अगर आपने ‘रुदाली’ फिल्म देखी है, अथवा इसके गाने सुने हैं तो ‘दिल हूम हूम करे’ आज भी आपके दिल में ‘हूम हूम’ करता होगा। फिल्म में यह गाना एक बार युगल गीत है, तो दूसरी बार एकल गाया गया है। इसी गाने से मेरा पहला परिचय हुआ था, अनोखी आवाज के गायक भूपेन हजारिका से।
‘रुदाली’ फिल्म के एकल एवं युगल सारे गाने उन्होंने गाए। युगल में उनका साथ दिया है लता मंगेशकर तथा आशा भोसले ने। फिल्मों में उनके पार्श्व गायन की शुरुआत ‘इंद्रमालती’ से ही हो गई थी। फिल्म के म्युजिक डॉयरेक्ट भी वे थी। इस फिल्म की दूसरी पार्श्व गायिका शमशाद बेगम थीं।tb आज दोनों जीवित नहीं हैं। भूपेन हजारिका की 5 नवम्बर 2011 में मुंबई में मृत्यु हुई।
26 फिल्मों में पार्श्व गायन करने वाले भूपेन हजारिका ने ‘रुदाली’ के अलावा ‘शिराज’, ‘शकुंतला’, ‘ए रिवर कॉल्ड तितास’, ‘चमेली मेमसाब’, ‘देवदास’, ‘एक पल’, ‘दर्मियान’, ‘गज गामिनी’ ‘चिंगारी’ आदि फिल्मों में गाने गाए। 14 फिल्मों का निर्देशन किया।
21 फिल्मों का म्युजिक कम्पोज किया। ‘थ्रू मेलॉडी एंड रिदम’, ‘मेरा धर्म मेरी माँ’, ‘फॉर हूम द सन साइन्स’, ‘प्रतिध्वनि’, ‘शकुंतला’, ‘सिराज’ उनकी निर्देशित कुछ फिल्मों के नाम हैं।
उनके लिखे असमी गीत मात्र फिल्मी एवं मनोरंजन केलिए नहीं होते हैं। ‘ओ गंगा बहती हो क्यों?’ में वे आज की स्थिति से व्यथित होकर गंगा से पूछ रहें हैं, इतने अत्याचार, क्रूरता और अन्याय के बावजूद तुम क्यों बहती हो? जब चारो ओर हाहाकार मचा हुआ है, तुम क्यों बहती हो?
उनके गीत सांप्रदायिक सद्भाव, वैश्विक न्याय, संवेदना लिए होते हैं। असमी, हिन्दी फिल्मों के साथ-साथ उन्होंने बांग्लादेश की फिल्मों केलिए भी गीत गाए। इस तरह वे अपनी स्वर सम्पदा से देश की सामा पार कर जाते हैं।
पद्म भूषण और दादा साहेब फालके पुरस्कार
उन्हें तीन फिल्मों के निर्देशन (‘शकुंतला’, ‘प्रतिध्वनि’ एवं ‘लोती घोती’) के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ, एक फिल्म ‘चमेली’ के म्युजिक कॉम्पोजीशन के लिए भी राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ यानि चार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले। साथ ही पद्म भूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और फिल्म का सबसे बड़ा पुरस्कार दादा साहेब फालके भी मिला। उन्हें संगीत नाटक अकादमी की फेलोशिप भी मिली थी।
मरणोपरांत भारत रत्न (2012) एवं पद्म विभूषण (2019) भी मिला। ‘रुदाली’ फिल्म केलिए उन्हें जापान में एशिया पैसेफिक इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का सर्वोत्तम म्युजिक पुरस्कार मिला। किसी भारतीय को यह पहली बार मिला था।
अपने गीतों में असम लोक संगीत का प्रयोग करने वाले भूपेन हजारिका ने असम तथा पूर्वोत्तर की संस्कृति और असम के लोग संगीत को हिन्दी सिनेमा में लाकर पूर्वोत्तर-संस्कृति और असम संगीत को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। भूपेन हजारिका के गीतों का विभिन्न भारतीय भाषाओं खासकर हिन्दी तथा बाँग्ला में अनुवाद हुआ है, जिन्हें उन्होंने स्वयं गाया है, ये गीत खूब लोकप्रिय हैं।
असम अपने कलाकारों को बहुत प्यार एवं सम्मान करता है। जीते-जी और मरणोपरांत भी। अभी हाल में हमने 19 सितम्बर 2025 को गुजरे जुबिन गर्ग के संदर्भ में इसे देखा है। ‘बार्ड ऑफ ब्रह्मपुत्र’ भूपेन हजारिका के गुजरने पर उनके अंतिम संस्कार में हजारों लोग आए। उनके जीवित रहते 2009 में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने गुवाहाटी में उनकी आदमकद मूर्ति लगाई।
इसके भी पहले 1979 में अरुणाचल प्रदेश सरकार ने उन्हें स्वर्ण पदक प्रदान किया। वायसकोर्नी बोरा एवं अर्नब जन डेका ने 1986 में फीचरलेंथ की डॉक्यूमेंट्री बायोपिक ‘मोई एटी जाजाबोर’ (‘आई एम ए वांडरर’) बनाई है।
इस फिल्म का संगीत पुरस्कृत असमी संगीतकार, गीतकार, गायक जिम अंकन डेका ने बनाया है। 1993 में वे असम साहित्य सभा के प्रेसिडेंट चुने गए। 2010 में असम क्रिकेट एसोसिएशन ने बर्षापारा स्टेडियम का नाम बदल कर डॉक्टर भूपेन हजारिका क्रिकेट स्टेडियम किया।
लोहित पर बने भारत के सबसे लंबे रोड ब्रिज का नाम उनके नाम पर है। एक मत गणना में राष्टीय गान के बाद ‘मानुष मानुषेर जोनो’ गीत बांग्लादेश का लोकप्रिय गीत पाया गया।
इस घुमक्कड़ एवं अनुशासनहीन व्यक्ति के जीवन को ढर्रे पर लाने का काम कल्पना लाजमी ने किया। 17 साल की कल्पना चौथे दशक में चल रहे भूपेन के प्रेम में पड़ गईं और उनकी सुख-दु:ख का अंत तक साथ देती रहीं। निष्ठा के साथ उनकी देखभाल करती रहीं।
8 सितम्बर 2022 को उनके 96वें जन्मदिन पर भूपेन हजारिका को सम्मान देते हुए गूगल ने डूडल बनाया। उनके मृत्यु दिवस पर श्रद्धांजलि!
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