कोलकाता के बीबीडी बाग की पहचान मानी जाने वाली राइटर्स बिल्डिंग केवल एक प्रशासनिक भवन नहीं, अपितु पश्चिम बंगाल की राजनीतिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। इसकी लाल दीवारों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के शुरुआती क्लर्कों से लेकर स्वतंत्र भारत के मुख्यमंत्रियों तक सत्ता के बदलते चेहरे देखे हैं। यही कारण है कि जब भी इस भवन में फिर से सरकारी कामकाज शुरू करने की चर्चा होती है तो वह महज आफिस बदलने का मामला नहीं रह जाता, वह इतिहास, राजनीति और जनभावना का विषय बन जाता है।
नबान्न ने ममता बनर्जी को अपेक्षाकृत नियंत्रित और आधुनिक प्रशासनिक वातावरण दिया, लेकिन आम बंगाली मानस में राइटर्स बिल्डिंग की जगह कभी खाली नहीं हुई। राइटर्स बिल्डिंग के संरक्षण और नवीनीकरण का काम शुरू तो हुआ, लेकिन धीमी गति, तकनीकी चुनौतियों और प्रशासनिक विलंब के कारण यह वर्षों तक पूरा नहीं हो सका। विरासत भवन होने के कारण इसकी संरचना में बदलाव आसान नहीं था।
ऐतिहासिक विरासत को सम्मान देने का संदेश
यह भवन इस सवाल का प्रतीक बन गया कि क्या हमारी सरकारें अपनी ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने में पर्याप्त गंभीर हैं?
हालांकि, अब भाजपा सरकार के फिर से राइटर्स बिल्डिंग से कामकाज शुरू करने के निर्णय के पीछे कई संकेत हैं। पश्चिम बंगाल की प्रशासनिक परंपरा से पुनः इससे जुड़ने की इच्छा है। यह ऐतिहासिक विरासत को सम्मान देने का संदेश है। सत्ता परिवर्तन के बाद नई राजनीतिक पहचान गढ़ने का प्रयास है। जनता की भावनात्मक स्मृति से संवाद भी स्थापित होगा। राइटर्स बिल्डिंग में वापसी यह संकेत भी देती है कि इतिहास को पूरी तरह छोड़ा नहीं जा सकता। अंततः राजनीति को अपनी जड़ों तक लौटना पड़ता है।
यह भी सत्य है कि सत्ता के भवन कभी तटस्थ नहीं होते। व्हाइट हाउस, 10 डाउनिंग स्ट्रीट या राइटर्स बिल्डिंग, सभी अपने-अपने लोकतंत्रों के प्रतीक हैं। हालांकि, दिल्ली में साउथ-नार्थ ब्लॉक से भारत सरकार के मंत्रालय शिफ्ट हो गए हैं। अब इसे संग्रहालय में तब्दील किया जा रहा है।
ममता बनर्जी ने नबान्न को चुना तो वह परिवर्तन का संदेश था। अब भाजपा सरकार राइटर्स बिल्डिंग में लौट रही है तो वह निरंतरता, परंपरा और ऐतिहासिक वैधता का संदेश है, लेकिन जनता का अंतिम मूल्यांकन भवन से नहीं, शासन से होगा। यदि रोजगार, निवेश, कानून-व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार होता है तो यह वापसी सार्थक मानी जाएगी। अन्यथा यह केवल प्रतीकात्मक राजनीति बनकर रह जाएगी।
दरअसल, राइटर्स बिल्डिंग की कहानी बंगाल की कहानी है।औपनिवेशिक अतीत, स्वतंत्रता संघर्ष, वाम शासन, तृणमूल का उदय और अब फिर इतिहास की ओर लौटने की कोशिश।लाल दीवारें फिर आबाद हो रही हैं। फाइलें फिर चलेंगी। निर्णय फिर लिए जाएंगे, पर असली प्रश्न वही रहेगा, क्या बंगाल केवल अपने अतीत की इमारत में लौट रहा है या वह बेहतर शासन के एक नए अध्याय की शुरुआत करने जा रहा है?
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