गुणवत्तापूर्ण उत्पाद बनाने में, उनकी ब्रांडिंग में और उनके लिए बाजार तलाशने में मदद की। नतीजा यह कि ओडीओपी से एमएसएमई को जबरदस्त बूस्ट मिला। आज ओडीओपी से जुड़े उद्यमी, कारीगर, विक्रेता, सभी लोगों की आय में कई गुना वृद्धि दर्ज की जा रही है। अब वे सरकारी अनुदान पर निर्भर नहीं हैं, जो कितने दिन काम आता? अभी प्रदेश में 96 लाख एमएसएमई यूनिट्स के माध्यम से करीब तीन करोड़ परिवारों का पालन-पोषण हो रहा है और यह एक बड़ी उपलब्धि है। राज्य का निर्यात भी 84 हजार करोड़ से बढ़कर 1.86 लाख करोड़ रुपये तक जा पहुंचा, क्या ये सब बजटीय अनुदान से संभव होता? अब इसी कड़ी में ‘एक जिला-एक व्यंजन’ (ओडीओसी) योजना को बजट प्रोत्साहन देकर स्थानीय स्तर तक सीमित छोटे उद्यमियों व कारीगरों के लिए राष्ट्रीय व वैश्विक बाजार खोलने का काम किया जाने वाला है। यह योजना न सिर्फ उनका व्यापार बढ़ाएगी, वरन रोजगार के नए अवसर भी पैदा करेगी।
यूपी जैसे कृषि प्रधान राज्य में किसानों को उद्यमिता की तरफ ले जाने का निर्णय सरकार की दूरदर्शी सोच को दर्शाता है। सरकार ने नौ साल पहले किसानों के ऋण जरूर माफ किए, लेकिन उसके बाद उसकी नीति उत्पादकता बढ़ाने और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की ही रही। सरकार ने सिंचाई व्यवस्था चाक-चौबंद की और किसानों को नई तकनीकों से रूबरू कराया, परिणाम यह कि यूपी में कृषि विकास दर 8 से बढ़कर 18 प्रतिशत से अधिक दर्ज की जा रही है। गौरतलब है कि भारत की कुल आबदी का 17 प्रतिशत हिस्सा यूपी में निवास करने के बावजूद यहां कृषि योग्य भूमि मात्र 11 प्रतिशत है। इसके बावजूद देश के कुल अनाज उत्पादन में 21 फीसदी हिस्सेदारी तक पहुंचना योगी सरकार की बड़ी उपलब्धि ही कही जाएगी।
यहां इस बात का उल्लेख करना भी आवश्यक हो जाता है कि अराजकता के माहौल में विकास के बीज अंकुरित नहीं होते। योगी आदित्यनाथ भली-भांति समझते थे कि शांति व सुरक्षा का वातावरण बनाए बगैर विकास का कोई भी मॉडल काम नहीं आने वाला, खासतौर से निजी क्षेत्र निवेश के लिए अपनी झोली नहीं खोलेगा। इसीलिए उन्होंने सबसे पहले वह किया, जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी, कानून-व्यवस्था के राज की बहाली। क्योंकि भयमुक्त वातावरण में ही भरोसे का जन्म होता है। हुआ भी यही, आज यूपी में भय का नहीं, भरोसे का माहौल है। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए यूपी पहली पसंद बनता जा रहा है। बजट में मुफ्तखोरी को प्रोत्साहन देकर यह सब हासिल नहीं किया जा सकता था। चाहें किसान हों, महिला, युवा या श्रमिक, योगी सरकार का सबके लिए स्पष्ट संदेश है - आत्मनिर्भर बनिए, उपभोक्ता से बढ़कर उत्पादक बनिए, और इसके लिए सरकार हरसंभव सहायता करने के लिए तैयार है। सरकार की इस नीति का परिणाम प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय को 43 हजार से बढ़ाकर 1.20 लाख रुपये पर ले आया है। इसी तरह राज्य की आय बढ़ती है तो उसका लाभ भी नागरिकों को मिलता है, यूपी सरकार को पिछले कई वर्षों से जनता पर कोई नया कर लगाने की जरूरत नहीं पड़ी।
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यूपी सरकार के इस बजट को राजनीतिक चश्मे से देखना बंद करना होगा। 9.12 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा राशि वाले इस बजट में 19.5 फीसदी हिस्सा पूंजीगत खर्चों के लिए आरक्षित है। इसके अलावा शिक्षा पर 12.4, कृषि पर 9 और चिकित्सा पर 6 प्रतिशत खर्च करेगी यूपी सरकार। यानी, बुनियादी ढ़ांचे का विकास और शिक्षित-स्वस्थ समाज। समग्र-स्थायी विकास का मंत्र भी यही है। 27 हजार करोड़ रुपये से अधिक धनराशि आधारभूत ढांचे के विकास व विस्तारीकरण पर खर्च होगी तो राज्य में कई अन्य इलाकों को भी निवेशकों के लिए अनुकूल बनाया जा सकेगा, जैसे लंबे समय तक उपेक्षा का शिकार रहे बुंदेलखंड के ललितपुर जिले को बेहतरीन कनेक्टिविटी, लॉजिस्टिक्स, बिजली-पानी व अन्य आवश्यक सुविधाएं प्रदान कर फार्मा हब के रूप में विकसित किया जा रहा है। मतलब यह कि सरकार बजटीय प्रावधानों के जरिये सुविधाएं विकसित करेगी, कौशल विकास करेगी, नवाचार से प्रेरित नई तकनीकों का लाभ देगी और लोग खुद विकसित राज्य की नींव रखने में समर्थ हो जाएंगे। यही है इस बजट का और योगी सरकार का संदेश।
कुल मिलाकर यह कहा जाए कि सरकार लोगों को सीधे आर्थिक मदद देने के बजाय उन्हें कमाई के लायक बनाने का काम कर रही है तो इसमें उन्हीं लोगों को तकलीफ हो सकती है, जो वर्षों से रेवड़ियां बांटकर पब्लिक को गुमराह करते और उन्हें आश्रित बनाते आ रहे हैं। संतुलित, सुनियोजित बजट उन्हीं राजनेताओं को चुभता है, जिनका हथकंडा गिफ्ट देकर जनता का वोट हासिल करना रहा है। ऐसे लोगों का विश्वास कभी प्रदेश की जनता को स्थायी रूप से आत्मनिर्भर बनाने, समृद्ध करने, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास या तकनीकी उन्नयन की ओर ले जाने में नहीं रहा। वे जानते हैं कि एक शिक्षित, स्वस्थ और आजीविका के प्रति निश्चिंत व्यक्ति अपने मताधिकार का प्रयोग करते समय राजनीतिक दलों की नीतियों, कार्यशैली व परिणामों का विश्लेषण भी करेगा। और, यहां उनका रिपोर्ट कार्ड ज़ीरो दिखाता है। ऐसे में उनके पास एकमात्र विकल्प यही बचता है कि एक झूठ को इतनी बार और इतनी जोर से बोलो कि लोगों को वो सच दिखाई देने लगे। यह कहना कि बजट में पिछड़े-उपेक्षित इलाकों और वंचित तबके के लिए कुछ नहीं है, ऐसा ही एक झूठ है, जिसको बार-बार बोलकर सच बनाने की कोशिश जारी है। लेकिन, उनकी दिक्कत यह है कि कोई सुन नहीं रहा है।
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