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जल ही जीवन हैः पानी बचाएं और जल संसाधनों की रक्षा करें

सार

कभी-कभी पानी के लिए शुरू हुई छोटी-मोटी नोकझोंक कोर्ट- कचहरी तक पहुंच जाती थी। लेकिन पानी पर चर्चाएं बंद न होती थी। हालांकि, बहुत से इलाकों पर पानी की पहुंच आज भी मौजूद नहीं है। लेकिन अब जब उन इलाकों पर जाना होता है तो अक्सर पानी की पहले जैसी समस्या नहीं नजर आती ऐसा लगता है।
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पानी बचाएं और जल संसाधनों की रक्षा करें। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जल ही जीवन है! बचपन में सबसे ज्यादा निबंध जिन विषयों पर लिखने को मिलता, वह विषय था ’’जल ही जीवन है’’हमने उसे पढ़ा भी और पेज भर-भर लिखा भी तब लगता था बड़े होने पर इस निबंध से आगे निकल जल की समस्या का समाधान हो जाएगा। निबंध लिखते गए और हमारी पीढ़ी बड़ी हो गई लेकिन जल पर लिखा निबंध जल की समस्या का कोई हल न निकाल सका। आज से करीब 20 वर्ष पूर्व पानी की समस्या से दो-चार होने से लेकर एक बाल्टी पानी की कीमत के बारे में व्यक्तिगत तौर पर काफी संघर्ष का अनुभव रहा।

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गर्मियों में बुंदेलखंड के ज्यादातर इलाकों पर पानी की समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है। ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों पर पानी की पहुंच न के बराबर रहती थी। अक्सर रातों को जाग-जाग कर पानी का इंतजार करना होता था। गांव और दूरदराज के इलाकों पर पानी के लिए बिछाई गई पाइप लाइन को जमीन में ही खोल कर गड्ढों से पानी भरते हुए लोगों का आधा समय व्यतीत होता था।

कभी-कभी पानी के लिए शुरू हुई छोटी-मोटी नोकझोंक कोर्ट- कचहरी तक पहुंच जाती थी। लेकिन पानी पर चर्चाएं बंद न होती थी। हालांकि, बहुत से इलाकों पर पानी की पहुंच आज भी मौजूद नहीं है। लेकिन अब जब उन इलाकों पर जाना होता है तो अक्सर पानी की पहले जैसी समस्या नहीं नजर आती ऐसा लगता है।
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पानी की कमी पूरी हो गई है। क्योंकि पहले पानी की कीमत का ज्ञान गांव के हर बड़े बुर्जुग से मिलता ही रहता था। "बूंद-बूंद पानी हिसाब लेता है!" पानी की बर्बादी "पाप" समझने वाले वो चन्द अनपढ़ बूढ़े बुर्जुग अब समाप्त हो चुके हैं और ऐसा लगता है जैसे पानी की चिंता भी अपने साथ ही ले जा चुके हों क्योंकि अब उन ऊंचाइयों वाले स्थानों पर पानी को धरती की सतह से घसीट कर हर घर में निकाला जा चुका है।
 

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अब जब गर्मी के मौसम में गांव जाना होता है तो पानी की चिंता में डूबा हुआ समाज नहीं दिखाई देता, बल्कि पानी को निकालने के लिए छोटी पाइपों की जगह मोटे बोरिंग के पाइप, बिना बाल्टी के नहाते बच्चे, लोगों को बेतहाशा पानी बर्बाद करते देख लगता है। हमने आने वाली पीढ़ियों की चिंता छोड़ दी है और पानी की कीमत निबन्धों तक सिमट कर रह गई है।

हमको कदम-कदम पर पानी का मूल्य बताने वाली पीढ़ी अब विलुप्त हो चुकी है। हम सरकार से सवाल तो करते हैं लेकिन स्वयं को हर सवाल से मुक्त रखते हैं। आंकड़ों की सुने तो 2100 की सदी में 75 प्रतिशत तक ग्लेशियर पिघल जाएगें। उन्हें बचाने की मुहिम कृत्रिम ग्लेशियर बनाने तक की चिंता तक बढ़ चुकी है।

ऐसा लगता है हमसे पहले वाली पीढ़ियों में जलवायु परिवर्तन की आहट को बरसों पहले महसूस कर लिया था इसीलिए बूंद-बूंद पानी बचाने की उनकी मुहिम हमारे लिए आज तक पीने के पानी को बनाए हुए है। हम पढे़-लिखे समझदार डिर्ग्री धारकों ने तो पाताल को भी पानी उगलने के लिए मजबूर कर दिया। अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए ये कैसी दुनिया छोड़कर जा रहे हैं हम जहां हवा-पानी जैसी प्रकृतिक चीजों के लिए जंग जैसे हालात पैदा होने की पूरी-पूरी संभावना है।

जल संरक्षण और जल प्रबंधन की जिम्मेदारी केवल सरकार करे, अब यह समय बीत चुका है। इससे पहले युद्ध जैसे हालात बने, पानी को तिजोरियों में कैद करना पडे़, समाज को युद्ध स्तर पर प्रयास की दरकार है। क्योंकि आंकड़ों की जुबानी दस्तक बार-बार दी जा रही है। प्रकृति ने करवट बदलना शुरू कर दिया है। अब जल ही जीवन पर लिखने वाले निबंधों से बात नहीं बनने वाली। बदलाव जमीनी स्तर पर होना चाहिए।

भारत वैश्विक जल गुणवत्ता सूचकांक पर 122 देशों में से 120वें स्थान पर आ चुका है। जो सचेत कर रहा है कि दिल्ली ज्यादा दूर नहीं है। पानी मानव अस्तित्व को बनाए रखने में एक प्रमुख संसाधन के तौर पर है। जो ग्रामीण एवं शहरी समुदायों में स्वच्छता के साथ-साथ खेती में, उद्योगों में, तमाम तरह के उत्पादन की प्रक्रिया में आवश्यक है। यह कहना गलत नहीं होगा कि हम गंभीर संकट के मुहाने पर मौजूद हैं जहां नदियां गंदे नाले में बदलने लगी हैं। भू-जल संकट कई नए समस्याओं को न्योता दे रहा है।

मौजूदा समय की बात करें तो भारत में जल उपलब्धता व उपयोग के आंकड़ों की माने तो भारत में वैश्विक ताजे जल का स्त्रोत का मात्र 4 प्रतिशत ही मौजूद है जिससे वैश्विक जनसंख्या के 18 प्रतिशत हिस्से को जल उपलब्ध कराना होता है। नीति आयोग ने वर्ष 2018 में कम्पोज़िट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स रिर्पाट में बताया था कि देश में लगभग 21 प्रमुख शहर जिनमें दिल्ली, बंगलुरू, चेन्नई , हैदराबाद भी शामिल थे वर्ष 2020 तक शून्य भूजल स्तर तक पहुंच जाऐंगे साथ ही इसके कारण लगभग 100 मिलियन लोग प्रभावित होंगे।

अभी हाल ही में बेगलुरू से आने वाली खबरें जल संकट के इन्ही खतरों का संकेत दे रहीं हैं। जो आने वाले समय में पूरे भारत के लिए खतरा बनने को तैयार है। इस रिपोर्ट की माने तो वर्ष 2030 तक भारत में जल की मांग उसकी पूर्ति से दोगुनी होने वाली है।

आंकडों के लिहाज से तो भारत की शहरी क्षेत्रों में 970 लाख लोगों के पास पीने के लिए साफ पानी पर्याप्त नही हैं। जबकि देश के ग्रामीण इलाकों में लगभग 70 प्रतिशत लोग दूषित पानी पीने के लिए और 33 करोड़ लोग सूखे वाली जगहों पर रहने के लिए मजबूर हैं। भारत का लगभग 70 प्रतिशत जल प्रदूषित है, जिसका प्रभाव लोगों के स्वास्थ्य सीधे तौर  पर देखा जा सकता है।

ऐसा आभास होना कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि हमारी पुरानी पीढियों में शिक्षा भले ही कम थी लेकिन प्रकृति की समझ बहुत थी जो पानी के आने वाले संकट को बहुत पहले ही भाप जाने के कारण अपने दैनिक जीवन के भी ज्यादातर कामों को  कम से कम पानी का उपयोग करके पूरा कर लेते थे। वो जल ही जीवन है विषय पर निबंध लिखना नहीं जानते थे लेकिन जल बचाना जानते थे।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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